कम उम्र और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव
क्या कानून बच्चों की मानसिक दुनिया को सुरक्षित बना सकता है?
टेक्नोलॉजी ने मानव जीवन को जितना आसान बनाया है, उतना ही जटिल भी बना दिया है। आज का इंसान सुबह आंख खुलने से लेकर रात को सोने तक किसी न किसी स्क्रीन से जुड़ा रहता है। मोबाइल फोन अब केवल संपर्क का माध्यम नहीं रहा, बल्कि शिक्षा, मनोरंजन, व्यापार और सामाजिक संबंधों का भी प्रमुख साधन बन चुका है। लेकिन यही सुविधा जब कम उम्र के बच्चों तक बिना किसी नियंत्रण के पहुंचती है, तो वह सुविधा से अधिक एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या बन जाती है।
घरों में अब यह आम दृश्य है कि रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए खिलौने की जगह मोबाइल फोन थमा दिया जाता है। कार्टून, वीडियो और गेम्स के जरिए बच्चों को व्यस्त रखने की यह आदत धीरे-धीरे एक ऐसी लत में बदल रही है, जिसका असर उनकी पढ़ाई, स्वास्थ्य और व्यक्तित्व निर्माण पर पड़ रहा है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री Siddaramaiah ने 2026-27 के राज्य बजट में घोषणा की है कि 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की संभावनाओं का अध्ययन किया जाएगा। सरकार के इस ऐलान को कई मनोवैज्ञानिकों और अभिभावक संगठनों ने सकारात्मक कदम बताया है। उनका मानना है कि मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के अनियंत्रित उपयोग ने बच्चों के मानसिक विकास, पढ़ाई पर ध्यान और सामाजिक व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव डाला है।
खास तौर पर कम उम्र में स्क्रीन के अधिक इस्तेमाल से बच्चों की एकाग्रता प्रभावित हो रही है, खेलकूद और प्राकृतिक गतिविधियां कम हो रही हैं, और कई बार वे ऐसे कंटेंट तक भी पहुंच जाते हैं जो उनकी उम्र के लिए उपयुक्त नहीं होता।
दरअसल स्कूलों में मोबाइल के उपयोग पर पहले से ही कई प्रतिबंध मौजूद हैं। प्राइमरी और हाई स्कूल के शिक्षण संस्थानों में मोबाइल फोन लाने या इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होती। लेकिन समस्या केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। स्कूल के बाद का अधिकतर समय बच्चे उसी स्क्रीन के साथ बिताते हैं।
YouTube, Facebook और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म अब कम उम्र के छात्रों के लिए भी आसानी से उपलब्ध हैं। कई बच्चे अपने अकाउंट बनाकर घंटों इन प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय रहते हैं। कुछ माता-पिता खुद भी बच्चों से वीडियो बनवाकर सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, जो एक नया सामाजिक चलन बनता जा रहा है।

इस स्थिति की एक अहम वजह वह दौर भी है जब COVID-19 महामारी के दौरान शिक्षण संस्थान बंद हो गए थे और ऑनलाइन शिक्षा शुरू की गई थी। उसी समय पहली बार बड़ी संख्या में कम उम्र के बच्चों के हाथों में मोबाइल फोन और इंटरनेट की नियमित पहुंच आई। कई स्कूलों ने बाद में भी इस व्यवस्था को जारी रखा, जहां नोट्स, होमवर्क और अन्य शैक्षणिक सामग्री मोबाइल के जरिए ही भेजी जाने लगी। इसके परिणामस्वरूप मोबाइल फोन बच्चों के दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गया।
लेकिन यहां एक मूल प्रश्न उठता है कि क्या केवल कानून बनाकर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है? सरकार द्वारा प्रतिबंध की घोषणा अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके क्रियान्वयन का व्यावहारिक तरीका अभी स्पष्ट नहीं है। घर के अंदर बच्चों के हाथ में मोबाइल न पहुंचने देना क्या वास्तव में सरकारी निगरानी से संभव है?
