क्या वोट देने का हक़ है, सवाल करने का नहीं? बिहार का चुनावी सर्कस शुरू
तारीख़ों का ऐलान, सवालों का दफ़न
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने दिल्ली में एक भव्य प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चुनाव की तारीख़ों का ऐलान किया। मंच पर चमकते कैमरे, हर बात पर सिर हिलाते पत्रकार, और एक अफसरशाही का अंदाज़ — मानो देश को कोई बड़ा तोहफ़ा दिया जा रहा हो।
इस घोषणा से पहले चुनाव आयुक्त ने “SIR” नामक किसी योजना पर लंबी और जटिल बात की। न तो जनता को समझ आया कि इसका अर्थ क्या है, और शायद खुद आयुक्त को भी नहीं पता था कि इसका बिहार के मतदाताओं से क्या संबंध है। यह भाषण अफसरशाही की उसी जटिल भाषा का नमूना था जो सुनने वाले को ऊबा देती है।
लेकिन असली मोड़ तब आया जब एक पत्रकार ने सीधा सवाल पूछा — “जनाब, घुसपैठियों का क्या हुआ?” यह सवाल जैसे पूरे मंच पर सन्नाटा खींच लाया। जो आयुक्त कुछ ही पलों पहले आत्मविश्वास से भरे थे, अचानक खामोश हो गए। यह वही सवाल था जिसके नाम पर SIR जैसी बड़ी कवायद शुरू की गई थी, लेकिन जवाब कोई नहीं मिला। यही नज़ारा पटना में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी देखने को मिला।
अब सवाल यह उठता है कि इतने बड़े ऑडिट का क्या फायदा, जब उसके नतीजे जनता को बताए ही नहीं जाते? यह वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर महंगा ऑपरेशन करने के बाद यह बताने से इनकार कर दे कि मरीज़ ज़िंदा है या नहीं। यह जनता की समझ और धैर्य का मज़ाक उड़ाने जैसा है।
वहीं, आम बिहारी मतदाता के लिए असली चिंता कुछ और है — अगली बाढ़, खराब फसल, बेरोजगारी या इस बात की कि उसका बेटा सूरत या मुंबई में काम पा सकेगा या नहीं। लेकिन सत्ता में बैठे लोग चाहते हैं कि जनता “घुसपैठियों” जैसे काल्पनिक मुद्दों पर ध्यान दे। आखिर, एक दुश्मन हमेशा काम आता है — ताकि जनता का ध्यान उसकी असली परेशानियों से हटाया जा सके।
वोटर को वोट डालने की तारीख़ दे दी जाती है। उसे वोट डालने के काबिल तो समझा जाता है, लेकिन सवाल पूछने के लायक नहीं। यही हमारी राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है। चुनाव आएंगे, जाएंगे, लोग जात-पात, धर्म या प्याज-तेल की कीमतों के आधार पर वोट देंगे। नई सरकार बनेगी, मंत्री शपथ लेंगे, फूलों के हार पहनाए जाएंगे — और “घुसपैठियों” वाला सवाल, जिसके नाम पर यह पूरा शोर मचाया गया, खोखले नारों और झूठे वादों के नीचे दब जाएगा।
तमाशा शुरू हो चुका है। भाषण होंगे, वादे किए जाएंगे, और परिणाम पहले से तय होंगे। बदलेंगे तो बस पोस्टरों पर लगे चेहरे, लेकिन जनता के सवाल अब भी हवा में झूलते रहेंगे।
लेखक: जमी़ल अहमद मिलनसार, बेंगलुरु
असिस्टेंट जनरल सेक्रेटरी, ऑल इंडिया मिली काउंसिल, कर्नाटक
(लेखक के विचारों से संस्थान का सहमत होना आवश्यक नहीं है)
Source: Haqeeqat Time (translated in hindi)







