अमेरिका-इज़रायल के संयुक्त हमले में आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि के बाद कश्मीर, खासकर श्रीनगर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए. लाल चौक पर हजारों लोग जुटे, काले झंडे लहराए गए और बंद का आह्वान किया गया. यह प्रतिक्रिया ईरान-कश्मीर के गहरे ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्तों को भी दर्शाती है.

 

नई दिल्ली: अमेरिका-इज़रायल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि होते ही जम्मू-कश्मीर, खासकर श्रीनगर और घाटी के अन्य हिस्सों में अभूतपूर्व प्रतिक्रिया देखने को मिली. रविवार (1 मार्च) सुबह से ही पुराने श्रीनगर की खिड़कियों पर काले झंडे लटक गए, गलियों में ख़ामेनेई की तस्वीर लिए लोग नारे लगाते हुए निकले और लाल चौक में हजारों की भीड़ जमा हो गई.

स्थानीय ख़बरों के मुताबिक, विरोध प्रदर्शनों के बीच घाटी के कई हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं धीमी कर दी गईं या सीमित कर दी गईं. कुछ यूजर्स ने सोशल मीडिया पर शिकायत की कि मोबाइल डेटा की स्पीड कम कर दी गई है. एनडीटीवी के अनुसार, प्रशासन ने श्रीनगर में एहतियातन मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाई है. सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों को दो दिन के लिए बंद करने की घोषणा की है.

लाल चौक में आंसू और नारों की गूंज

ईरान की ओर से रविवार तड़के ख़ामेनेई की मौत की पुष्टि के बाद श्रीनगर की सड़कों पर हजारों लोग उतर आए. बड़ी संख्या में शिया समुदाय के लोग, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे, घंटाघर के पास एकत्र हुए. प्रदर्शनकारियों की आंखों में आंसू थे और वे ख़ामेनेई के समर्थन तथा अमेरिका और इज़रायल के खिलाफ नारे लगा रहे थे.

हालांकि यह विरोध केवल शिया समुदाय तक सीमित नहीं रहा. कई सुन्नी मुस्लिम भी सड़कों पर उतरे. कश्मीर टाइम्स के मुताबिक, एक प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘उन्हें अमेरिका और इज़रायल ने बेरहमी से मार डाला. यह हम सबके लिए दुखद क्षण है.’

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने इसे ‘इतिहास का गहरा दुखद और शर्मनाक क्षण’ बताया.

वहीं, कश्मीर के प्रमुख धार्मिक नेता और मुताहिदा मजलिस-ए-उलेमा के प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक ने सोमवार (2 मार्च) को पूर्ण बंद का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि ‘जम्मू-कश्मीर के लोग इस बर्बरता की सामूहिक निंदा करते हैं’ और लोगों से एकता, गरिमा और पूर्ण शांति के साथ बंद का पालन करने की अपील की.

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सभी समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की. उन्होंने कहा कि शोक मना रहे लोगों को शांतिपूर्वक दुख व्यक्त करने दिया जाए और प्रशासन संयम बरते. साथ ही उन्होंने बताया कि राज्य सरकार विदेश मंत्रालय के साथ समन्वय में है ताकि ईरान में रह रहे जम्मू-कश्मीर के छात्रों और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.

1980 की वह यात्रा, जिसने इतिहास बदल दिया

ख़ामेनेई की मौत पर कश्मीर में उमड़ा यह जनसैलाब अचानक नहीं है. इसके पीछे सात सदियों पुराना सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रिश्ता है, जिसे 1980 की एक ऐतिहासिक यात्रा ने और गहरा कर दिया था.

ईरानी इस्लामी क्रांति के एक वर्ष बाद, 1980 के उत्तरार्ध या 1981 की शुरुआत में, उस समय अपेक्षाकृत कम चर्चित ईरानी मौलाना अली ख़ामेनेई कश्मीर आए थे. उन्होंने श्रीनगर की जामिया मस्जिद में तत्कालीन मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारूक के निमंत्रण पर भाषण दिया था.

