क्या एक ही समुदाय सत्तारूढ़ दल की विचारधारा का शिकार और सहयोगी हो सकता है?

25 दिसंबर को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई ईसाइयों को बातचीत के लिए और उन्हें बधाई देने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने सामाजिक कार्यों के लिए समुदाय की सराहना की और ईसा मसीह की समावेशी शिक्षाओं की भी दाद दी। उन्होंने समुदाय के नेताओं के साथ अपने लंबे जुड़ाव को भी याद किया। कुछ दिनों बाद ही केरल में लगभग दो सौ ईसाई, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए। द हिंदू अख़बार की रिपोर्ट कहती है कि, “सोमवार को कोट्टायम में भाजपा के राज्य नेतृत्व की एक बैठक में दस दिवसीय स्नेह यात्रा शुरू करने का निर्णय लिया गया जिसका उद्देश्य मणिपुर हिंसा सहित विभिन्न मुद्दों पर अपनी स्थिति समझाकर समुदाय का दिल जीतना है।” उसी समय, केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा कि, “मणिपुर में हालात इस हद तक पहुंच गए हैं कि लोगों का एक वर्ग…ईसाई समुदाय का ज़िंदा रहना दूभर हो गया है। कोई सरकारी हस्तक्षेप नहीं रहा। अब, हम देख रहे हैं कि कुछ ऐसे व्यक्ति हस्तक्षेप की बात कर रहे हैं जो नरसंहार को रोकने के इच्छुक नहीं थे। वोट के लिए कुछ लोग भेष बदलने को तैयार हैं। दोस्ती का दिखावा करने की इस कोशिश के पीछे का मकसद हर कोई समझ सकता है।

जैसे-जैसे 2024 का आम चुनाव नजदीक आ रहा है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा ने ईसाई समुदाय को लुभाने के अपने प्रयास तेज कर दिए हैं। ईसाई समुदाय की जो मौजूदा स्थ्ति है वह विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों और धार्मिक स्वतंत्रता के सूचकांकों में परिलक्षित होती हैं। कथित तौर पर प्रतिदिन उत्पीड़न की दो घटनाएं होती हैं। समस्या केवल मणिपुर तक ही सीमित नहीं है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में, “100 पादरी और यहां तक कि आम पुरुष और महिलाएं अवैध धर्मांतरण के आरोप में जेल में बंद हैं जबकि वे केवल जन्मदिन मना रहे थे या रविवार की इबादत कर रहे थे।”

यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के अनुसार, 2022 के पहले सात महीनों में ईसाइयों केखिलाफ 302 हमले हुए। बैंगलोर डायोसीज, नेशनल सॉलिडेरिटी फोरम और इवेंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया के आर्कबिशप पीटर मचाडो द्वारा दायर एक याचिका में कहा गया है कि “हुकूमत उन समूहों के खिलाफ तत्काल और जरूरी कार्रवाई करने के मामले में विफल रही हैजिन्होंने व्यापक हिंसा पैदा की है और ईसाई समुदाय के खिलाफ नफरत भरे भाषण का इस्तेमाल किया है जिसमें उनके पूजा स्थलों पर हमले और प्रार्थना सभाओं में व्यवधान किया है।”

लगातार चार वर्षों तक, अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर संयुक्त राज्य आयोग ने भारत को विशेष चिंता वाला देश घोषित किया है।

ओपन डोर्स इंटरनेशनल के अनुसार, “मई 2014 में वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद से, ईसाइयों पर दबाव नाटकीय रूप से बढ़ गया है… कुछ इलाकों में हिंदू चरमपंथी अत्यधिक हिंसा का इस्तेमाल करते हुए दूसरों पर बेधड़क हमला करते हैं… राज्य भी बढ़ती संख्या में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू कर रहे हैं। माना जाता है कि इनका मक़सद हिंदुओं को जबरन अन्य धर्मों में परिवर्तित होने से रोकना है। लेकिन वास्तव में, इन्हें अक्सर ईसाइयों को परेशान करने और डराने-धमकाने के बहाने के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

ईसाई समुदाय की वर्तमान स्थिति हिंदू राष्ट्रवादी नेरेटिव में निहित है जहां इस्लाम और ईसाई धर्म को विदेशी धर्म माना जाता है। आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर ने अपनी पुस्तक बंच ऑफ थॉट्स में लिखा है कि मुस्लिमईसाई और कम्युनिस्ट हिंदू राष्ट्र के लिए आंतरिक खतरा हैं। इसी तर्ज पर आरएसएस का प्रचार-प्रसार उसकी शाखाओं में किया जाता है। आदिवासियों में ईसाई विरोधी हिंसा इस प्रचार के आधार पर शुरू हुई कि ईसाई मिशनरी बल, धोखाधड़ी और लालच के जरिए लोगों का धर्म परिवर्तन करा रहे हैं।

