डॉ. बी.आर. अंबेडकर की दूरअंदेशी (दूरदर्शिता) बेहद अहम थी। मुल्क के तक़सीम (विभाजन) से हुई लाखों मौतों का दर्द उनके सामने था, इसलिए उन्होंने मजहब के आधार पर सियासी अलगाव का सख्त मुखालफ़त किया। लेकिन साथ ही मजहबी और सक़ाफ़ती (सांस्कृतिक) हक़ों को बुनियादी हक़ (Fundamental Rights) बनाया। आंबेडकर का हिंदुस्तान न हिंदू राष्ट्र था, न मुस्लिम राष्ट्र—बल्कि एक दस्तूरी (संवैधानिक) राष्ट्र था।
दस्तूर (संविधान) बराबरी का मौका देता है, नतीजों की बराबरी नहीं। इंतिख़ाब (चुनाव) लड़ना हर शख्स का हक़ है, लेकिन जिताना अवाम (मतदाताओं) के फैसले पर निर्भर करता है।
आज ये बहस जारी है कि क्या दस्तूर बनाते वक्त मुसलमानों को मुनासिब नुमाइंदगी (प्रतिनिधित्व) दी गई थी। लेकिन दस्तूर सभा की कारवाई, आंबेडकर के ख़िताबात (भाषण) और दस्तूरी प्रावधान साफ बताते हैं कि मुसलमानों को बाहर नहीं, बल्कि शामिल किया गया था। 1946 की दस्तूर सभा में 389 अरकान (सदस्य) थे, जिनमें 93 सीटें मुस्लिम लीग के लिए थीं। तक़सीम के बाद भी 28–30 मुस्लिम अरकान आख़िर तक मौजूद रहे और 24 जनवरी 1950 को दस्तूर पर दस्तखत किए।
अबुल कलाम आज़ाद बुनियादी हक़ों की कमेटी में थे, सैयद मोहम्मद सादुल्ला ड्राफ्टिंग कमेटी का हिस्सा थे, और बेगम एजाज़ रसूल दस्तूर सभा की वाहिद (एकमात्र) मुस्लिम ख़ातून रुक्न थीं। आंबेडकर ने इन सबकी राय और तरमीम (संशोधन) को शामिल किया।
दस्तूर में अक़लियतों (अल्पसंख्यकों) के तहफ़्फ़ुज़ (सुरक्षा) के लिए कई इंतज़ाम किए गए। आर्टिकल 14 बराबरी देता है, आर्टिकल 15 मजहब के आधार पर तफ़रीक़ (भेदभाव) को रोकता है, आर्टिकल 25 मजहबी आज़ादी देता है, आर्टिकल 26 मजहबी इदारे चलाने का हक़ देता है, आर्टिकल 29 ज़बान और सक़ाफ़त की हिफ़ाज़त करता है, और आर्टिकल 30 तालीमी इदारे चलाने का हक़ देता है।
आंबेडकर ने अलग इंतिख़ाबी निज़ाम (Separate Electorate) का विरोध किया। 1949 में दस्तूर सभा ने मुसलमानों के लिए अलग इंतिख़ाब को रद्द कर दिया। इसके पीछे तीन वजहें थीं—कौमी यकजहती (राष्ट्रीय एकता), दलित तजुर्बा, और खुद मुस्लिम रहनुमाओं की रज़ामंदी। वल्लभभाई पटेल ने भी कहा कि जब अक़लियत खुद नहीं चाहती, तो उसे ज़बरदस्ती लागू करना सही नहीं।
आंबेडकर ने अपनी किताब Thoughts on Pakistan में मजहबी सियासत के नुक्सानात (नुकसान) को वाजेह किया। उन्होंने कहा कि एक ही मुल्क में अलग-अलग क़ानून नहीं होने चाहिए—आर्टिकल 44 (Uniform Civil Code) का मकसद यकसानी (एकरूपता) है, किसी मजहब की मुखालफ़त नहीं।
इंतिख़ाब और नुमाइंदगी के मसले पर दस्तूर ये नहीं कहता कि किसी सियासी पार्टी को मुसलमानों को टिकट देना ही होगा। आर्टिकल 14 और 15 रियासत (State) पर लागू होते हैं, सियासी पार्टियों पर नहीं। Representation of People Act 1951 की धारा 123(3) मजहब के नाम पर वोट मांगने को गलत करार देती है।
दस्तूर में रिजर्वेशन सिर्फ SC, ST और खवातीन के लिए है, मुसलमानों के लिए कोई सियासी रिजर्वेशन नहीं। लेकिन नुमाइंदगी के लिए तीन रास्ते दिए गए—वोट का इस्तेमाल, अदालत का सहारा, और सियासी तंज़ीम (संगठन) बनाकर दबाव डालना।
आंबेडकर ने कहा था कि सियासी जम्हूरियत (लोकतंत्र) तभी कामयाब होगी जब समाजी जम्हूरियत भी मजबूत हो। उन्होंने एक तरफ मजहबी और सक़ाफ़ती हक़ों की गारंटी दी, तो दूसरी तरफ समाज को मिलकर जम्हूरी अमल में हिस्सा लेने की दावत दी।
आख़िर में आंबेडकर का अहम कौल—“दस्तूर कितना भी अच्छा हो, अगर उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह भी नाकाम हो जाएगा।” यानी नुमाइंदगी का मसला सिर्फ क़ानून का नहीं, बल्कि सियासी इरादा और समाजी शऊर (जागरूकता) का भी है।
Source: Vartha Bharathi (Translated in Hindi)