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वह भाषण महज 15-20 मिनट का था, लेकिन उसका प्रभाव दूरगामी रहा. उस समय घाटी में शिया-सुन्नी विभाजन काफी तीखा था. लेकिन ख़ामेनेई ने जामिया मस्जिद (जो सुन्नियों का प्रमुख उपासना स्थल है) में खड़े होकर नमाज अदा की और एकता का संदेश दिया. बाद में कई स्थानीय विद्वानों ने लिखा कि उस भाषण के बाद दोनों समुदायों के बीच धार्मिक मेलजोल में उल्लेखनीय बदलाव आया.

ईरान-कश्मीर: राजनीति से परे आध्यात्मिक डोर

कश्मीर और ईरान का संबंध केवल आधुनिक राजनीति का परिणाम नहीं है. 14वीं शताब्दी से फारसी सूफी संतों का कश्मीर आगमन इस रिश्ते की बुनियाद रहा है. सैयद शरफुद्दीन बुलबुल शाह, मीर सैयद अली हमदानी (शाह-ए-हमदान) और मीर सैयद शम्सुद्दीन अराकी जैसे संतों ने घाटी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को गहराई से प्रभावित किया.

फारसी भाषा 19वीं सदी के अंत तक कश्मीर के दरबार की भाषा रही. घाटी में पाए जाने वाले उपनाम (सरनेम), हमदानी, काशानी, सब्जवारी, किरमानी, ईरानी शहरों से जुड़े हैं. श्रीनगर की ऐतिहासिक मस्जिदों की छतों की नक्काशी, शाह-ए-हमदान मस्जिद की वास्तुकला और विश्वप्रसिद्ध पेपर माशे कला की जड़ें भी फारस से जुड़ी हैं.

आज भी बडगाम और श्रीनगर के कुछ हिस्सों में रहने वाला शिया समुदाय धार्मिक मार्गदर्शन के लिए ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेतृत्व की ओर देखता है. उनके लिए ख़ामेनेई केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि ‘वली-ए-फकीह’ (सर्वोच्च धार्मिक प्राधिकारी) थे. इस दृष्टि से उनकी मौत को कई लोग व्यक्तिगत क्षति की तरह देख रहे हैं.

जटिल राजनीतिक संतुलन

हालांकि यह भावनात्मक रिश्ता गहरा है, ईरान की आधिकारिक नीति हमेशा संतुलित रही है. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान ने कश्मीर के मुसलमानों के प्रति नैतिक समर्थन जताया, लेकिन पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर नहीं आया. 1994 में ईरान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के खिलाफ प्रस्ताव को रोकने में भूमिका निभाई थी.

इसके बावजूद, ख़ामेनेई ने कई बार अपने भाषणों में कश्मीर का उल्लेख किया. 2017 में उन्होंने कश्मीर को यमन और बहरीन के साथ ‘मुस्लिम दुनिया के जख्म’ के रूप में बताया था. 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद भी उन्होंने भारत से कश्मीरियों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार की अपील की थी.

शिक्षा और मानवीय संबंध

पिछले वर्षों में ईरान कश्मीरी छात्रों, खासकर मेडिकल शिक्षा के लिए, एक प्रमुख केंद्र बना है. तेहरान यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज और क़ोम के धार्मिक शिक्षण संस्थानों में सैकड़ों छात्र पढ़ते हैं.

क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने पर भारत सरकार को समय-समय पर इन छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी पड़ी है.

इतिहास, आस्था और वर्तमान

ख़ामेनेई के निधन की खबर ने कश्मीर में जो भावनात्मक लहर पैदा की है, वह केवल एक अंतरराष्ट्रीय घटना पर प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था, सांस्कृतिक स्मृति और राजनीतिक अनुभवों का संगम है.

लाल चौक में उमड़ी भीड़, जामिया मस्जिद की ऐतिहासिक यादें, फारसी विरासत और आज की भू-राजनीतिक जटिलताएं, ये सब मिलकर कश्मीर और ईरान के उस रिश्ते को रेखांकित करती हैं, जो सीमाओं और सरकारों से परे जाकर लोगों के दिलों में बसा हुआ है.

Source: The Wire