मज़दूरों के पास निश्चित काम के घंटे, छुट्टियां, या सामाजिक सुरक्षा (जैसे पेंशन, बीमा) की कमी है. अधिकांश असंगठित मज़दूरों की आय बहुत कम है. नौकरी की असुरक्षा और जोखिम भरे माहौल में काम करने को मजबूर मज़दूर अक्सर भुखमरी या गरीबी के कगार पर रहते हैं. विकास कार्यों में अहम भूमिका निभाने के बावजूद, उन्हें उन सुख-सुविधाओं से दूर रखा जाता है, जो वे ख़ुद बनाते हैं.
इधर अपने देश में मजदूरों की समस्याओं के लगातार तेज़ हो रहे सत्ता प्रायोजित हाशियाकरण के बीच, जैसा कि बहुत स्वाभाविक है, उनके संघर्षों के रूप तो बदल ही रहे हैं, उनमें जटिलताएं भी बढ़ती जा रही हैं. कारण यह कि उन्हें सरकारी कंपनियों के बेरोकटोक निजीकरण के कुफल भी भोगने पड़ रहे हैं और नई श्रम संहिताओं के भी.
लगातार घटती सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम मजदूरी की अनुपलब्धता के अनर्थ जहां लगातार उनका पीछा करते रहते हैं, वहीं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों (जो कुल मजदूरों के नब्बे प्रतिशत से भी अधिक हैं) की त्रासदियां बढ़ती जा रही हैं. डिजिटल/गिग वर्कर्स के रूप में उभरी उनकी ‘सबसे नई प्रजाति’ को भी बेहतर कामकाजी परिस्थितियां नहीं ही उपलब्ध हैं.
इसके बावजूद ऐसा नहीं है कि मजदूरों ने अपने सामने उपस्थित विषम व विपरीत परिस्थितियों से मुंह फेर लिया हो या उनसे हारकर चुप बैठ गए हों. अपनी-अपनी तरह से वे अपनी दुर्दशाओं के खिलाफ पूरी शक्ति से संघर्षरत हैं. मुख्य रूप से गत वर्ष लागू की गई चार श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को कमजोर कर उसका नाम विकसित भारत- रोजगार एवं आजीविका मिशन ग्रामीण (वीबी-जी राम जी) कर देने को लेकर.
पिछले साल उक्त श्रम संहिताओं को अधिसूचित करने के महज पांच दिन बाद 26 नवंबर को मजदूर संगठनों ने उनके विरुद्ध राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन किया था, जिसमें संयुक्त किसान मोर्चा ने भी भाग लिया और मजदूरों के साथ किसानों की एकता प्रदर्शित की थी. इससे पहले 9 जुलाई, 2025 को भी श्रम संगठन एक बड़ी राष्ट्रव्यापी हड़ताल कर चुके थे.
इनके अतिरिक्त गत 12 फरवरी, 2026 को मजदूरों की दस केंद्रीय यूनियनों और क्षेत्रीय संघों ने संयुक्त रूप से श्रम संहिताओं को वापस लेने, मनरेगा को मजबूत करने, न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने और कांट्रेक्ट (ठेका) प्रथा समाप्त करने की अपनी मांगों के समर्थन और निजीकरण के विरोध में भारत बंद बुलाकर आम हड़ताल की.
उनके दावे के अनुसार इस बंद और हड़ताल में 30 करोड़ से अधिक श्रमिकों ने भाग लिया. इसके बाद 25 फरवरी को सरकार के समर्थक भारतीय मजदूर संघ ने भी मजदूरों की ‘लंबित समस्याओं के समाधान के लिए दबाव डालने हेतु’ जिला मुख्यालयों पर धरना व प्रदर्शन आयोजित किया.
जानकार बताते हैं कि मजदूरों में खासकर इस बात को लेकर बहुत गुस्सा है कि चारों श्रम संहिताएं उनकी रोज़गार सुरक्षा को तो कमजोर करती ही हैं, कंपनियों को उन्हें निकालने की खुली छूट भी देती हैं. दूसरी ओर जोमैटो, स्विगी व ओला-उबर जैसे प्लेटफार्मों पर काम करने वाले ‘गिग’ और ‘प्लेटफॉर्म’ श्रमिकों को कोई सामाजिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है.
तिस पर ग्रामीण/ कृषि/ खेतिहर मजदूरों का बड़ा सहारा रही मनरेगा को भी कमजोर कर दिया गया है. इसलिए वे श्रम संहिताओं को दरकिनार करने, सरकारी कंपनियों का निजीकरण रोकने और ग्रामीण रोजगार गारंटी को और मजबूत करने की मांग करते आ रहे हैं.
