मध्य पूर्व की वर्तमान स्थिति केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं है, बल्कि यह इस्लामी देशों की नैतिकता और कूटनीति की अग्निपरीक्षा बन चुकी है।

ईरान पर लगातार हमले हो रहे हैं, फिर भी प्रभावशाली मुस्लिम राष्ट्रों की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। क्या यह मौन महज़ कूटनीतिक विवशता है या फिर इज़राइल के साथ पर्दे के पीछे हुए समझौतों का हिस्सा? क्या इस्लामी एकता की अवधारणा केवल कागज़ों तक सिमट कर रह गई है? क्या कुछ अरब देश भीतर ही भीतर ईरान की कमजोरी से संतुष्ट हैं? ये प्रश्न आज वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं।

मुस्लिम देशों की इस चुप्पी के पीछे गहरे वैचारिक और भू-राजनीतिक कारण हैं। दशकों से सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सुन्नी गुट और ईरान के नेतृत्व वाले शिया धड़े के बीच एक अघोषित शीत युद्ध जारी है। यमन, सीरिया और लेबनान में ईरान समर्थित प्रभाव का विस्तार खाड़ी देशों के लिए चिंता का विषय रहा है। ऐसे में ईरान पर हमले के समय भले ही ये देश सार्वजनिक रूप से शांति की अपील करें, लेकिन आंतरिक रूप से ईरान की शक्ति में कमी को अपनी सुरक्षा के लिए लाभकारी मान रहे हैं।

इस मौन का दूसरा बड़ा कारण अमेरिका पर आर्थिक और सैन्य निर्भरता है। हाल के वर्षों में ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ के तहत कई अरब देशों ने इज़राइल के साथ संबंध सामान्य किए हैं। अमेरिकी सुरक्षा छत्र और इज़राइली तकनीक उनके लिए रणनीतिक आवश्यकता बन चुके हैं। ऐसे में वे अपनी आर्थिक स्थिरता को खतरे में डालकर खुलकर ईरान के पक्ष में खड़े होने को तैयार नहीं हैं। यहां धार्मिक एकजुटता से अधिक राष्ट्रीय हित और सत्ता सुरक्षा प्राथमिकता बन चुके हैं।

इस राजनीतिक समीकरण में ईरान का बढ़ता एकांत पूरे इस्लामी विश्व की विभाजित तस्वीर उजागर कर रहा है। इज़राइल क्षेत्र में नए समीकरण गढ़ रहा है और ईरान के कमजोर पड़ने की स्थिति में अपनी सैन्य और कूटनीतिक पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहा है।

पाकिस्तान इस संघर्ष में सबसे जटिल स्थिति में है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब और क़तर जैसी अर्थव्यवस्थाओं का सहयोग अनिवार्य है। सैन्य क्षमता और परमाणु शक्ति के बावजूद पाकिस्तान अमेरिकी प्रभाव वाले अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों—आईएमएफ और विश्व बैंक—पर निर्भर है। यही कारण है कि वह इज़राइल की आलोचना तो करता है, लेकिन अमेरिका का नाम लेने से बचता है।

पाकिस्तान को अमेरिका से एफ-16 विमानों के पुर्ज़ों और सैन्य सहायता की आवश्यकता है। ऐसे में खुलकर ईरान के साथ खड़ा होना उसके लिए व्यावहारिक रूप से कठिन है।

अमेरिका की आंतरिक राजनीति भी इस युद्ध की दिशा तय कर रही है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस संघर्ष को अपनी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। हालांकि अमेरिका के भीतर फिलिस्तीन के समर्थन में बढ़ती जनभावना और युद्ध पर होने वाले खर्च को लेकर असंतोष उनकी रणनीति को प्रभावित कर सकता है।

ईरान की रणनीति प्रत्यक्ष टकराव के बजाय लंबी और थकाऊ लड़ाई की है। वह अपने अत्याधुनिक हथियारों को सुरक्षित रखते हुए सीमित संसाधनों से विरोधी की रक्षा प्रणाली को थकाने की कोशिश कर रहा है। उसका उद्देश्य युद्ध को लंबा खींचकर राजनीतिक और आर्थिक दबाव बढ़ाना है।

इस संघर्ष का परिणाम केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। यदि वहां सत्ता परिवर्तन होता है तो पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता की नई लहर उठ सकती है। ईरान जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सत्ता शून्य की स्थिति गृहयुद्ध का रूप ले सकती है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

इतिहास गवाह है कि अमेरिका शासन परिवर्तन कराने में सफल रहा है, लेकिन स्थायी शांति स्थापित करने में बार-बार असफल भी रहा है। ऐसे में मध्य पूर्व का भविष्य अनिश्चितता से घिरा हुआ है।

युद्ध किसी को स्थायी विजेता नहीं बनाता। इसके घाव आने वाले दशकों तक क्षेत्रीय राजनीति और समाज में गहरे असर छोड़ते हैं। वर्तमान संकट भी उसी दिशा में बढ़ता प्रतीत हो रहा है।