आम वोटरों के सामने नई मुश्किलें, ‘तार्किक विसंगति’ की जांच पर उठे सवाल
दस्तावेजों की गैर-मौजूदगी और स्थायी निवास प्रमाणपत्र हासिल करने में तकनीकी रुकावटों से नागरिक परेशान
कर्नाटक में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान चुनाव आयोग की ओर से इस्तेमाल किए जा रहे सॉफ्टवेयर आधारित ‘तार्किक विसंगति’ की जांच को लेकर अब आम लोगों के बीच सवाल उठने लगे हैं। लोगों का कहना है कि वोटर लिस्ट में दर्ज जानकारी की जांच और उसमें मौजूद विसंगतियों की पहचान जरूरी है, लेकिन अगर कंप्यूटर आधारित जांच में इंसानी हालात, पारिवारिक मामलों और भारतीय समाज में प्रचलित नामों तथा दस्तावेजों के अलग-अलग तरीकों को पूरी तरह ध्यान में नहीं रखा गया, तो इसका खामियाजा वास्तविक वोटरों को भुगतना पड़ सकता है।
बताया जा रहा है कि सॉफ्टवेयर परिवार के सदस्यों के बीच उम्र के अंतर और माता-पिता तथा बच्चों की उम्र को तय मानकों के मुताबिक जांचता है। कुछ मामलों में जुड़वां बच्चों की एक ही जन्मतिथि या भाई-बहनों के जन्म के बीच असामान्य रूप से कम अंतर भी ‘तार्किक विसंगति’ के तौर पर सामने आ सकता है।
नतीजतन, ऐसे परिवारों को भी अपनी जानकारी की सफाई देने और रिकॉर्ड का सत्यापन कराने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जो कई वर्षों से वोटर लिस्ट में शामिल हैं।
इसी तरह पुराने और मौजूदा सरकारी रिकॉर्ड में नाम की स्पेलिंग, सरनेम या नाम के शुरुआती अक्षरों में मामूली फर्क भी सॉफ्टवेयर की जांच में विसंगति के रूप में सामने आ सकता है। शादी के बाद महिलाओं के नाम में बदलाव या कई साल पुराने रिकॉर्ड में हुई लिखाई की गलतियां भी परेशानी का सबब बन रही हैं।
आम लोगों का सवाल है कि अगर मामूली नाम या आंकड़ों के फर्क की बुनियाद पर वर्षों से वोट डाल रहे नागरिकों को नोटिस जारी किया जाता है, तो उन्हें अपनी सफाई पेश करने के लिए पर्याप्त सहूलियत और वक्त भी दिया जाना चाहिए।
सॉफ्टवेयर की ओर से किसी नाम या जानकारी को चिन्हित किए जाने के बाद संबंधित वोटर को नोटिस जारी किया जा रहा है। नागरिकों का कहना है कि किसी तकनीकी विसंगति को शुरुआती जांच के बजाय अंतिम शक की बुनियाद बनाना मुनासिब नहीं है। आंकड़े दर्ज करते समय हुई गलती, नाम अलग-अलग तरीके से दर्ज होने या पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने को वास्तविक नागरिक की पात्रता से अलग करके देखा जाना चाहिए।
गरीब और दैनिक मजदूर वर्ग पर ज्यादा असर
खास तौर पर रोजाना मजदूरी करने वाले मजदूरों, गरीब परिवारों और बुजुर्ग नागरिकों को इस प्रक्रिया में ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें अपना रोजगार और रोजमर्रा के काम छोड़कर तहसीलदार कार्यालय, अलग-अलग सरकारी सेवा केंद्रों और तालुका स्तर के दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
कई नागरिकों के लिए दशकों पुराने ऐसे रिकॉर्ड हासिल करना लगभग नामुमकिन है, जो उनके पास कभी मौजूद ही नहीं रहे।
‘जो दस्तावेज कभी थे ही नहीं, उन्हें कहां से लाएं?’
