उत्तम नगर में जो हो रहा है, होने दिया जा रहा है या किया जा रहा है, वह सिर्फ़ ग़लत नहीं, अपराध है. मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का प्रचार अपराध है. नफ़रत के उस प्रचार की इजाज़त देना उस जुर्म में शरीक़ होना है. समाज के हर तबके को सुरक्षा देना, उसका अहसास दिलाना सरकार की ज़िम्मेदारी है. वह क्यों मुसलमानों की सुरक्षा के लिए ख़ुद को जवाबदेह नहीं मानती?
उत्तम नगर में शांति है. उत्तम नगर में अशांति की आशंका है. स्थानीय प्रशासन सराहनीय काम कर रहा है. वह उस भीड़ को हिंसा की इजाज़त नहीं दे रहा जो मुसलमानों को काट डालना चाहती है. लेकिन वह ऐसी भीड़ को जुलूस निकालने और हिंसक, मुसलमान विरोधी नारे लगाने से रोक नहीं रहा है. यह हिंसा है या नहीं, इस पर दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक चर्चा कर सकते हैं. यानी जब आपको रह रह कर ऐसे नारे सुनाई दें जो आपकी क़ब्रों को भी तबाह कर देने की धमकी दे रहे हों, तो आप पर क्या असर होता है?
अगर आप प्रशासन से कहें कि वह ऐसी भीड़ को इकट्ठा क्यों होने दे रहा है, तो शायद उनका जवाब होगा कि वह चाहती है कि उनके दिल का ग़ुबार निकल जाए. वह मुसलमानों के खून से होली खेलने के नारों को बस नारेबाज़ी तक रोक लेना चाहती है. मुसलमान यह कहें कि ऐसी भीड़ और ऐसे नारों से उनको दहशत होती है तो वह उन्हें इसे एक हिंदू की हत्या पर हिंदुओं की स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानकर बर्दाश्त करने की सलाह दे सकती है. आख़िर एक हिंदू मरा है, क्या बाकी हिंदुओं का खून नहीं खौलेगा? मुसलमानों को ख़ैर मनानी चाहिए कि बात सिर्फ़ धमकी वाले नारों तक सीमित है. पुलिस ने अब तक भीड़ की यह मांग नहीं मानी है कि वह पंद्रह मिनट के लिए हट जाए.
वैसे यह समझ में नहीं आता कि जो हिंसा करना चाहते हैं, वे पुलिस के हटने की मांग क्यों कर रहे हैं? तरुण खटिक की हत्या के आरोपियों के घर को पुलिस की निगरानी में जलाया गया और उसमें लूटपाट की गई. पुलिस ने पूरी तरह हिंसक भीड़ के साथ सहयोग किया. यह भारत में पुलिस के सामान्य रिकॉर्ड के मेल में ही है.
1984 में सिर्फ़ दिल्ली नहीं, भारत के दूसरे हिस्सों में भी इंदिरा गांधी की हत्या से क्षुब्ध हिंदुओं को पुलिस ने इजाज़त दी थी कि वे जितना चाहें, सिखों को लूटें, मारें. हाशिमपुरा में तो पुलिस के साथ फ़ौज के जवानों ने भीड़ को इजाज़त ही नहीं दी थी, बल्कि ख़ुद मुसलमानों को मारा था. मुसलमानों को आज़ादी से बाद से इसका तजुर्बा है कि उनके ख़िलाफ़ हिंसा के वक्त पुलिस किस तरह हिंसक हिंदू भीड़ की सहयोगी भूमिका निभाती है.
आश्चर्य नहीं कि दिल्ली में 2020 में हिंसक हिंदू झुंड नारे लगा रहे थे, ‘दिल्ली पुलिस लट्ठ चलाओ, हम तुम्हारे साथ हैं.’ आम तौर पर पुलिस से डरने वाली जनता को किस समय वह अपनी लगने लगती है? मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा के वक्त हिंदूओं और पुलिस की यह एकता भारत की एक सच्चाई है.
फिर भी यह सच है कि उत्तम नगर में किसी मुसलमान की हत्या नहीं होने दी गई है. सिर्फ़ उनकी हत्या की धमकी के नारे लगाने की अनुमति है. इतना भी, एक स्थानीय मुसलमान के अनुसार, सराहनीय है. पुलिस किसी की अभिव्यक्ति की आज़ादी कैसे छीन सकती है?
जंतर मंतर पर मुसलमानों के जनसंहार के नारे की इजाज़त भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दी गई थी. यह अभिव्यक्ति की आज़ादी भारत में सिर्फ़ हिंदुओं को है. मुसलमान अगर ईरान पर हमले के ख़िलाफ़ जुलूस निकालना चाहें, तो पुलिस अधिकारी उन्हें ईरान चले जाने की सलाह देते हैं. वे ईद के दिन सामूहिक नमाज़ भी नहीं पढ़ सकते. पुलिस के मुताबिक़, इससे अशांति पैदा होती है. लेकिन अगर हिंदू मुसलमानों के क़त्लेआम की धमकी देते हुए सभा करें या जुलूस निकालें तो यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का इस्तेमाल है.
जैसा कहा जाता है, स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है. सिर्फ़ घर और मकान तोड़े जा रहे हैं. नियमानुसार. प्रायः मुसलमानों के. यह सरकारी या सार्वजनिक ज़मीन पर अतिक्रमण के ख़िलाफ़ अभियान के तहत किया जा रहा है, अगर आप प्रशासन की बात पर यक़ीन करना चाहें. इसमें कुछ हिंदुओं के चबूतरे भी टूटे हैं. गेहूं के साथ घुन को पिसना ही पड़ता है. सबको पता है कि यह सब इसलिए किया जा रहा है कि हिंदुओं के दिलों को ठंडक पहुंचे. उनके दिल में तरुण की हत्या के बदले की जो आग जल रही है, उस पर कुछ पानी पड़े. यह प्रशासन की मजबूरी है.
