यह बहुलतावादी हिंदुस्तान किसी एक मज़हब या किसी एक जाति का मुल्क नहीं है। इसे अपनी मेहनत और पसीने से बनाने वाले इस देश के मेहनतकश लोग हैं। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन और बौद्ध—हर समुदाय के मेहनतकश लोगों ने मिलकर इस मुल्क को बनाया है।

आज ज़रूरत इस बात की है कि जाति और मज़हब के नाम पर मेहनतकश अवाम को बांटकर उनके कंधों पर सवार होने वाली कॉरपोरेट, सांप्रदायिक और मनुवादी ताक़तों को पीछे धकेला जाए और हिंदुस्तान की इस बहुलतावादी पहचान की हिफाज़त की जाए।

राजनीतिक तौर पर अपने मुख़ालिफ़ लोगों को ‘देशद्रोही’ कहना बीजेपी समेत संघ परिवार के नेताओं की आदत बन गई है। पिछले छह साल से बिना मुकदमे के जेल में बंद छात्र नेता उमर खालिद की रिहाई की मांग करने वाले केपीसीसी अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद समेत व्यक्ति की आज़ादी और अभिव्यक्ति की आज़ादी के हक़ में आवाज़ उठाने वाले लोगों को केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी, सोमन्ना और पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई समेत कुछ नेताओं ने ‘देशद्रोही’ कहा है।

लेख में कहा गया है कि हिंदुस्तान की किसी भी अदालत ने उमर खालिद को ‘देशद्रोही’ नहीं कहा है। लेखक का दावा है कि साल 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा के मामले में उमर खालिद और इमाम को गिरफ्तार किया गया था और गिरफ्तारी के कई साल बाद भी मुकदमे की बाकायदा सुनवाई शुरू नहीं हुई है।

उमर खालिद को बी.के. हरिप्रसाद द्वारा ‘राष्ट्रवादी’ कहे जाने के बाद प्रह्लाद जोशी, सोमन्ना और बसवराज बोम्मई की तरफ से भी उनके खिलाफ बयान दिए जाने का लेख में ज़िक्र किया गया है।

लेखक का कहना है कि किसी ज़िम्मेदार केंद्रीय मंत्री की तरफ से इस तरह का बयान देना उचित नहीं है। देशभक्ति क्या है और देशद्रोह क्या है—इस पर बहस और संवाद के ज़रिए हक़ीक़त तक पहुंचने की ज़रूरत है।

लेख में संघ परिवार की विचारधारा पर आरोप लगाते हुए कहा गया है कि उसकी नज़र में मुस्लिम, ईसाई और कम्युनिस्ट देशद्रोही हैं। वहीं लेखक का कहना है कि महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे और उसका समर्थन करने वालों को भी देशद्रोही कहा जाना चाहिए।

लेख के मुताबिक, जो लोग हिंदुस्तानियों को मज़हब और जाति के आधार पर बांटते हैं, वे देश के हित के खिलाफ काम कर रहे हैं। गुजरात हिंसा का ज़िक्र करते हुए लेखक ने आरोप लगाया है कि हिंसा में शामिल लोग, हिंसा में मदद करने वाले और सत्ता में रहते हुए हिंसा को रोकने में नाकाम रहने वाले लोग भी देश के खिलाफ माने जाने चाहिए।

आज़ादी की लड़ाई और देशभक्ति

आज़ादी की जंग का ज़िक्र करते हुए लेख में कहा गया है कि जिन्होंने मुल्क के लिए कुर्बानी दी और अपनी जान तक न्योछावर की, वे देशभक्त थे।

शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल समेत अलग-अलग जातियों और मज़हबों से जुड़े लाखों हिंदुस्तानियों ने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया।

लेख में आरोप लगाया गया है कि अंग्रेज़ों की चापलूसी करने और आज़ादी के लड़ाकों की जानकारी ब्रिटिश पुलिस तक पहुंचाने वालों को देशद्रोही कहा जाना चाहिए।

वहीं आज़ादी के बाद हिंदू-मुस्लिम और ईसाई समुदायों के बीच नफ़रत और तनाव पैदा करने वालों पर भी सवाल उठाए गए हैं।

मुल्क में सांप्रदायिक तनाव का आरोप

लेख में दावा किया गया है कि सांप्रदायिक राजनीति की वजह से अब बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों और गांवों तक लोगों के बीच मज़हबी बुनियाद पर दूरी पैदा हो गई है।

