डिजिटल मोहब्बत, ऑनलाइन खेल और कम उम्र के दिमाग
एक खामोश सामाजिक संकट की दस्तक
गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की दुखद मौत ने डिजिटल दौर के एक ऐसे पहलू को उजागर कर दिया है, जिस पर आम तौर पर गंभीर संवाद कम और अस्थायी चिंता अधिक दिखाई देती है। यह घटना केवल एक पारिवारिक त्रासदी या कुछ पलों की खबर नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक संकट का संकेत है, जो हमें फिर से यह सोचने पर मजबूर करती है कि ऑनलाइन दुनिया, खासकर गेम्स और सोशल प्लेटफॉर्म, हमारे बच्चों और किशोरों के मन पर किस हद तक प्रभाव डाल रहे हैं।
प्रारंभिक जांच के अनुसार, 16, 14 और 12 वर्ष की तीनों बहनें एक ऑनलाइन कोरियाई टास्क-आधारित “लव गेम” में असामान्य रूप से शामिल थीं। उपलब्ध सबूतों से लगता है कि यह जुड़ाव केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे उनकी मानसिक दुनिया पर हावी हो गया। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, कम उम्र के बच्चे ऑनलाइन अनुभवों और वास्तविक जीवन के बीच स्पष्ट सीमा बनाने में अक्सर असफल रहते हैं, विशेषकर तब जब किसी खेल या डिजिटल गतिविधि को प्रेम, त्याग, गोपनीयता और “अंतिम परीक्षा” जैसे भावनात्मक विचारों से जोड़ दिया जाए। ऐसे में खेल केवल कल्पना नहीं रहता, बल्कि मानसिक दबाव का रूप ले सकता है।
इस त्रासदी की जानकारी इस आशंका को और मजबूत करती है। एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, तीनों बहनें बालकनी के पास एक साथ दिखाई दीं, मानो किसी सामूहिक निर्णय पर पहुंच चुकी हों। यह दृश्य संकेत देता है कि मामला किसी क्षणिक भावनात्मक प्रतिक्रिया का नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे मानसिक दबाव और मनोवैज्ञानिक उलझन का परिणाम हो सकता है। फॉरेंसिक विशेषज्ञ और जांच एजेंसियां डिजिटल उपकरणों, चैट्स और गेम से जुड़े कार्यों की बारीकी से जांच कर रही हैं, ताकि यह समझा जा सके कि ऑनलाइन निर्देशों और डिजिटल संवाद ने इन कम उम्र के दिमागों पर कैसा असर डाला।
यह पहला मौका नहीं है जब डिजिटल दुनिया किसी ऐसे हादसे से जुड़ी हो। 2017 में “ब्लू व्हेल चैलेंज” ने भारत सहित दुनिया के कई देशों में गंभीर चिंता पैदा की थी। उस समय भी शुरुआत में इन घटनाओं को अफवाह या व्यक्तिगत मामला समझकर नजरअंदाज किया गया, लेकिन बाद में कई जानों के नुकसान ने स्थिति की गंभीरता को उजागर कर दिया। गाजियाबाद की घटना इसी कड़वी सच्चाई की याद दिलाती है कि हमने अतीत से पूरी तरह सबक नहीं लिया और आज भी बच्चों की डिजिटल दुनिया को गंभीरता से समझने में पीछे हैं।
मनोवैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि आज का किशोर अपने ऑनलाइन अवतार या डिजिटल पहचान से भावनात्मक रिश्ता बना लेता है। धीरे-धीरे वास्तविक जीवन की समस्याएं, रिश्ते और जिम्मेदारियां पीछे छूटने लगती हैं और वर्चुअल दुनिया ही वास्तविक लगने लगती है। इस स्थिति में अकेलापन, कम संवाद, माता-पिता से दूरी और भावनात्मक अस्थिरता सामान्य हो जाते हैं। जब वास्तविक दुनिया में सुनने वाला कोई नहीं होता, तो ऑनलाइन दुनिया एक आकर्षक लेकिन झूठा सहारा देती है, जो कभी-कभी खतरनाक परिणाम तक ले जा सकता है।
असल सवाल यह नहीं कि ऑनलाइन गेम्स या तकनीक स्वयं गलत हैं। असली सवाल यह है कि क्या हमने अपने बच्चों को इस दुनिया के लिए मानसिक रूप से तैयार किया है? क्या माता-पिता जानते हैं कि उनके बच्चे स्क्रीन पर क्या देख रहे हैं, किससे बात कर रहे हैं और किन मानसिक चरणों से गुजर रहे हैं? कई घरों में बच्चों की खामोशी या मोबाइल का अधिक उपयोग व्यस्तता या आत्मनिर्भरता समझ लिया जाता है, जबकि यही खामोशी किसी अंदरूनी बेचैनी या मदद की मौन पुकार भी हो सकती है।
