चाँद… आधा इधर, आधा उधर

रमज़ान का चाँद हमेशा रहमत, बरकत और आध्यात्मिकता का संदेश लेकर आता है। मगर अफसोस की बात है कि हमारे समाज में यह चाँद इबादत से ज्यादा मतभेदों का प्रतीक बनता जा रहा है। कहा जाता है कि रमज़ान में शैतान क़ैद कर दिया जाता है, लेकिन ऐसा लगता है कि जाते-जाते वह ऐसा बीज बो जाता है कि हम पूरा महीना इसी बहस में उलझे रहते हैं कि चाँद दिखाई दिया या नहीं।

हर साल वही दृश्य दोहराया जाता है। कहीं तरावीह की नमाज़ की कतारें सज जाती हैं, तो कहीं लोग आराम से खाना खाकर अगले दिन के रोज़े को टाल देते हैं। सोशल मीडिया पर उलेमा, खगोलशास्त्री और आम लोग एक-दूसरे पर राय और फतवे देने लगते हैं। ऐसा महसूस होता है कि रमज़ान इबादत का महीना नहीं, बल्कि चाँद के ऐलान की राजनीति का महीना बन गया है।

दिलचस्प बात यह है कि हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ विज्ञान ने ब्रह्मांड के कई रहस्यों से पर्दा उठा दिया है। इंसान चाँद पर कदम रख चुका है, सैटेलाइट अंतरिक्ष में घूम रहे हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता रोज़मर्रा के फैसलों में मदद कर रही है — फिर भी हम आज तक इसी सवाल पर बहस कर रहे हैं कि चाँद दिखाई दिया या नहीं। यह स्थिति व्यंग्य से ज्यादा अफसोस का कारण है।

इस्लाम आसानियों का धर्म सिखाता है, लेकिन हमने इसे कठिन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चाँद देखने का मुद्दा हमेशा से फिक़्ही मतभेद का हिस्सा रहा है, मगर इसे अहंकार, जिद और समूह श्रेष्ठता का मामला बना देना निश्चित रूप से दुखद है। कुछ लोग वैज्ञानिक प्रमाणों को नकार देते हैं, तो कुछ प्रत्यक्ष गवाही को नजरअंदाज करते हैं। नतीजा यह होता है कि उम्मत पहले ही दिन दो हिस्सों में बँट जाती है।

असल सवाल यह है कि क्या रमज़ान का मकसद सिर्फ रोज़ा रखना है, या फिर एकता, सहनशीलता और भाईचारे का सबक सीखना भी है? अगर हम एक चाँद पर सहमत नहीं हो सकते, तो दुनिया को एकता का संदेश कैसे देंगे? दुनिया हैरान होती है कि एक किताब, एक नबी और एक क़िबला रखने वाली कौम एक चाँद पर क्यों सहमत नहीं हो पाती।

इस मुद्दे का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि आम मुसलमान उलझन में पड़ जाता है और समझ नहीं पाता कि किस ऐलान पर अमल करे। इस भ्रम का फायदा वे लोग उठाते हैं जो मुसलमानों की कमजोरियों को उजागर करना चाहते हैं। हम खुद अपने मतभेदों को तमाशा बना देते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि दुनिया हमें गंभीरता से नहीं लेती।

ज़रूरत इस बात की है कि उलेमा, खगोलशास्त्री और धार्मिक संस्थाएं मिलकर एक साझा व्यवस्था तैयार करें। अगर आधुनिक विज्ञान को पूरी तरह नकारना सही नहीं, तो पारंपरिक गवाही को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं है। दोनों के बीच संतुलन ही उम्मत के हित में है।

रमज़ान सब्र, सहनशीलता और एकता का महीना है। अगर हम इस पवित्र महीने में भी बिखरे रहें, तो यह चाँद का नहीं बल्कि हमारी सोच का अंधेरा है। शायद हमें आसमान में चाँद ढूंढने से पहले अपने भीतर रोशनी पैदा करने की जरूरत है।

लेखक के विचारों से संस्था का सहमत होना आवश्यक नहीं है।

लेखक: मुदस्सर अहमद, शिमोगा

Source: Haqeeqat Times (Translated in hindi)