औरत और रमज़ान: ईसार की अनकही दास्तान
रमज़ान की ठंडी सहर हो या तपती दोपहर की गर्मी, जब घर वाले गहरी नींद में होते हैं, तब एक औरत अल्लाह की रज़ा और अपने ख़ानदान की ख़िदमत के लिए जाग रही होती है। वह रसोई की गर्मी सहती है, यह उसकी मजबूरी नहीं बल्कि अपनों के रोज़ों की फ़िक्र उसे बेदार रखती है। यह ईसार की वह कहानी है जो अक्सर समाज में दब जाती है, मगर रमज़ान में उसकी अहमियत साफ़ नज़र आती है।
औरत के लिए रमज़ान सिर्फ़ भूखा-प्यासा रहना नहीं, बल्कि सब्र और मोहब्बत का इम्तिहान है। एक हाथ से खाना पकाती है और दूसरे हाथ में तस्बीह थामे रहती है। सहर और इफ्तार की तैयारी उसके लिए इबादत है, क्योंकि वह जानती है कि रोज़ेदार को खाना खिलाने का कितना बड़ा सवाब है। माँ खुद प्यास सहकर बच्चों के लिए पसंदीदा शरबत बनाती है; बीवी थकान के बावजूद दस्तरख़्वान सजाती है; बेटी तिलावत से वक़्त निकालकर माँ का हाथ बँटाती है। यह ख़िदमत और मोहब्बत का खूबसूरत संगम है।
अक्सर लोग समझते हैं कि रसोई में व्यस्त औरत इबादत से दूर है, मगर हक़ीक़त यह है कि उसकी “ख़िदमत-ए-ख़ल्क़” उसे अल्लाह के और क़रीब कर देती है। इफ्तार के आख़िरी लम्हों में, जब वह थकी हुई होती है, तब भी दुआ के लिए हाथ उठाती है। उसकी दुआएँ सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि घर की सलामती, बच्चों की रहनुमाई और पूरी उम्मत के अमन के लिए होती हैं।
ईसार की मिसाल यह है कि वह सबको पहले पानी देती है और खुद आख़िर में पीती है। थकान के बावजूद तरावीह में खड़ी होती है—जिस्म थकता है, मगर ईमान मज़बूत रहता है। रमज़ान में औरत वह चराग़ है जो खुद जलकर घर को रोशनी और सुकून देती है।
आज के बदलते दौर में, जब औरत तालीम और रोज़गार दोनों में आगे बढ़ रही है, रमज़ान यह याद दिलाता है कि घर की मेहनत भी बड़ी इबादत है। मर्दों को चाहिए कि वे इस ज़िम्मेदारी में शरीक हों, ताकि रमज़ान का पैग़ाम घर और समाज दोनों को मज़बूती दे।
अल्लाह तआला तमाम माओं, बहनों और बेटियों की इस मेहनत और इबादत को क़ुबूल फ़रमाए।
लेखक: जमी़ल अहमद मलनसार
Source: Haqeeqat Times (Translated in hindi)