समन्वित संघर्ष की जरूरत
गत दिनों उत्तर प्रदेश स्थित नोएडा में फैक्ट्री मजदूरों ने अपने संघर्ष से फैक्ट्री प्रबंधन को झुकाकर अपने लिए कुछ उपलब्धियां भी हासिल कीं. मसलन, किसी भी मजदूर को बिना वजह नौकरी से नहीं निकाला जाएगा, ज्यादा न्यूनतम मजदूरी के साथ ओवरटाइम और रविवार के काम का दोगुना पैसा मिलेगा, हफ्ते में एक छुट्टी मिलेगी, बोनस 30 नवंबर तक बैंक खाते में जमा कर दिया जाएगा, महिला मजदूरों की सुरक्षा के लिए किसी महिला की ही अध्यक्षता में कमेटी बनेगी और एक शिकायत पेटी लगेगी, ताकि मजदूर बिना डरे उस पेटी में अपनी तकलीफों की शिकायतें डाल सकें.
इन मजदूरों को यह भी आश्वासन मिला है कि उनका वेतन हर महीने की 10 तारीख तक मिल जाया करेगा, जिसकी स्लिप भी दी जाएगी और उसमें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा घोषित वेतन वृद्धि को लागू किया जाएगा.
इस सबके बावजूद मुश्किल यह कि मजदूर आम तौर पर न देशभर में अपने संघर्षों को समन्वित रूप दे पा रहे हैं और न उनकी प्रेरणाओं को एकजुट कर पा रहे हैं. हालांकि उनके लिए प्रेरणाएं साम्यवाद व समाजवाद से लेकर गांधीवाद तक में बिखरी पड़ी हैं.
हम जानते हैं कि आज़ादी से पहले अंग्रेजों के वक्त गिरमिटिया मजदूरों की मुक्ति का मार्ग गांधीवाद की विचारधारा ने ही प्रशस्त किया था. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की महात्मा गांधी के प्रभाव वाली धारा के दबाव और हस्तक्षेप के फलस्वरूप ब्रिटिश सत्ताधीशों को अपनी औपनिवेशिक नीतियां बदलकर 1917 में गिरमिटिया मजदूरी की प्रथा को आधिकारिक रूप से समाप्त कर देना पड़ा था.
बहरहाल, मजदूर दिवस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यताप्राप्त दिवस के रूप में स्थापित करने में समाजवादी व साम्यवादी संगठनों व आंदोलनों की बड़ी भूमिका के मद्देनजर उन्हीं के सिलसिले में बात करें तो उनके प्रति रुझान रखने वाले ज्यादातर मजदूर वैज्ञानिक समाजवाद के प्रणेता कार्ल मार्क्स के इस कथन को तो नारे के तौर पर याद रखते हैं कि ‘दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी हथकड़ियों के अलावा कुछ नहीं है’, लेकिन इस कथन से बहुत ‘प्रेरित’ नहीं होते कि न सिर्फ मौजूदा हालात को बदलने बल्कि अपने आप को बदलने तथा राजनीतिक शासन चलाने के योग्य बनने के लिए भी मजदूरों को पन्द्रह, बीस या पचास वर्षों तक ‘आग में से गुजरना’ पड़ सकता है. इसलिए उनको संघर्षों से कभी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए और समाज व स्वयं दोनों को बदलने के संघर्ष जारी रखने चाहिए.
प्रसिद्ध चीनी कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ल्यू शाओ ची के अनुसार मार्क्स का एक बड़ा संदेश यह भी है कि कोई भी जन्मना ज्ञानी नहीं होता. हर किसी को सीखना होता है, इसलिए सीखने की आदत डालनी और ज्यादा से ज्यादा योग्यताएं हासिल करनी चाहिए. उनके मामले में ‘कम से कम’ पर कतई संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए.
सीमित महत्वाकांक्षाएं
यहां फ़रवरी, 1883 में सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (जो बाद में भाषा शास्त्री के रूप में ज्यादा विख्यात हुए) द्वारा गिरमिटिया मजदूरी (जिसने तत्कालीन परिस्थितियों में ब्रिटिश उपनिवेशों के लेबर मार्केट में भारत का दबदबा बना दिया था और अंग्रेज जब चाहते थे, तब इन मजदूरों की आपूर्ति को नियंत्रित कर अपना दबदबा कायम रखते थे) के सिलसिले में तत्कालीन बंगाल सरकार को दी गई ‘रिपोर्ट ऑन कोलोनियल इमीग्रेशन फ्रॉम द बंगाल प्रेसिडेंसी’ का निम्नलिखित हिस्सा भी उल्लेखनीय है:
हालांकि, मजदूरों की मांग पूरी करने में चीन भारत से आगे है, लेकिन चीनी मजदूरों और भारतीय मजदूरों के बीच एक बड़ा अंतर है-जहां चीनी मजदूर अपने लिए पर्याप्त पैसा इकठ्ठा करने के बाद स्वतंत्र हो जाना चाहते हैं और अपने पूर्व मालिकों के समकक्ष स्थापित होना चाहते हैं, वहीं भारतीय मजदूरों की महत्वाकांक्षाएं बड़ी सीमित होती हैं, उनकी ख्वाहिश महज बेहतर पगार पाने वाले कुली बने रहने की होती है.
