नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चुनावी मंचों पर देश में ‘घुसपैठियों’ की संख्या को लेकर बड़े दावे कर रहे हैं। अन्य भाजपा नेता भी इस मुद्दे पर लगातार बयान दे रहे हैं। हाल ही में असम में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए शाह ने कहा कि राज्य के सात जिलों पर ‘64 लाख घुसपैठियों ने कब्जा कर लिया है।’ उन्होंने इस स्थिति के लिए कांग्रेस के दो दशकों के शासन को जिम्मेदार ठहराते हुए दावा किया कि केवल भाजपा ही इस घुसपैठ को रोक सकती है।
हालांकि, सूचना के अधिकार (RTI) कार्यकर्ता कन्हैया कुमार द्वारा घुसपैठियों से संबंधित जानकारी मांगते हुए दायर आवेदन पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के जवाब ने शाह और अन्य भाजपा नेताओं के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। thewire.in की रिपोर्ट के अनुसार, RTI आवेदन में पिछले 10 वर्षों (या उपलब्ध शुरुआती वर्ष से) के दौरान देशभर में पहचाने गए/गिरफ्तार किए गए तथा निर्वासित/वापस भेजे गए घुसपैठियों की वर्षवार संख्या और उनकी राष्ट्रीयता से संबंधित जानकारी मांगी गई थी।
गृह मंत्रालय ने 23 जनवरी 2026 को दिए अपने उत्तर में स्पष्ट किया कि मांगी गई जानकारी से संबंधित कोई केंद्रीकृत डेटा उसके पास उपलब्ध नहीं है।
अपने जवाब में मंत्रालय ने यह भी कहा कि विदेशी नागरिक अधिनियम के तहत अवैध विदेशी नागरिकों/अवैध प्रवासियों की पहचान करना, उनकी आवाजाही पर नियंत्रण रखना और उन्हें निर्वासित करना राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन की जिम्मेदारी है। यह जवाब ऐसे समय में सामने आया है जब अमित शाह देश के विभिन्न हिस्सों में बड़ी संख्या में ‘घुसपैठियों’ की मौजूदगी का बार-बार उल्लेख कर रहे हैं।
1 अक्टूबर 2025 को ‘दैनिक जागरण’ द्वारा आयोजित नरेंद्र मोहन स्मारक व्याख्यान में ‘घुसपैठ, जनसंख्या परिवर्तन और लोकतंत्र’ विषय पर बोलते हुए अमित शाह ने कहा था कि भारत में मुस्लिम आबादी बढ़ने का कारण केवल प्रजनन दर नहीं बल्कि व्यापक घुसपैठ है। उन्होंने पहले भी कई मौकों पर अवैध घुसपैठ को देश की सुरक्षा और जनसंख्या संरचना के लिए गंभीर खतरा बताया है।
हालांकि RTI के जवाब ने यह सवाल खड़ा किया है कि जब गृह मंत्रालय के पास घुसपैठ से संबंधित कोई आधिकारिक केंद्रीकृत डेटा नहीं है, तो चुनावी मंचों पर लाखों घुसपैठियों की संख्या कैसे तय की जा रही है।
यह विरोधाभास न केवल सरकारी दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि ‘घुसपैठ’ जैसे संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक भाषणों में किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। गृह मंत्रालय के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हर्ष मंदर ने कहा कि यह बेहद अजीब है। उदाहरण के तौर पर, हत्या जैसे अपराधों का डेटा राज्य इकट्ठा करते हैं, लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) उसे संकलित कर प्रकाशित करता है। यदि राज्यों के पास डेटा है तो केंद्र सरकार उसे संकलित करने में सक्षम है, इसलिए मंत्रालय का यह तर्क पूरी तरह संतोषजनक नहीं लगता।
मंदर ने यह भी कहा कि पिछले 12 वर्षों से एक विशेष समुदाय को यह संदेश दिया जा रहा है कि उसके ‘अधिकारों का अधिकार’ कभी भी जांच के दायरे में आ सकता है, जिससे पूरे समुदाय को स्थायी भय की स्थिति में रखा जा सके। उन्होंने ‘घुसपैठिया’ शब्द पर भी चिंता जताते हुए कहा कि भारतीय कानून में इस शब्द की स्पष्ट परिभाषा मौजूद नहीं है।
Source: Vartha Bharathi (Translated in hindi)







