माननीय संपादक के नाम,
कर्नाटक राज्य में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के सुदृढ़ीकरण और सरकारी नीतियों में अल्पसंख्यकों के हितों की दिशा तय करने के उद्देश्य से स्थापित कर्नाटक राज्य अल्पसंख्यक आयोग अब चार दशक से अधिक का समय पूरा कर चुका है। यह संस्था अल्पसंख्यकों के लिए उम्मीद की किरण होनी चाहिए थी, लेकिन अफसोस कि आज यह महज़ एक “कागज़ी शेर” बनकर रह गई है।
समय के साथ आयोग के अधिकारों में कई संशोधनों के जरिए विस्तार किया गया। कर्नाटक अधिनियम संख्या 13 (2016) के तहत इसे सिविल कोर्ट जैसे अधिकार दिए जाना एक महत्वपूर्ण कदम था। सैद्धांतिक रूप से, ये अधिकार आयोग को इतना सक्षम बनाते कि वह किसी भी अधिकारी को तलब कर सके, दस्तावेज़ मंगा सके, और अल्पसंख्यकों से जुड़ी शिकायतों की स्वतंत्र जांच कर सके। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट है — जो शक्ति कागज़ पर दिखती है, वह व्यवहार में कहीं नजर नहीं आती।

आयोग की जिम्मेदारियाँ स्पष्ट हैं —
अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना, कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करना, भेदभावपूर्ण व्यवहार की जांच करना, सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देना, और सरकारी संस्थानों में अल्पसंख्यकों की निष्पक्ष भागीदारी सुनिश्चित करना। इसके अलावा आयोग को सरकार को सुझाव देने और जनशिकायतों की जांच करने का भी वैधानिक अधिकार है।
हालांकि कागज़ पर ये अधिकार व्यापक दिखते हैं, ज़मीनी हकीकत यह है कि यह संस्था वर्षों से लगभग निष्क्रिय पड़ी है।

आयोग की प्रमुख असफलताएँ इस प्रकार हैं —
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बढ़ती सांप्रदायिक नफरत को रोकने में विफलता।
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घृणा भाषणों और इस्लामोफोबिया पर कोई सख्त रुख नहीं।
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मुस्लिमों की शैक्षिक व आर्थिक स्थिति पर कोई ठोस अध्ययन नहीं किया गया।
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गरीब अल्पसंख्यक कैदियों को कानूनी सहायता की कमी।
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विचाराधीन मुस्लिम कैदियों की बढ़ती संख्या पर खामोशी।
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पुलिस व प्रशासन में निष्पक्षता बढ़ाने के लिए कोई ठोस पहल नहीं।
पिछले एक दशक से अधिक समय में आयोग ने कोई ऐसी शोध या रिपोर्ट जारी नहीं की जो राज्य में अल्पसंख्यकों की वास्तविक स्थिति पर रोशनी डालती हो। 2012 में अनवर मानपडी समिति की रिपोर्ट — जिसने वक्फ संपत्तियों में भ्रष्टाचार को उजागर किया था — संभवतः आयोग की अंतिम उल्लेखनीय दस्तावेज़ थी। इसके बाद से आयोग की कार्यवाही मौन में दबी हुई है।
आज आयोग की गतिविधियाँ केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित हैं — जिला दौरों, शिकायतों की औपचारिक सुनवाई, धार्मिक नेताओं से मुलाकातें, या “अल्पसंख्यक अधिकार दिवस” पर समारोह। लेकिन इनसे अल्पसंख्यकों के रोज़मर्रा के जीवन पर कोई असर नहीं पड़ता। सवाल उठता है — इस निष्क्रियता का जिम्मेदार कौन है? क्या यह आयोग के अध्यक्षों की अक्षमता है या सरकार की जानबूझकर की गई उपेक्षा?
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, आयोग के लिए मात्र ₹2.45 करोड़ का वार्षिक बजट आवंटित किया गया है। यह राशि केवल कर्मचारियों के वेतन और कार्यालय के सामान्य खर्च तक ही सीमित रह जाती है। ऐसे में पूरे राज्य में स्वतंत्र जांच, सर्वेक्षण या जनजागरण अभियान चलाना लगभग असंभव है।
फंड की कमी, कर्मचारियों की कमी और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव ने इस संस्था को एक निष्प्राण प्रहरी बना दिया है।
अगर सरकार को सच में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की परवाह है, तो उसे दिखावटी बयानों से आगे बढ़कर आयोग को पर्याप्त संसाधन, स्टाफ और अधिकार देने होंगे।
हमें यह सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि हाथ बाँधकर सुरक्षा की उम्मीद करना केवल आत्मवंचना है।
जब तक आयोग को वास्तविक शक्ति नहीं दी जाती, तब तक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का दावा सिर्फ़ एक नारा रहेगा — हक़ीक़त नहीं।
अब समय है कि सरकार अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर गंभीर हो — वादों से नहीं, बल्कि कार्रवाई से।
सादर,
वाल्टर ब्रिस्टो, चिनपट्टन (कर्नाटक)
(सौजन्य: वार्ता भारती)