ईसाई धर्म के ऐतिहासिक वृत्तांत बताते हैं कि भारत में इसकी यात्रा 52 ईस्वी में सेंट थॉमस के मालाबार तट पर पहुंचने और एक चर्च की स्थापना के साथ शुरू हुई थी। अन्य विवरण ईसाई धर्म के आगमन को चौथी शताब्दी ई.पू. बताते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में ईसाइयों का प्रतिशत 2.3 प्रतिशत है। दिलचस्प बात यह है कि 1971 के बाद से इसमें लगातार गिरावट आई है। तब-जब ईसाई 2.60 प्रतिशत थे (1911: 2.30 प्रतिशत, 1981: 2.44 प्रतिशत 1991: 2.34 प्रतिशत 2001: 2.30 प्रतिशत) थे।

फिर भी इसके विपरीत लगातार प्रचार के कारण ईसाई विरोधी हिंसा में वृद्धि हुई है जैसे कि 25 दिसंबर 1998 से 3 जनवरी 1999 तक गुजरात के डांग इलाके में हुआ। इसके बाद 22 जनवरी 1999 की रात को हिंदुत्व संगठन बजरंग दल के कार्यकर्ता राजेंद्र पाल उर्फ दारा सिंह और उनके साथी महेंद्र हेम्ब्रम, जो वर्तमान में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैंने ओडिशा में काम करने वाले एक ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी पादरी ग्राहम स्टेंस को जिंदा जला दिया था। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉके.आरनारायणन ने इन हत्याओं को दुनिया के भयानक/काले कारनामों का भंडार” बताया था।

स्टेन्स की हत्याओं के बाद गठित वाधवा आयोग का निष्कर्ष था कि वे धर्मांतरण में शामिल नहीं थे और जिस इलाके में वे काम कर रहे थे, वहां ईसाइयों की आबादी में कोई वृद्धि नहीं हुई थी। दूरदराज के इलाकों में ईसाई विरोधी हिंसा अभी भी भड़क उठती है। अक्सर क्रिसमस के समय के आसपास ऐसा होता है।

ईसाई विरोधी हिंसा एक कम-रडार वाली गतिविधि है जहां दूरदराज के इलाकों में काम करने वाले पादरियों को अक्सर इबादत सभा आयोजित करते समय दबोचा जाता है। बजरंग दल और उसके सहयोगी इन बैठकों में बाधा डालते हैं कई पादरियों को गिरफ्तार और परेशान किया जाता है।

मणिपुर में लंबे समय तक चली हिंसा को कई लोग इसी संदर्भ में देख रहे हैं। कुकी, जो मुख्य रूप से ईसाई हैं; डबल इंजन सरकार यानी मणिपुर और दिल्ली पर एक ही पार्टी के शासन के बावजूद वे अपने ही राज्य में शरणार्थी बन गए हैं। प्रधानमंत्री हिंसा पर चुप रहे हैं। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ताओं और बहादुर पत्रकारों को इलाके का दौरा करने और घटनाओं पर रिपोर्ट करने के लिए छोड़ दिया है। लेकिन अगर सरकार उदासीन बनी रही तो मणिपुर की तरह बढ़ती गहरी दरारों को पाटा नहीं जा सकेगा।

इस बीच, वर्तमान सरकार मुख्य रूप से हिंदू मतदाताओं को एकजुट करके चुनावी लाभ कमाने के उद्देश्य से अपनी छवि को बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। केरल में, कई संपन्न ईसाइयों को हिंदू बहुसंख्यकवादी राजनीति द्वारा लुभाया जा रहा है। दरअसल, कुछ शीर्ष धार्मिक नेतृत्व भी केंद्रीय एजेंसियों की छापेमारी से खुद को बचाने के लिए शासन के साथ जुड़ने के लिए प्रलोभित हो रहे हैं।

इस रोशनी में देखा जाए तो, सत्तारूढ़ दल की ईसाइयों के बीच पहुंच बनाना एक रणनीति की तरह लगती है। वे संगठन जिन्होंने ईसाई समुदाय को हाशिए पर डाल दिया है अब उन्हें चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं।

Source: News Click