बेंगलुरु के दासरहल्ली विधानसभा क्षेत्र के हेग्गनहल्ली निवासी वोटर नागराजू शिवप्पा का मामला इस परेशानी को उजागर करता है।
उनके मुताबिक, चुनावी अधिकारी ने उन्हें नोटिस जारी कर आधार कार्ड के साथ एक और दस्तावेज पेश करने को कहा। उनका कहना है कि उन्होंने दसवीं कक्षा तक पढ़ाई की है और उनके पास पासपोर्ट भी नहीं है।
उन्हें स्थायी निवास प्रमाणपत्र हासिल करने की सलाह दी गई, लेकिन कई दिनों से आवेदन करने के बावजूद बार-बार तकनीकी खराबी का संदेश सामने आ रहा है। उन्हें नोटिस के साथ सुनवाई में पेश होने की हिदायत दी गई है।
चामराजपेट के वोटर प्रसाद ने भी मौजूदा प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि पीढ़ियों से भारत में रहने वाले और लगातार वोट डालने वाले परिवारों से अचानक पिता का शैक्षणिक रिकॉर्ड या जन्म प्रमाणपत्र पेश करने की मांग करना आम नागरिक के लिए बेहद परेशानी का सबब है।
उनका सवाल है कि अगर किसी नागरिक के पास आधार कार्ड, गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों का राशन कार्ड और वोटर आईडी समेत दूसरे सरकारी दस्तावेज मौजूद हैं, तो उसके बावजूद ऐसे अतिरिक्त सबूत क्यों मांगे जा रहे हैं जो उसके पास कभी मौजूद ही नहीं रहे?
बेंगलुरु के एक नागरिक ने सोशल मीडिया के जरिए अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनके पास आधार कार्ड, पैन कार्ड, आयकर रिटर्न, वोटर आईडी, प्रॉपर्टी टैक्स की रसीद, ड्राइविंग लाइसेंस, बिजली और पानी के बिल तथा गैस का बिल समेत कई दस्तावेज मौजूद हैं।
इसके बावजूद उन्हें बताया गया कि ये दस्तावेज जरूरी सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं हैं। उन्होंने सवाल किया कि अगर इतने सारे सरकारी रिकॉर्ड भी काफी नहीं हैं, तो आम नागरिक आखिर कौन-सा दस्तावेज पेश करे?
नोटिस पाने वाले वोटरों को व्यक्तिगत रूप से सुनवाई में होना होगा शामिल
चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक, नोटिस हासिल करने वाले वोटरों को सुनवाई के लिए व्यक्तिगत रूप से मौजूद होना होगा।
अगर कोई वोटर जांच प्रक्रिया में शामिल नहीं होता है, तो अंतिम वोटर लिस्ट में उसका नाम बरकरार रखा जाए या हटाया जाए, इसका फैसला निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी करेगा।
हालांकि, अंतिम वोटर लिस्ट जारी होने के बाद प्रभावित वोटर जिला मजिस्ट्रेट के सामने पहली अपील और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के सामने दूसरी अपील दाखिल कर सकता है।
‘सुनवाई आखिर सजा क्यों बन गई?’
नोटिस पाने वाले वोटरों ने सुनवाई के लिए दी जा रही कम समय-सीमा पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अगर मकसद सिर्फ दस्तावेजों का सत्यापन और रिकॉर्ड में मौजूद विसंगति को दूर करना है, तो संबंधित अधिकारी नागरिकों के घर जाकर भी शुरुआती जांच कर सकते हैं।
ऐसे में आम नागरिकों को बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने और अपनी पहचान व जानकारी साबित करने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है?
आम लोगों का कहना है कि आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक डिजिटल तकनीक के जरिए लाखों रिकॉर्ड कुछ ही वक्त में जांचे और आपस में मिलाए जा सकते हैं। ऐसे में मामूली नाम, उम्र या रिकॉर्ड के फर्क की वजह से नागरिकों को लंबी सरकारी कार्रवाई में उलझाना प्रशासनिक सुविधा के बजाय उनके लिए अतिरिक्त बोझ बन सकता है।
यह सवाल भी अहम है कि अगर किसी नागरिक के रिकॉर्ड में गलती आंकड़े दर्ज करते समय सरकारी अधिकारी या कर्मचारी की ओर से हुई है, तो उसका बोझ नागरिक पर क्यों डाला जाए?