यह संकट केवल परिवारों तक सीमित नहीं है; शैक्षणिक संस्थान भी इस सामूहिक विफलता का हिस्सा हैं। स्कूल और कॉलेज बच्चों को परीक्षा, प्रतिस्पर्धा और परिणामों के लिए तो तैयार करते हैं, लेकिन जीवन के दबाव, असफलता के डर और मानसिक उलझनों से निपटने की व्यावहारिक शिक्षा बहुत सीमित है। मानसिक स्वास्थ्य आज भी हमारे शिक्षा तंत्र में द्वितीयक विषय माना जाता है, जबकि वैश्विक संस्थाएं लगातार चेतावनी दे रही हैं कि किशोरों में चिंता, अवसाद और मानसिक तनाव के मामलों में चिंताजनक वृद्धि हो रही है।
राज्य और नीति-निर्माताओं की जिम्मेदारी भी बेहद महत्वपूर्ण है। ऑनलाइन गेम्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए आयु सीमा, कंटेंट मॉनिटरिंग, मनोवैज्ञानिक चेतावनी और प्रभावी शिकायत प्रणाली को केवल कागजी नियमों तक सीमित रखना गंभीर लापरवाही है। ऐसे गेम्स या ऐप्स जो मनोवैज्ञानिक हेरफेर, भावनात्मक दबाव या आत्म-हानि की प्रवृत्ति को बढ़ावा दें, उनके खिलाफ तुरंत और सख्त कार्रवाई जरूरी है। किसी भी राज्य की असली परीक्षा यही है कि वह मानव जीवन को व्यावसायिक हितों से ऊपर रखे।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे चिंताजनक पहलू नई पीढ़ी का भविष्य है। ये वही बच्चे हैं जिनके हाथों में कल की बागडोर होनी चाहिए थी, लेकिन हमने उन्हें ऐसे बोझ दे दिए हैं जिन्हें उनके नाजुक मन सह नहीं सकते। हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं जो दिखने में आधुनिक, जागरूक और प्रतिभाशाली है, लेकिन भीतर से गहरे अकेलेपन, अनिश्चितता और दबाव से जूझ रही है। यदि इस सच्चाई को आज गंभीरता से स्वीकार नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में ऐसे हादसे सामान्य बन सकते हैं।
गाजियाबाद की घटना एक स्पष्ट चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि बच्चों को नियंत्रण नहीं बल्कि ध्यान की जरूरत है, निगरानी नहीं बल्कि साथ की जरूरत है, और उपदेश नहीं बल्कि संवाद की आवश्यकता है। समस्या तकनीक नहीं, बल्कि हमारी प्राथमिकताएं, हमारी खामोशी और हमारी सामूहिक लापरवाही है। यदि आज हमने नई पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक सुरक्षा और मानवीय रिश्तों को गंभीरता से नहीं लिया, तो कल हमारे पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचेगा।
गाजियाबाद का यह हादसा हमें केवल दुखी ही नहीं करता, बल्कि बेचैन भी करता है। यह हमें आईना दिखाता है कि हमने विकास, सुविधा और व्यस्तता के नाम पर बच्चों से बातचीत का दरवाजा कब बंद कर दिया। आज का कम उम्र का मन इस शोर भरी दुनिया में सबसे अधिक ध्यान, सुरक्षा और मार्गदर्शन का जरूरतमंद है, लेकिन वही सबसे अधिक अकेला छोड़ दिया गया है। स्क्रीन के पीछे छिपी दुनिया ने रिश्तों की गर्माहट छीन ली है, और हमने खामोशी को सुकून समझने की खतरनाक गलती की है।
यह त्रासदी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि अगर बच्चे अपने डर, उलझन और दबाव को माता-पिता, शिक्षकों या समाज से साझा नहीं कर पा रहे, तो वे कहां जाएंगे? ऑनलाइन खेल, वर्चुअल रिश्ते और डिजिटल चुनौतियां इस खालीपन को भरने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह खालीपन भरता नहीं बल्कि और गहरा हो जाता है। यह केवल तीन जिंदगियों का अंत नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक विवेक, प्राथमिकताओं और जिम्मेदारियों पर लगा एक प्रश्नचिह्न है।
यदि आज भी हमने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को एक गौण विषय समझा, यदि हमने संवाद की जगह खामोशी को चुना, और यदि तकनीक के उपयोग को नैतिक और मानवीय दायरे में रखने की गंभीर कोशिश नहीं की, तो भविष्य और अधिक कड़वी खबरें लेकर आएगा। गाजियाबाद की घटना हमें चेतावनी दे रही है कि अभी भी समय है — सुनने का, समझने का और संभालने का। वरना हम ऐसी पीढ़ी के वारिस होंगे जो सब कुछ जानती होगी, मगर जीने की ताकत खो चुकी होगी।
“ये कैसा दौर है कि सब कुछ तो है मगर कुछ भी नहीं,
वो बात जो दिल को छू ले, अब दिल में उतरती ही नहीं।”
लेखक: अब्दुल हलीम मंसूर
Source: Haqeeqat Times (Translated In Hindi)







