आजकल पैग़ामात में “इमोजी” का इस्तेमाल पूरी शिद्दत के साथ जारी है। सोशल मीडिया, ख़ासकर फ़ेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट पर इमोजी की भरमार देखने को मिल रही है। यहां जज़्बात, एहसासात और तास्सुरात (इमोशन्स) को तस्वीरों के ज़रिये पेश किया जाता है। किसी के एहसास या जज़्बे को इमेजरी के ज़रिये बयान किया जाता है। अल्फ़ाज़ और जुमलों के इस्तेमाल में कुछ वक़्त लगता है, मगर तरक़्क़ी करता हुआ ये दौर इतना आसान और आराम पसंद हो गया है कि रिवायती अंदाज़-ए-मुआशरत अब किसी हद तक बोझ लगने लगा है।

इसी वजह से कम्युनिकेशन और मैसेजिंग ने इमोजी का रूप इख़्तियार कर लिया है। गोया ये आज के दौर का एक नया, आसान और राइज़ुल-वक़्त तरीका-ए-इज़हार बन चुका है। नौजवान नस्ल तो पूरी तरह इमोजी के इस्तेमाल में मुतहर्रिक और माहिर नज़र आती है। उनका मानना है कि तफ़सीली और रिवायती बयान की जगह इशारों की ज़ुबान यानी इमोजी के ज़रिये अपनी बात कहना ज़्यादा आसान और फ़ायदेमंद है।

आज हर एंड्रॉयड मोबाइल में इमोजी का एक बड़ा ख़ज़ाना मौजूद है। हालात ऐसे बन गए हैं कि जिसे इमोजी के इस्तेमाल का सही सलीक़ा नहीं आता, उसे नातजुर्बेकार या वक़्त के साथ न बदलने वाला समझा जाता है। यहां तक कि पचास-साठ साल की उम्र पार कर चुके अफ़राद भी अब बड़ी फुर्ती के साथ अपनी रोज़मर्रा की मैसेजिंग में इमोजी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

तरक़्क़ी की रफ़्तार इतनी तेज़ हो चुकी है कि लोग अपनी मसरूफ़ियत के चलते अब किसी मैसेज के जवाब में अल्फ़ाज़ और जुमलों की जगह इमोजी को तरजीह देते हैं। अगर कोई इमोजी के बजाय लफ़्ज़ों में जवाब दे, तो उसे कम मॉडर्न या कम मसरूफ़ समझा जाता है।

दरअसल, ये नया चलन हमें सदियों पुरानी तहज़ीब की याद दिलाता है, जहां निशान, अलामतें और तस्वीरें कम्युनिकेशन का हिस्सा हुआ करती थीं। क़दीम मिस्र और वादी-ए-सिंध जैसी तहज़ीबों में भी अलामती इज़हार आम था। यूं लगता है कि तारीख़ खुद को दोहरा रही है — History repeats itself

इमोजी की शुरुआत जापान में मानी जाती है, जहां 1999 में शिगेताका कुरिता ने पहली बार इमोजी तैयार किए। बाद में यूनिकोड के ज़रिये और गूगल जैसी कंपनियों की मदद से ये दुनिया भर में आम हो गए। पहले जहां 176 इमोजी थे, आज उनकी तादाद 600 से भी ज़्यादा हो चुकी है।

आज इमोजी सिर्फ़ तिजारती इस्तेमाल तक महदूद नहीं रहे, बल्कि फौरी रिएक्शन और जज़्बात के इज़हार का अहम ज़रिया बन चुके हैं। खुशी, ग़म, शुक्रिया, मोहब्बत—हर एहसास अब एक छोटे से निशान में समेट दिया गया है।

माहिरीन का मानना है कि इमोजी कभी-कभी किसी बात को बढ़ा-चढ़ाकर (Overstated) या कम करके (Understated) पेश करने का ज़रिया भी बनते हैं। कुछ सीनियर लोग अभी भी इसे रिवायती अदब के ख़िलाफ़ मानते हैं, लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि इमोजी आज के तरक़्क़ी-याफ़्ता दौर की एक अहम पहचान बन चुके हैं।

आख़िर में यही कहा जा सकता है कि इमोजी एक ऐसा आसान, तेज़ और असरदार ज़रिया-ए-इज़हार हैं, जो मौजूदा दौर की ज़रूरत बन चुके हैं—मगर इसके साथ-साथ रिवायती अंदाज़-ए-बयान को पीछे छोड़ने का सिलसिला भी जारी है।

लेखक: मोहम्मद आज़म शाहिद

Source: Haqeeqat Times (Translated in hindi)