लेकिन मुसलमानों के खून की प्यासी भीड़ इससे संतुष्ट नहीं है. वह रेखा गुप्ता को कह रही है कि वे पड़ोसी उत्तर प्रदेश के आदित्यनाथ को देखें. असम के हिमंता बिस्वा शर्मा को देखें. उत्तराखंड के पुष्कर धामी को देखें. मुसलमानों के मकानों को पूरा ध्वस्त करना चाहिए, उनके कुछ हिस्से भर नहीं. यह भारत में प्रशासन का नया प्रोटोकॉल है.
मेरे दो मुसलमान मित्रों ने उत्तम नगर से लौटकर बतलाया कि गड़बड़ी बाहरी तत्त्व कर रहे है. स्थानीय हिंदुओं को पता है कि मामला क्या है. हिंदू की दुकान के आगे मुसलमान ख़रीदारी के लिए लाइन लगाकर खड़े हैं. कोई दिक़्क़त नहीं है.
यह और बात है कि छोटे-मोटे काम करने वाले मुसलमान अपने गांव लौट रहे हैं: ईद वहीं मनाएंगे. क्या वे हर साल ईद में गांव चले जाते हैं? या इस साल ईद में खून की होली के नारों को सुनने के बाद वे निश्चिंत नहीं हो पा रहे थे? उन्हें किसी ने नहीं रोका. किसी को इसकी ज़रूरत ही नहीं मालूम हुई. पुलिस कह सकती है कि यह उसका काम नहीं है.
भारत के बाहर के मित्र यह सब सुनकर चकित रह जाते हैं. ठीक है कि दो परिवारों के बीच झगड़ा हुआ. मारपीट हुई. एक परिवार मुसलमान और दूसरा हिंदू. मारपीट में दोनों पक्षों के लोगों को चोट आई. हिंदू परिवार के एक आदमी को चोट ऐसी जगह लगी कि वह मर गया. उसके बाद मुसलमान परिवार के लगभग सारे लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया. अब इसके बाद तो जांच होगी. मुक़दमा चलेगा. मुसलमान परिवार का भी पक्ष है. वे भी ज़ख़्मी हुए हैं. पुलिस की जांच के बाद अदालत हर पहलू पर विचार करेगी और फ़ैसला होगा. यही तरीक़ा है. पूरी दुनिया में ऐसा ही होता है.
फिर मुसलमान परिवार का मकान क्यों तोड़ दिया गया? उसमें लूटमार और आगज़नी क्यों होने दी गई? क्या इन अपराधों के लिए किसी की निशानदेही की गई है? क्या एफआईआर की गई है? क्या पुलिस ने इसमें शामिल लोगों में से कुछ की भी गिरफ़्तारी की है? क्या इसे खामोशी से देखने वाले पुलिसवालों पर कर्तव्य निर्वाह न करने के लिए कोई विभागीय कार्रवाई की जा रही है?
बाहर के ये मित्र यह भी पूछते हैं कि जब आरोपियों पर आरंभिक कार्रवाई हो गई तो बाहर से भीड़ क्यों आ रही है और वह मुसलमानों को क्यों धमकी दे रही है? क्यों ईद पर खून की होली खेलने का ऐलान किया जा रहा है?
हम सब उनकी मासूमियत पर हंस सकते हैं. वे आज के भारत को नहीं जानते. लेकिन वे जो पूछ रहे हैं, वह हम सबको पूछना चाहिए. भारत में.
हिंदू-मुसलमान रहते हैं तो हर जगह की तरह यहां गाहे-बगाहे दोनों एक दूसरे के ख़िलाफ़ हिंसा की कर सकते हैं. जब एक मुसलमान मारा जाता है तो क्या आस-पड़ोस के मुसलमान मिलकर हिंदुओं के मकान गिराने की मांग करने लगते हैं? क्या प्रशासन आरोपी हिंदुओं के मकान, दुकान तोड़ देता है? क्या मुसलमान संगठन हिंदुओं के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने लगते हैं? क्या मीडिया हिंदुओं के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार में जुट जाता है?
जवाब हमें पता है.
इसलिए हमें यह कहना पड़ेगा कि उत्तम नगर में जो हो रहा है, होने दिया जा रहा है या किया जा रहा है, वह सिर्फ़ ग़लत नहीं, अपराध है. मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का प्रचार अपराध है. नफ़रत के उस प्रचार की इजाज़त देना उस जुर्म में शरीक होना है.
घृणा के इस प्रचार पर सरकार की चुप्पी पर आज भी हमें सवाल उठाना चाहिए. समाज के हर तबके को सुरक्षा देना, उसका अहसास दिलाना सरकार की जिम्मेदारी है. वह क्यों मुसलमानों की सुरक्षा के लिए ख़ुद को जवाबदेह नहीं मानती? क्यों पुलिस और प्रशासन को यह अपना कर्तव्य नहीं लगता?
जनता से वोट लेने के लिए उनके दरवाज़े जाने वाले राजनीतिक दल इस वक्त क्यों उत्तम नगर से दूर हैं? क्यों वे वहां के हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत कर सकते? ईद अब चंद रोज़ दूर है. क्या यह किसी भी समाज के लिए सम्मानजनक है कि उसके पड़ोसी के मन में त्योहार के उत्साह की जगह हिंसा की आशंका हो?
Source: The Wire







