नई दिल्ली : ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने केंद्र सरकार द्वारा जारी उस नोटिफिकेशन पर कड़ा विरोध जताया है, जिसके तहत सरकारी कार्यक्रमों और शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रीय गान “जन गण मन” से पहले “वंदे मातरम्” के सभी अंतरों का पाठ अनिवार्य किए जाने की बात कही गई है। बोर्ड ने इस फैसले को असंवैधानिक, धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ और सेक्युलर मूल्यों के विपरीत बताया है।

बोर्ड के महासचिव मौलाना मोहम्मद फज़लुर रहीम मुजद्ददी ने एक प्रेस बयान में कहा कि सरकार का यह कदम न केवल भारतीय संविधान की भावना के खिलाफ है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों से भी टकराता है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों से सीधे टकराता है, इसलिए इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मौलाना मुजद्ददी ने स्पष्ट किया कि रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह और संविधान सभा में हुई चर्चाओं के बाद यह सहमति बनी थी कि “वंदे मातरम्” के केवल शुरुआती दो अंतरे ही पढ़े जाएंगे। उन्होंने कहा कि एक सेक्युलर सरकार किसी एक धर्म से जुड़े विचारों या धार्मिक व्याख्याओं को अन्य धर्मों के लोगों पर थोप नहीं सकती।

उन्होंने आगे कहा कि यह गीत बंगाल के ऐतिहासिक संदर्भ में लिखा गया था, जिसमें देवी दुर्गा और अन्य हिंदू देवी-देवताओं की स्तुति का उल्लेख है। बोर्ड के अनुसार, इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत का सिद्धांत है और किसी भी प्रकार की शिर्क की अनुमति नहीं है, इसलिए मुसलमानों के लिए ऐसे अंशों का पाठ संभव नहीं है जो उनके मूल धार्मिक विश्वासों के विरुद्ध हों।

बोर्ड के महासचिव ने यह भी दावा किया कि अदालतों ने पहले कुछ अंशों को सेक्युलर मूल्यों के विपरीत मानते हुए उनकी अनिवार्य तिलावत पर रोक लगाई थी। उन्होंने केंद्र सरकार से तुरंत उक्त नोटिफिकेशन वापस लेने की मांग की है, अन्यथा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसे अदालत में चुनौती देगा।

Source: Haqeeqat Times (Translated in Hindi)