लेखक का आरोप है कि कई जगहों पर लगातार खौफ, हिंसा, निषेधाज्ञा, लाठीचार्ज और गोलीबारी जैसी स्थिति पैदा हो रही है। सत्तारूढ़ दल के कुछ विधायक, सांसद और मंत्री लगातार भड़काऊ बयान दे रहे हैं—ऐसा भी लेख में कहा गया है।

पहले हिंदुस्तान के लोग मिल-जुलकर त्योहार मनाते थे, लेकिन अब आपसी भरोसे की जगह शक और दूरी की दीवारें खड़ी हो रही हैं—लेख में यह दावा किया गया है।

अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बने राम मंदिर का ज़िक्र करते हुए लेख में आर्थिक अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं। गणेशोत्सव के दौरान दिए जाने वाले कथित भड़काऊ भाषणों पर भी सवाल उठाए गए हैं।

लेख में धार्मिक स्थलों के सामने जुलूस निकालने, डीजे बजाने और पटाखे फोड़ने जैसी गतिविधियों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। लेखक का कहना है कि कानून-व्यवस्था कायम रखने की कोशिश करने वाले पुलिस अधिकारियों को निलंबित करने की मांग करना भी देशहित के खिलाफ है।

देश की अर्थव्यवस्था पर भी सवाल

लेख में कहा गया है कि भारत की इज़्ज़त, वक़ार और राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाने वाली अंतरराष्ट्रीय नीतियों और विदेशी दबाव के सामने झुकना भी मुल्क के साथ बेवफाई के बराबर है।

कॉरपोरेट कंपनियों के बड़े कर्ज़ माफ किए जाने पर भी सवाल उठाते हुए लेख में कहा गया है कि इसे देशभक्ति नहीं कहा जा सकता।

उमर खालिद के बारे में लेख में दावा किया गया है कि उन्होंने कभी भारत के हितों के साथ गद्दारी नहीं की। लेख में यह भी कहा गया है कि उन्होंने पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के साथ कोई गुप्त बातचीत नहीं की और न ही पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से किसी गुप्त संपर्क का ज़िक्र सामने आया है।

नेहरू की आर्थिक नीतियों का ज़िक्र

आज़ादी के वक्त हिंदुस्तान की आर्थिक हालत का ज़िक्र करते हुए लेख में कहा गया है कि उस समय देश आर्थिक तौर पर बेहद कमज़ोर स्थिति में था।

पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश की आर्थिक बुनियाद मजबूत करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और बड़े औद्योगिक संस्थानों को विकसित करने पर ज़ोर दिया।

भिलाई स्टील प्लांट, बेंगलुरु की एचएएल और एचएमटी जैसी संस्थाओं का ज़िक्र करते हुए लेख में कहा गया है कि सोवियत रूस ने भी भारत के औद्योगिक विकास में मदद की थी।

नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों और बांधों को आज़ाद हिंदुस्तान के ‘आधुनिक मंदिर’ कहा था। इसी वजह से लेख में उन्हें आधुनिक भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाला नेता बताया गया है।

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की बिक्री पर सवाल

लेख में आरोप लगाया गया है कि बाद की सरकारों ने देश की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को एक-एक करके बेचने की प्रक्रिया शुरू की।

लेखक का कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तियों को कम कीमत पर बेचना भी देश के हित के खिलाफ माना जाना चाहिए।

लेख में मौजूदा आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया गया है कि नई योजनाएं शुरू करने के बजाय पहले से मौजूद सड़कों और संस्थानों के नाम बदलने पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया।

‘बहुलतावादी हिंदुस्तान’ की हिफाज़त की अपील

लेख के आखिर में कहा गया है कि हिंदुस्तान किसी एक मज़हब, जाति या समुदाय का मुल्क नहीं है। इसे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन और बौद्ध समेत तमाम समुदायों के मेहनतकश लोगों ने अपने पसीने और मेहनत से बनाया है।

लेखक का कहना है कि जाति और मज़हब के नाम पर मेहनतकश अवाम को बांटने वाली कॉरपोरेट, सांप्रदायिक और मनुवादी ताक़तों का मुकाबला करना और बहुलतावादी हिंदुस्तान की हिफाज़त करना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

Source: Vartha Bharathi (Translated in Hindi)