औरत सबके लिए जीती रहे, मगर खुद को न भूले

अपनी इज़्ज़त, ज़ेहनी सुकून और अपने ख़्वाबों को ज़िंदा रखना भी ज़िंदगी की अहम ज़रूरत है।

 

औरत की ज़िंदगी रिश्तों के खूबसूरत रंगों से बनी होती है। कभी वह बेटी बनकर घर में खुशियां लाती है, कभी बहन बनकर अपनों का सहारा बनती है, कभी बीवी बनकर ज़िंदगी के सफर में शरीक होती है और कभी मां बनकर अपनी पूरी दुनिया बच्चों के नाम कर देती है।

उसकी फ़ितरत में मोहब्बत, ईसार और दूसरों का ख्याल रखने की ऐसी कैफ़ियत होती है कि वह अक्सर अपनी ज़रूरत से पहले अपनों की ज़रूरत महसूस कर लेती है।

लेकिन इसी खूबी का एक दूसरा पहलू भी है। बहुत-सी औरतें दूसरों का ख्याल रखते-रखते अपनी ही ज़ात को भूल जाती हैं। उनकी सुबह घरवालों की ज़रूरतों से शुरू होती है और रात भी उन्हीं के काम समेटते हुए गुजर जाती है।

बरसों तक वे अपनी पसंद, आराम, सेहत और ख्वाहिशों को यह सोचकर टालती रहती हैं कि पहले घर, बच्चे और दूसरे रिश्ते, फिर कभी अपने बारे में सोचेंगी। मगर वह “कभी” अक्सर पूरी ज़िंदगी नहीं आता।

हमने औरत के लिए कुर्बानी को इतना बड़ा पैमाना बना दिया है कि कई बार उसकी खामोश तकलीफ़ भी हमें उसकी खूबी नज़र आने लगती है। जो औरत हर बात सह ले, अपनी ख्वाहिश छोड़ दे, अपनी थकान छिपा ले और कभी अपनी ज़रूरत का ज़िक्र न करे, उसे फौरन “बहुत समझदार” और “बहुत अच्छी” कह दिया जाता है।

मगर यह भी तो देखना चाहिए कि उस खामोशी के पीछे उसका दिल क्या कह रहा है?

हर खामोश औरत मुतमइन नहीं होती और हर मुस्कुराती हुई औरत बेफ़िक्री की ज़िंदगी नहीं गुज़ार रही होती।

औरत को यह समझने की ज़रूरत है कि अपने लिए वक्त निकालना खुदगर्ज़ी नहीं है। अगर वह कुछ देर सुकून से बैठना चाहती है, अपनी पसंद की किताब पढ़ना चाहती है, किसी सहेली से बात करना चाहती है, अपनी तालीम जारी रखना चाहती है या कोई हुनर सीखना चाहती है, तो उसे अपनी इस ख्वाहिश के लिए शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं।

ज़िंदगी सिर्फ ज़िम्मेदारियों का नाम नहीं है। इसमें इंसान की अपनी खुशी और ज़ेहनी सुकून भी शामिल है।

खास तौर पर घरेलू औरत की मेहनत को मामूली समझना हमारे समाज का एक अहम मसला है। घर साफ रखना, खाना बनाना, बच्चों की देखभाल करना, बुजुर्गों की खिदमत करना और घर के हर फर्द की ज़रूरत का ख्याल रखना देखने में रोज़मर्रा के काम लगते हैं, मगर इन कामों के पीछे वक्त, ताकत और लगातार ज़िम्मेदारी शामिल होती है।

इस मेहनत की कोई माहाना तनख्वाह नहीं होती, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसकी कोई क़द्र भी नहीं।

एक औरत अगर दिनभर घर संभालती है तो सिर्फ यह कह देना काफी नहीं कि “यह तो तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।” कभी उसकी मेहनत को महसूस करना, उसका शुक्रिया अदा करना और उसके आराम का ख्याल रखना भी ज़रूरी है।

मोहब्बत सिर्फ अल्फाज़ से नहीं, बल्कि रवैये से भी ज़ाहिर होती है।

इसी तरह औरत को भी हर ज़िम्मेदारी अपने सिर लेने की आदत बदलनी होगी। कई बार वह खुद ही यह समझ लेती है कि अगर मैंने नहीं किया तो घर कैसे चलेगा? नतीजा यह होता है कि दूसरे लोग भी उसकी मेहनत को अपना हक समझने लगते हैं।