तकनीक का मकसद जनता के लिए सहूलियत पैदा करना होना चाहिए, न कि उसकी कमियों या सीमाओं की कीमत आम नागरिक चुकाए।
स्थायी निवास प्रमाणपत्र ने भी बढ़ाई नई मुश्किल
एसआईआर के दौरान जिन वोटरों के पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं या जिनकी मौजूदा और पुरानी जानकारी में फर्क पाया गया है, उन्हें अलग-अलग दस्तावेज पेश करने की हिदायत दी जा रही है।
पासपोर्ट, दसवीं कक्षा का शैक्षणिक रिकॉर्ड या जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज नहीं रखने वाले गरीब और दैनिक मजदूरी करने वाले लोगों के लिए स्थायी निवास प्रमाणपत्र एक अहम विकल्प के तौर पर सामने आया है।
लेकिन स्थायी निवास प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए सरकारी सेवा केंद्रों का रुख करने वाले नागरिकों को भी सर्वर की खराबी और आवेदन के दौरान बार-बार तकनीकी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
कुछ इलाकों में संबंधित कर्मचारी उपलब्ध सुविधाओं के जरिए आवेदन आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कई जगह तकनीकी और प्रशासनिक दिक्कतों ने नागरिकों की परेशानी और बढ़ा दी है।
दक्षिण कन्नड़ जिले के बेलतंगडी तालुका के एक वोटर का मामला भी इसी स्थिति को सामने लाता है। आवेदक ने स्थायी निवास प्रमाणपत्र के लिए तय दिशा-निर्देशों के मुताबिक सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए थे।
स्थानीय ग्राम प्रशासनिक अधिकारी और राजस्व विभाग के निरीक्षक ने मौके पर पहुंचकर दस्तावेजों की जांच की और आवेदन को सिफारिश के साथ तहसीलदार के पास भेज दिया।
इसके बावजूद करीब 21 दिन इंतजार करने के बाद आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि आवेदक की ओर से पेश किए गए दस्तावेज उचित नहीं हैं।
आवेदक ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर कोई खास दस्तावेज गलत, अधूरा या गैर-स्वीकार्य था, तो इसकी साफ जानकारी क्यों नहीं दी गई?
उनके मुताबिक, सरकारी दिशा-निर्देशों में जिन दस्तावेजों का जिक्र है, वही दस्तावेज उन्होंने पेश किए थे। अगर किसी दस्तावेज में कमी या खामी थी, तो इसकी जानकारी लिखित रूप में दी जानी चाहिए थी, ताकि वह वैकल्पिक दस्तावेज के साथ दोबारा आवेदन कर सकें।
सिर्फ यह कहना कि दस्तावेज ‘उचित नहीं हैं’, नागरिक को अपनी पहचान और निवास साबित करने का मुनासिब मौका नहीं देता।
नोटिस का जवाब देने की समय-सीमा करीब, प्रक्रिया आसान बनाने की मांग
एसआईआर के नोटिस का जवाब देने के लिए तय समय-सीमा अब खत्म होने के करीब है। ऐसे में आम लोगों ने मांग की है कि स्थायी निवास प्रमाणपत्र का आवेदन खारिज करते समय संबंधित अधिकारियों के लिए स्पष्ट वजह दर्ज करना जरूरी किया जाए।
इसके अलावा सभी लंबित और खारिज किए गए आवेदनों की फौरी तौर पर दोबारा समीक्षा किए जाने की मांग भी की गई है।
आम लोगों का कहना है कि वोटर लिस्ट की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना बेशक जरूरी है, लेकिन इसके साथ वास्तविक वोटरों के वोट देने के अधिकार, सम्मान और सहूलियत की हिफाजत करना भी उतना ही अहम है।
पीढ़ियों से देश में रहने वाले किसी आम नागरिक से अचानक अपनी पहचान, निवास या वोटर की हैसियत साबित करने के लिए ऐसे दस्तावेज मांगना, जो उसके पास कभी मौजूद ही नहीं रहे, गंभीर चिंता का विषय है।
आम लोगों की मांग है कि तकनीकी विसंगतियों को इंसानी जांच के जरिए दूर किया जाए और किसी भी वास्तविक वोटर को सिर्फ रिकॉर्ड या सॉफ्टवेयर की गलती की बुनियाद पर अपने वोट देने के अधिकार से महरूम होने की स्थिति का सामना न करना पड़े।
Source: Haqeeqat Times

