गैस सिलेंडर की आग, मोदी का डिप्लोमैटिक ड्रामा
गरीबों की जेब से वसूली
एलपीजी सिलेंडर की कीमत में साठ रुपये की ताज़ा बढ़ोतरी लाखों घरों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं है। महंगाई की आग में पहले से ही झुलस रहे लोग अब खाना पकाने के लिए भी परेशान हो जाएंगे—क्या यह मज़ाक है?
यह कोई अचानक हुआ हादसा नहीं है, बल्कि विदेश नीति की नादानी का नतीजा बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के साथ नज़दीकी बढ़ाते हुए रूस और ईरान जैसे पुराने साझेदारों से दूरी बना ली, जो कभी भारत की ऊर्जा सुरक्षा के अहम स्रोत माने जाते थे। सवाल उठ रहा है कि क्या कूटनीतिक रिश्तों के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता से समझौता किया गया?
पंडित जवाहरलाल नेहरू का एक कथन अक्सर याद किया जाता है: “विदेश नीति, आर्थिक नीति का ही विस्तार होती है।” जब कूटनीति पर सवाल उठते हैं, तो उसका असर आम जनता, खासकर गरीब और मध्यम वर्ग की जिंदगी पर पड़ता है।
पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम. एम. नरवणे की नई किताब में भी यह संकेत मिलता है कि कई अहम फैसले जल्दबाज़ी में और पर्याप्त सलाह-मशविरा किए बिना लिए गए। इससे नीति-निर्माण की प्रक्रिया को लेकर बहस और तेज हो गई है।
सरकार से अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि कूटनीतिक फैसलों की कीमत आम लोगों को क्यों चुकानी पड़ रही है। लोगों की मांग है कि सरकार इस मुद्दे पर स्पष्टता दे और बढ़ती महंगाई से राहत के लिए ठोस कदम उठाए।







