एक बच्चे से जब 30 जनवरी को हुए डेमोलिशन के बारे में बात करने की कोशिश की तो उसके चेहरे पर ख़ौफ़ तारी हो गया, उसकी आंखें डबडबा गई और वह बहुत मुश्किल से सिर्फ़ अपना नाम बता पाया।

दिल्ली के मेहरौली बस स्टैंड के ठीक सामने बने आदम ख़ान के मकबरे के बगल से एक रास्ता संजय वन की तरफ जाता है। करीब आधा किलोमीटर चलने के बाद दिल्ली पुलिस की बैरिकेडिंग दिखाई देती है साथ ही दिल्ली पुलिस और सेना के जवान दिखाई देते हैं। वे किसी को भी जंगल की तरफ जाने नहीं दे रहे यहां तक की कुछ लोगों के घर उस तरफ हैं उन्हें भी घूम कर जाने के लिए कहा जा रहा था।

हम अंदर जाने के बारे में पूछताछ कर ही रहे थे कि देखा वहां बहुत से लोग आ रहे थे और एक दूसरे से कुछ पूछ कर मायूस होकर लौट रहे थे। इन लोगों में मुसलमानों के साथ ही हिंदू भी थे। कई लोग सालों से हर गुरुवार को यहां मौजूद ‘आशिक अल्लाह’ की दरगाह पर दुआ मांगने आते हैं। शेख़ शहाबुद्दीन जिन्हें लोग ‘आशिक अल्लाह’ के नाम से भी बुलाते हैं।

राणा सफवी अपनी किताब ‘ Where stones speak: Historical Trails in Mehrauli the First city of Delhi’ में बताती हैं कि इस दरगाह का निर्माण सुत्लान कुतुबुद्दीन मुबारक शाह खिलजी ने 1317 में करवाया था, शेख़ शहाबुद्दीन को लोग ‘आशिक अल्लाह’ के साथ ही ‘नज़रिया पीर’ के नाम से भी जानते हैं।

600 साल पुरानी मस्जिद पर बुलडोज़र चलाने का आरोप

ख़बर है कि 30 जनवरी की भोर में मेहरौली में DDA ने अतिक्रमण हटाने के नाम पर कार्रवाई की, मस्जिद के इमाम ने बताया कि कार्रवाई में क़रीब 600-700 साल पुरानी मस्जिद अखूंदजी मस्जिद, बहरूल उलूम मदरसा और पुराने कब्रिस्तान की कुछ गुबंद वाली मज़ारों पर बुलडोज़र चला दिया।

अंखूदजी मस्जिद

बुलडोज़र कार्रवाई के बाद बैरिकेडिंग

हम ख़बर रिपोर्ट करने के लिए मेहरौली पहुंचे तो अंदर नहीं जाने दिया गया लेकिन हमने देखा कि ‘आशिक अल्लाह’ की दरगाह पर जाने के लिए पहुंच रहे लोग बैरिकेडिंग के पास से ही हाथ उठा कर दुआ मांग करे थे। जब लोगों को पता चला कि अंदर DDA का बुलडोज़र चला है तो उनकी बैचेनी बढ़ गई। वे जानना चाह रहे थे कि ‘आशिक अल्लाह’ की दरगाह सही सलामत है कि नहीं, लेकिन पुलिस-प्रशासन के मना करने पर कोई बैरिकेडिंग से आगे नहीं बढ़ा बल्कि वहीं से नम आखों के साथ लौट गया।

”सुबह 5 बजे के क़रीब हज़ारों की तादाद में पुलिस-फोर्स आ गई”

हमने अखूंदजी मस्जिद के इमाम ज़ाकिर हुसैन से बातचीत की। वे 30 जनवरी से आज तक की सारी घटना के बारे में बताते हैं। ज़ाकिर हुसैन, दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड की तरफ से नियुक्त इमाम हैं। वे 30 जनवरी के बारे में बताते हैं कि ”ये घटना सुबह 5 बजे के क़रीब हुई, मैं वहां मौजूद था, 5 बजे के करीब हज़ारों की तादाद में पुलिस-फोर्स आ गई, साथ में DDA वाले और 10 बुलडोज़र थे।”

”मैंने कुछ और सवाल किए तो उन्होंने मेरा मोबाइल ले लिया”

जिस वक़्त ठीक से दिन भी नहीं निकला था भारी संख्या में पुलिस-बल देखकर ज़ाकिर हुसैन और उस वक़्त मदरसे में मौजूद 22 बच्चे बेहद घबरा गए, इन बच्चों में 8 से 15 साल के बच्चे थे। जाकिर हुसैन बताते हैं कि ”मैंने पूछा सर क्या बात है आप लोग यहां क्यों आए हैं, तो वे कहने लगे कि ये DDA की लैंड है आप इस जगह को खाली कर दें। मैंने उनसे कहा कि ये तो वक़्फ की लैंड है, मैं दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड का इमाम हूं, आप मेरा आईकार्ड देख सकते हैं, कागजात देख सकते हैं तो उन्होंने कहा कि ”हमें कुछ देखना-सुनना नहीं है ये ऊपर से ऑर्डर है, ये DDA की लैंड है ये आपको खाली करनी पड़ेगी और इसका डेमोलेशन होगा।” मैंने कहा सर आप नोटिस दिखा दो तो वे कहने लगे ”नोटिस नहीं है इसके ऊपर से ऑर्डर हैं।” मैंने उनसे कहा कि ये तो 700 साल पुरानी मस्जिद है तो उन्होंने कहा कि ”हम मस्जिद को कुछ नहीं कर रहे”, मैंने कुछ और सवाल किए तो उन्होंने मेरा मोबाइल ले लिया और हमारे जितने भी बच्चे मदरसे में थे उन सब को बाहर निकाल कर खड़ा कर दिया। सर्दी के मौसम में बच्चे इतना डर गए कि उन्हें संभालना मुश्किल हो गया।”

”कोई पुराना इतिहास नहीं रहने दिया”

उदास ज़ाकिर हुसैन आगे बताते हैं कि ”यहां मस्जिद, मदरसा, कब्रिस्तान में कच्ची और पक्की कब्रें थी जिनमें 400-500 साल पुरानी क़ब्रें भी थीं उन्हें तोड़ दिया। सबको बिल्कुल बराबर कर दिया, वहां गुंबद बनी हुई दरगाहें थीं उनको भी ज़मीदोज़ कर दिया। कोई पुराना इतिहास नहीं रहने दिया। शेख़ जलालुद्दीन तबरेज़ी, एक और बुजुर्ग की भी दरगाह को तोड़ दिया। शेख़ शहाबुद्दीन उर्फ आशिक अल्लाह जो बख़्तियार काकी के भांजे थे उनकी भी क़ब्र है यहां।” (फिलहाल ये साफ नहीं हो पाया है कि ‘आशिक अल्लाह’ की दरगाह को नुक़सान पहुंचा है या नहीं।)

Source: News Click