यहां समझने की बात यह है कि सीमित महत्वाकांक्षाओं की संतान भारतीय मजदूरों की यह ‘लोकप्रियता’ तब भी उनकी अर्याप्त चेतना व जागरूकता से जुड़ी हुई थी और अभी भी जुड़ी हुई है.
उन दिनों जार्ज ग्रियर्सन को दिए गए एक प्रत्यावेदन के अनुसार तब इसका अनर्थ यह था कि गिरमिटिया प्रणाली के अंतर्गत मजदूरों पर बहुत बड़े पैमाने पर अत्याचार व भ्रष्टाचार किया जाता था. ऐसी घटनाएँ बहुत आम बताई जाती थीं कि भर्ती करने वाले एजेंट और उनके कारिंदे गरीब परिवारों की बहू–बेटियों को और कई बार सम्मानित परिवारों के स्त्रियों को भी, बहला-फुसलाकर अपने चंगुल में फाँस लेते और उन्हें कभी भी साफ-साफ शब्दों में यह नहीं बताते थे कि विदेश ले जाकर उनसे क्या काम कराया जाएगा.
इस प्रत्यावेदन के अनुसार तरह-तरह के प्रलोभन देकर उन्हें पहले अपने परिवारों से दूर और घरों से बाहर किया जाता, कभी–कभी किसी दूसरी जगह रख कर डिपो ले जाया जाता और तब खुलासा किया जाता कि किस देश ले जाया जाने वाला है. अधिकांश स्त्रियां इस खुलासे के बाद देश छोड़ कर विदेश जाने के लिए एकदम मना कर देतीं लेकिन एक बार घर छोड़कर बाहर कदम रख देने के बाद सम्मान सहित परिवारों में लौटना उनके लिए संभव नहीं रह जाता.
एक बार हमेशा–हमेशा के लिए घर का रास्ता बंद हो जाने के बाद उन स्त्रियों के पास एजेंट का ठिकाना छोड़कर कहीं और जाने का कोई रास्ता नहीं बचता – थोड़े बहुत विरोध के बाद दो-चार दिनों में वे अपनी नियति को मानकर हथियार डाल देती वैसे भी एजेंट के पास ना नूकुर करने वालों को काबू में करने में सक्षम बलशाली लोगों की फौज होती, जिसके चलते ऐसी कई स्त्रियां अपनी जान बचाने के लिए भर्ती एजेंटों और उनके संगी साथियों की रखैल बन कर रहने के लिए तैयार हो जातीं.
कौन कह सकता है कि आज भी थोड़े बदले हुए रूप में मजदूरों का, वे पुरुष हों या महिला, वैसा ही बल्कि उससे भी ज्यादा कुटिलतापूर्वक शोषण नहीं किया जा रहा और उसके विरुद्ध वैसे ही दृढ़ संघर्ष की जरूरत नहीं है? इस कठिन समय में इस संघर्ष की जरूरत के प्रति मजदूरों का दृष्टिकोण ही उनका भविष्य तय करेगा.
और अंत में
पिछले दिनों गूगल बाबा की मार्फत एआई से पूछा कि क्या मजदूरों के लिहाज से भारत नर्क बन गया है, तो यह जवाब मिला : ‘नर्क’ शब्द थोड़ा कठोर हो सकता है, लेकिन यह सच है कि भारत के एक बहुत बड़े श्रमिक वर्ग के लिए परिस्थितियां अत्यंत चुनौतीपूर्ण और संघर्षपूर्ण हैं. …भारत में 90% से अधिक श्रमिक असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं.
इसका मतलब है कि उनके पास निश्चित काम के घंटे, छुट्टियों, या सामाजिक सुरक्षा (जैसे पेंशन, बीमा) की कमी है. …अधिकांश असंगठित मजदूरों की आय बहुत कम है, और वे अक्सर 10,000 रुपये प्रति माह से कम कमाते हैं…दिहाड़ी मजदूरी या ठेके पर काम करने के कारण, उनके पास नौकरी की सुरक्षा नहीं होती है. उन्हें अक्सर जोखिम भरे माहौल में काम करना पड़ता है…..इतनी मेहनत के बावजूद, कई मजदूरों को अपनी मेहनत का पूरा फल नहीं मिल पाता और वे अक्सर भुखमरी या गरीबी के कगार पर रहते हैं….विकास कार्यों (जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण) में अहम भूमिका निभाने के बावजूद, उन्हें उन सुख-सुविधाओं से दूर रखा जाता है, जो वे खुद बनाते हैं.
…कुछ राज्यों, जैसे केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में मजदूरों की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर बताई जाती है. संगठित क्षेत्र के मजदूरों को श्रम कानूनों के तहत कुछ सुरक्षा प्राप्त है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
Source: The Wire

