मोदी से राहुल तक: “एक अकेला” की बदलती सियासी कहानी

भारतीय सियासत की सबसे बड़ी हक़ीक़त शायद यही है कि यहां कोई भी लफ़्ज़ हमेशा एक ही मायने नहीं रखता। इख़्तियार (सत्ता) के दौर में बोले गए जुमले वक्त के…

सुर्खियों के शोर में गुम होते असली मुद्दे

जब राजनीतिक नारों और विवादों के बीच दबने लगें जनता के असली सवाल किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत सिर्फ़ वोट नहीं, बल्कि जागरूक मतदाता होता है। जागरूक नागरिक वह…

NEET पेपर लीक विवाद: तलबा का एहतिजाज तेज़, इम्तिहानी निज़ाम पर उठे बड़े सवाल

तलबा की आवाज़, हुकूमत का इम्तिहान – अब देखना ये है कि मुज़ाहिरीन नौजवानों के मुतालिबात का क्या होगा? हज़ारों-लाखों अरमान और उम्मीदों के साथ नौजवान तलबा इम्तिहानों में शामिल…

युवा आवाज़ों को लाठी नहीं… जवाब चाहिए!

युवा आवाज़ों को लाठी नहीं, जवाब चाहिए ताक़त नहीं, एतमाद से मसाइल हल होते हैं ख़ून से लथपथ दिल्ली और नौजवानों की बेचैनी लाठी नहीं, मुकालमा ही जम्हूरियत का रास्ता…

क्या अहिंसा और सत्याग्रह वाले आंदोलन मोदी सरकार के सामने टिक सकते हैं?

नरेंद्र मोदी सरकार का अब तक का रिकॉर्ड गवाह है कि वह किसी भी असहमति या आंदोलन से संवाद में तब तक यक़ीन नहीं करती, जब तक पानी सिर से…

मुस्लिम इदारों पर बुलडोज़र कार्रवाई पर उठे सवाल

क़ानून की आड़ में मसाजिद, मदरसों और मुस्लिम इदारों के खिलाफ कार्रवाई पर बहस तेज़ उत्तर प्रदेश के रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों पर संभावित…

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी को भी अब ‘मौनेंद्र मोदी’ कहा जाने लगा!

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन अपने साप्ताहिक कॉलम में विभिन्न मुद्दों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी के साथ चंदा चोरी और पंजाब की राजनीति पर बात कर रहे हैं। केंद्र में जब…

शहरियत साबित करना क्यों हो रहा है मुश्किल? कई सरकारी दस्तावेज़ भी नहीं माने जा रहे अंतिम सबूत

नई दिल्ली/बेंगलुरु: देश में शहरियत (Citizenship) को लेकर बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। हाल ही में कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु में हिरासत में लिए गए अब्दुल रहीम…

बढ़ती ग़रीबी: पूंजीवाद, रोज़गार और इतिहास

आज के समय में पूंजीवाद के रास्ते पर चला जाना अनिवार्य रूप से समग्रता में विश्व अर्थव्यवस्था में शुद्ध ग़रीबी को बढ़ाने का काम करता है। अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध…

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