जहां काम बांटा जा सकता हो, वहां काम बांटने में कोई ऐब नहीं। बच्चों को उनकी उम्र के मुताबिक ज़िम्मेदारियां देना और घर के दूसरे अफ़राद से तआवुन लेना औरत को कमज़ोर नहीं करता, बल्कि घर के निज़ाम को ज्यादा मुतवाज़िन बनाता है।

औरत के लिए यह भी ज़रूरी है कि वह सब्र और अपनी इज़्ज़त-ए-नफ़्स के बीच का फर्क समझे।

सब्र एक बड़ी खूबी है, लेकिन हर ज्यादती को सब्र का नाम दे देना दुरुस्त नहीं। ज़िंदगी की मामूली तल्खियों, इख्तिलाफ़-ए-राय और नाराज़गी को बर्दाश्त करना अलग बात है, जबकि लगातार बेइज़्ज़ती, तौहीन, खौफ या नाइंसाफी को खामोशी से सहते रहना अलग मामला है।

जहां मसला हो, वहां बात करना, मदद लेना और मुनासिब रास्ता तलाश करना भी ज़िंदगी का हिस्सा है।

और यह ज़िम्मेदारी सिर्फ औरत की नहीं कि वह खुद को संभाले। खानदान को भी अपनी औरतों के लिए ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहां वे अपनी बात खुलकर कह सकें।

बेटी अपनी परेशानी मां से बयान कर सके, बीवी अपने शौहर से दिल की बात कह सके और मां अपने बच्चों के सामने यह मान सके कि वह भी कभी थक जाती है।

हमें अपनी बेटियों की तरबियत भी इस अंदाज़ से करनी चाहिए कि उन्हें सिर्फ “अच्छी बहू” या “अच्छी बीवी” बनने का सबक न दिया जाए, बल्कि एक अच्छा इंसान बनने का शऊर भी दिया जाए।

उन्हें तालीम, खुद-एतमादी, फैसले करने की सलाहियत और अपने हुकूक व ज़िम्मेदारियों का इल्म भी दिया जाना चाहिए।

साथ ही बेटों को भी यह सिखाया जाए कि औरत की खिदमत को उसकी कमतरी न समझें और घर के काम में हाथ बंटाना किसी मर्द की शान के खिलाफ नहीं है।

ज़िंदगी में तवाज़ुन बहुत ज़रूरी है। औरत रिश्तों से मुंह न मोड़े, अपनी ज़िम्मेदारियों से फरार न हो और मोहब्बत को कम न करे। लेकिन मोहब्बत का मतलब यह भी नहीं कि वह अपनी पूरी शख्सियत मिटा दे।

औरत किसी घर की सिर्फ ज़रूरत नहीं, बल्कि उस घर की एक मुकम्मल शख्सियत है।

उसके भी कुछ ख्वाब हैं, जिन्हें ज़िंदगी के किसी पड़ाव पर सिर्फ इसलिए दफन नहीं कर देना चाहिए कि अब उसकी ज़िम्मेदारियां ज्यादा हैं।

ख्वाब हमेशा बड़े नहीं होते। कभी एक पुरसुकून सुबह, अपनी पसंद की किताब, कुछ लम्हों की तन्हाई, किसी अज़ीज़ से बेफ़िक्री की बातचीत या अपने पसंदीदा काम के लिए थोड़ा-सा वक्त भी इंसान के लिए बहुत बड़ी खुशी बन जाता है।

इसलिए औरत अपनी ज़ात को आखिरी सफ में खड़ा करना छोड़ दे। दूसरों के लिए जीना यक़ीनन खूबसूरत है, मगर अपने वजूद की हिफाज़त भी एक ज़िम्मेदारी है।

अपनों के लिए जीती रहिए, मगर खुद से बेवफाई न कीजिए। सबके दुख बांटिए, मगर अपने दिल का दुख भी सुनिए। सबकी खुशियों का ख्याल रखिए, मगर अपनी खुशी को भी ज़िंदगी से बेदखल न कीजिए।

क्योंकि एक औरत जब खुद को संभालकर रखती है तो वह सिर्फ अपनी ज़िंदगी नहीं संवारती, बल्कि अपने पूरे घर को मजबूत सहारा देती है।

आप औरत हैं, सिर्फ एक रिश्ता नहीं।

आपकी अपनी एक पहचान है, एक वजूद है, एक दिल है और एक ज़िंदगी है।

इस ज़िंदगी को दूसरों के नाम करते-करते खुद को इतना भी न भूलिए कि आईने में नज़र आने वाली औरत आपको अजनबी लगने लगे।

अपनों के लिए चराग बनिए, मगर खुद को जलाकर नहीं—अपनी रोशनी बचाकर।

लेखक : डॉ. क़मर सरूर

Source: Haqeeqat Times