इंटरनेट की दुनिया में उम्र सत्यापन की व्यवस्था भी अभी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है। सोशल मीडिया पर फर्जी पहचान से अकाउंट बनाना बेहद आसान है, और यही कारण है कि कई देशों में कड़े कानून होने के बावजूद पूर्ण प्रतिबंध लागू करना संभव नहीं हो पाया है।
दुनिया के विभिन्न देशों में इस समस्या से निपटने के लिए अलग-अलग प्रयोग किए जा रहे हैं। कुछ जगहों पर स्कूलों के अंदर मोबाइल फोन पूरी तरह जमा करवा लिए जाते हैं, जबकि कुछ देशों में कक्षा के समय फोन बंद रखना अनिवार्य किया गया है। Australia के कई स्कूलों में छात्रों को सुबह की पहली घंटी से लेकर अंतिम घंटी तक मोबाइल फोन बंद रखना या स्कूल प्रशासन के पास जमा कराना पड़ता है।
ऐसे उपायों का उद्देश्य शैक्षणिक वातावरण में एकाग्रता और मानसिक ध्यान को बेहतर बनाना है। प्रारंभिक अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि इस तरह के सीमित उपायों से छात्रों की एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य में कुछ सुधार देखा गया है, हालांकि इस विषय पर और शोध की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है।
असल समस्या शायद केवल बच्चों की नहीं बल्कि पूरे समाज की है। यदि वयस्क स्वयं मोबाइल फोन के अनावश्यक उपयोग से बचाव नहीं करते, तो बच्चों के लिए अलग नियम बनाना अधिक प्रभावी नहीं होगा। बच्चों की परवरिश में घर का वातावरण सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब माता-पिता स्वयं लगातार मोबाइल में व्यस्त रहते हों, तो बच्चों से अलग व्यवहार की अपेक्षा करना कठिन हो जाता है।
इसी कारण कई विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध के बजाय संतुलित और जिम्मेदार उपयोग की शिक्षा अधिक प्रभावी रास्ता हो सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि टेक्नोलॉजी को लेकर यह बहस नई नहीं है। अतीत में जब उपन्यास और कहानियां लोकप्रिय हुईं, तब भी कुछ लोगों ने उन्हें बच्चों के लिए हानिकारक बताया था। बाद में टेलीविजन के आगमन पर भी इसी तरह की आशंकाएं व्यक्त की गई थीं। आज मोबाइल फोन उसी श्रृंखला की नई कड़ी बन चुका है। यह सच है कि हर नई तकनीक अपने साथ अवसर भी लाती है और चुनौतियां भी।
कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मोबाइल का उपयोग पूरी तरह नुकसानदायक नहीं है। कई बच्चे शैक्षणिक विषयों पर वीडियो या रचनात्मक सामग्री तैयार करते हैं, जिससे उनमें आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति की क्षमता बढ़ती है। इसलिए असली समस्या तकनीक नहीं बल्कि उसका असंतुलित और अव्यवस्थित उपयोग है।
यह भी एक वास्तविकता है कि कई स्कूल शैक्षणिक गतिविधियों के लिए मोबाइल या इंटरनेट का सहारा लेते हैं। ऑनलाइन कक्षाएं, होमवर्क की जानकारी और शैक्षणिक प्रोजेक्ट्स के लिए डिजिटल संसाधन तेजी से आवश्यक होते जा रहे हैं। ऐसे में पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक कठिनाइयां भी पैदा कर सकता है।
निस्संदेह सरकार की ओर से किया गया यह ऐलान एक महत्वपूर्ण सामाजिक समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करता है। यदि इस पर गंभीर चर्चा और प्रभावी नीतियां बनती हैं, तो संभव है कि आने वाली पीढ़ियों को स्क्रीन की अनियंत्रित दुनिया से कुछ हद तक सुरक्षित रखा जा सके। लेकिन इसके लिए कानून के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता, शैक्षणिक मार्गदर्शन और पारिवारिक जिम्मेदारियों की भी समान भूमिका आवश्यक होगी।
आज के दौर में तकनीक से पूरी तरह दूरी बनाना संभव नहीं है। जरूरत इस बात की है कि नई पीढ़ी को इसके संतुलित, जिम्मेदार और जागरूक उपयोग का तरीका सिखाया जाए। क्योंकि असली चुनौती मोबाइल को खत्म करना नहीं, बल्कि इंसान और तकनीक के बीच एक स्वस्थ संबंध स्थापित करना है।
यदि समाज, माता-पिता, शैक्षणिक संस्थान और सरकार मिलकर इस मुद्दे को गंभीरता से समझें, तो निश्चित रूप से नई पीढ़ी को एक संतुलित और स्वस्थ डिजिटल भविष्य दिया जा सकता है।
लेखक: अब्दुल हलीम मंसूर
ईमेल: haleemmansoor@gmail.com
Source: Haqeeqat Times







