आसाम में घृणित राजनीति का शर्मनाक पहलू

देश में वोट बटोरने के लिए धर्म के नाम पर विभाजनकारी राजनीतिक खेल खेले जा रहे हैं। भाजपा में जो नेता जितना अधिक मुस्लिम विरोधी दिखाई देता है, उसे उतना ही सफल माना जा रहा है कि वह धर्म के नाम पर वोट जुटा सकता है। मुसलमानों को इस देश में विदेशी और हिंदू विरोधी बताने की साजिश आरएसएस के मार्गदर्शन में भाजपा द्वारा रची जा रही है। हिंदू राष्ट्र की स्थापना की परियोजना के लिए गुजरात, जब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे, एक प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल किया गया। वर्ष 2002 के गुजरात दंगों को गुजराती पहचान और सम्मान की रक्षा के लिए आवश्यक कदम के रूप में प्रस्तुत किया गया था। यही फार्मूला अब आसाम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा अपनाया जा रहा है।

यहां मुसलमानों को घुसपैठिया बताया जा रहा है। कश्मीर के बाद आसाम वह राज्य है जहां मुसलमान बड़ी संख्या में रहते हैं और राज्य की कुल आबादी में उनका अनुपात लगभग 38 प्रतिशत है। उन्हें बांग्लादेश से अवैध रूप से आकर बसने वाला कहा जा रहा है। बंगाली भाषी मुसलमानों को, जो संभवतः पश्चिम बंगाल से आकर बसे हों, ‘मियां’ और ‘मुल्ला’ जैसे शब्दों से अपमानजनक तरीके से संबोधित किया जाता है। ये लोग छोटी-छोटी व्यापारिक गतिविधियों में लगे हैं—फल और सब्जियां बेचते हैं, ठेले लगाते हैं और कई लोग ऑटो रिक्शा चलाते हैं। उनके खिलाफ आसाम में नफरत भरी मुहिम या प्रचार शुरू किया गया है। सीएए और एनआरसी कानूनों के तहत उन्हें अवैध नागरिक के रूप में देखा गया है। लगभग दस लाख मुसलमानों के नाम मतदाता सूची से हटाने और उनकी नागरिकता खत्म करने की कोशिशें की गई हैं।

आसाम के मौजूदा मुख्यमंत्री सरमा लगभग दो दशकों तक कांग्रेस में रहे और तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के करीबी माने जाते थे। वे उनके बाद मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते थे, लेकिन जब गोगोई के बेटे गौरव गोगोई राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में उभरने लगे, तब सरमा ने कांग्रेस पर आसाम के लोगों के साथ अन्याय और राहुल गांधी द्वारा नजरअंदाज किए जाने के आरोप लगाते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा, जिसने पहले उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, पार्टी में शामिल होने के बाद वे आरोप समाप्त हो गए। अवसरवादी राजनीति और नफरत की राजनीति के जरिए तेजी से उभरने वाले सरमा ने मुसलमानों के खिलाफ प्रचार को अहम मुद्दा बनाया। उन्होंने बंगाली मुसलमानों के व्यापार के बहिष्कार की बात कही और उन्हें इतना परेशान करने की बात कही कि वे आसाम छोड़कर चले जाएं।

आसाम में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसी कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री लगातार आसाम का दौरा कर रहे हैं। अपने भाषणों में उन्होंने आसामी लोगों की पहचान की रक्षा को महत्वपूर्ण बताते हुए सीमा पार से अवैध रूप से आने वाले मुसलमानों को घुसपैठिया बताया और उन्हें देश और राज्य के लिए खतरा कहा। जबकि देश की सीमाओं की निगरानी की जिम्मेदारी बीएसएफ की है, जो केंद्र सरकार के अधीन काम करती है।

आगामी चुनावों में हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेले जाने की संभावना है। इसी कारण स्थानीय मुसलमानों के खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से माहौल बनाया जा रहा है। पहले राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों को देश के लिए खतरा बताया जाता था, अब “आसाम खतरे में है” जैसे नारे दिए जा रहे हैं। भाजपा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (ट्विटर) पर एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसकी हेडलाइन “पॉइंट ब्लैंक” थी। इसमें दिखाया गया कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा एक तस्वीर पर नजदीक से राइफल से निशाना साध रहे हैं। तस्वीर में टोपी और दाढ़ी वाले व्यक्तियों को दिखाया गया, जिससे मुसलमानों को निशाना बनाए जाने का आरोप लगा। इस वीडियो का देशभर में विरोध हुआ और दस लाख से अधिक लोगों ने इसे देखा। विरोध के बाद वीडियो हटा दिया गया और पोस्ट करने वाले व्यक्ति को पद से हटा दिया गया। सरमा ने इस वीडियो से खुद को अलग बताते हुए कहा कि यह उनका निजी वीडियो था। भाजपा समर्थकों ने इसे एआई से तैयार बताया।

शांतिप्रिय और सेकुलर मूल्यों के समर्थकों ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की और कहा कि यदि किसी राज्य का मुख्यमंत्री किसी खास समुदाय के प्रति ऐसा रवैया अपनाता है, तो यह संविधान का उल्लंघन है। उन्होंने मुख्यमंत्री के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की। 10 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सुनवाई करते हुए विचार करने की बात कही, लेकिन 16 फरवरी को सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को संबंधित हाई कोर्ट जाने की सलाह दी।

इस विवाद का एक पहलू यह भी है कि जहां देश में भड़काऊ भाषणों और धार्मिक नफरत फैलाने वाले बयानों पर कार्रवाई होती है, वहीं आसाम में मुसलमानों के खिलाफ बयानबाजी को स्थानीय पहचान की रक्षा के नाम पर उचित ठहराया जा रहा है। कुछ सेकुलर समूह भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं, उनका मानना है कि अधिक विवाद से चुनावों में धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। आरएसएस और भाजपा की नजर में बसवा सरमा को सांप्रदायिक राजनीति के प्रोजेक्ट में अहम माना जा रहा है, इसलिए केंद्रीय नेतृत्व ने अब तक कोई कड़ा बयान नहीं दिया है।

चुनावों को ध्यान में रखते हुए सांप्रदायिक माहौल को गर्म रखने और हिंदू-मुस्लिम विभाजन को बढ़ाने का आरोप भाजपा पर लगाया जा रहा है। आसाम के मुख्यमंत्री के कथित गैर-जिम्मेदाराना बयान और मुसलमानों के खिलाफ उनकी बयानबाजी भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकती है, लेकिन इससे देश में विभाजन और नफरत की राजनीति मजबूत होने का खतरा है। “सबका साथ, सबका विश्वास” का नारा ऐसे माहौल में केवल एक खोखला वाक्य बनकर रह सकता है।

लेखक : मोहम्मद आज़म शाहिद

Source: Haqeeqat Times (Translate in Hindi)