तालीम, काम और संपर्क के साथ मनोरंजन के इस्तेमाल में एतदाल; बच्चों के स्क्रीन टाइम और फैमिली टाइम पर खास तवज्जो की जरूरत

 

आज के आधुनिक दौर में मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का एक अहम और मुफीद ज़रिया बन चुका है। तालीम, रोज़गार, बैंकिंग, मेडिकल मालूमात, ऑनलाइन सर्विसेज, आपसी राब्ते और खबरों के हासिल करने के लिए मोबाइल का इस्तेमाल कई मौकों पर जरूरी हो गया है। हालांकि जरूरत के लिए इस्तेमाल होने वाला यही डिवाइस अगर हद से ज्यादा मनोरंजन, सोशल मीडिया और गैर-ज़रूरी सरगर्मियों के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो यह कीमती वक्त के ज़ाया होने का सबब बन सकता है।

टेक्नोलॉजी को गलत करार नहीं दिया जा सकता। असल अहमियत इस बात की है कि इसे किस मकसद और कितने वक्त के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। जरूरी मालूमात हासिल करने के लिए कुछ मिनट मोबाइल इस्तेमाल करने के बजाय कई लोग सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो, ऑनलाइन गेम्स और दूसरे मनोरंजक कंटेंट में लंबा वक्त गुजार देते हैं। खास तौर पर बच्चों और नौजवानों के मोबाइल इस्तेमाल के मामले में वालिदैन और असातिज़ा की मुनासिब रहनुमाई जरूरी है।

कुछ मिनट घंटों में तब्दील न हों

अक्सर “सिर्फ पांच मिनट मोबाइल देखता हूं” से शुरू होने वाला इस्तेमाल उम्मीद से कहीं ज्यादा देर तक जारी रहता है। सोशल मीडिया और मनोरंजन के प्लेटफॉर्म लगातार नया कंटेंट पेश करते रहते हैं, जिसकी वजह से यूजर बार-बार मोबाइल स्क्रीन की तरफ मुतवज्जो हो सकता है।

इसका असर स्टूडेंट्स की पढ़ाई, नौजवानों के रोज़गार से जुड़े काम, खेल, मुताला, शौक और परिवार के साथ गुजारे जाने वाले वक्त पर पड़ सकता है। इसलिए मोबाइल इस्तेमाल करने के लिए खुद अपने लिए वक्त की एक हद तय करना एक मुफीद आदत साबित हो सकती है।

क्या बच्चों को खाना खिलाने के लिए मोबाइल जरूरी है?

आजकल कई घरों में बच्चों को खाना खिलाते वक्त मोबाइल फोन पर कार्टून, शॉर्ट वीडियो या दूसरे मनोरंजक प्रोग्राम दिखाने का रुझान देखा जा रहा है। जब बच्चा खाना खाने से इनकार करता है या जिद करता है, तो मोबाइल दिखाने से वह आसानी से खाना खा लेता है। इसी वजह से वालिदैन कई बार इस तरीके को अपनाते हैं।

लेकिन अगर कभी-कभार इस्तेमाल होने वाला यह तरीका रोज़मर्रा की आदत बन जाए, तो बच्चे को खाना खाते वक्त मोबाइल की उम्मीद होने लग सकती है। इसलिए बच्चों को खाना खिलाने के आसान तरीके के तौर पर मोबाइल पर लगातार निर्भर रहने के बजाय उनकी तवज्जो खाने और परिवार के लोगों के साथ बातचीत की तरफ लाने की कोशिश की जानी चाहिए।

खाने का वक्त सिर्फ खाना खाने का वक्त नहीं, बल्कि परिवार के लोगों के एक-दूसरे से बातचीत करने, बच्चों की रोज़मर्रा की सरगर्मियों के बारे में जानने और स्वस्थ खान-पान की आदतें पैदा करने का भी एक मौका है। मुमकिन हो तो खाने के वक्त पूरे परिवार के लिए मोबाइल फोन से दूरी रखने की आदत अपनाई जानी चाहिए।

तवज्जो और वक्त के बेहतर इंतजाम के लिए मोबाइल पर काबू जरूरी

मोबाइल को बार-बार चेक करने की आदत रोज़मर्रा के कामों में खलल डाल सकती है। पढ़ाई के दौरान नोटिफिकेशन देखना, काम के बीच सोशल मीडिया खोलना या लगातार शॉर्ट वीडियो देखते रहना तवज्जो को असल काम से हटा सकता है।

स्टूडेंट्स पढ़ाई के दौरान और कर्मचारी काम के वक्त गैर-ज़रूरी मोबाइल इस्तेमाल को कम कर सकते हैं। एक काम पूरा करने के बाद मोबाइल चेक करने जैसे आसान उसूल वक्त के बेहतर इंतजाम में मददगार साबित हो सकते हैं।

नींद का वक्त भी मोबाइल की नज़र न हो

रात को सोने से पहले मोबाइल देखना बहुत से लोगों के रोज़मर्रा के मामूल का हिस्सा बन चुका है। “एक वीडियो और देखकर सोता हूं” से शुरू होने वाला इस्तेमाल कभी-कभी उम्मीद से ज्यादा देर तक जारी रहता है, जिससे सोने का वक्त भी आगे बढ़ सकता है।

इसलिए सोने से पहले मोबाइल के इस्तेमाल को कम करना, गैर-ज़रूरी नोटिफिकेशन बंद करना और रात के वक्त मोबाइल फोन को बिस्तर से कुछ दूरी पर रखना जैसी आसान एहतियाती तदाबीर अपनाई जा सकती हैं।

वालिदैन बच्चों के लिए अमली मिसाल बनें

बच्चों से सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि “मोबाइल मत देखो।” वालिदैन का खुद मोबाइल फोन के इस्तेमाल में एतदाल बरतना भी अहम है। बच्चे घर के माहौल और बड़ों के रवैये से बहुत सी आदतें सीखते हैं।

अगर खाने के वक्त पूरा परिवार मोबाइल फोन एक तरफ रखने की आदत अपनाए, तो बच्चों के लिए भी इस पर अमल करना आसान होगा। बच्चों से बातचीत करना, उन्हें कहानियां सुनाना, किताबें पढ़ाना, खेलना, ड्रॉइंग करना और आउटडोर एक्टिविटीज में शामिल करना मोबाइल के बेहतर विकल्प हो सकते हैं।

जब बच्चा बोर हो तो हर बार उसके हाथ में मोबाइल देने के बजाय कुछ वक्त उसके साथ गुजारने की कोशिश न सिर्फ उसे मशगूल रखने का जरिया बन सकती है, बल्कि पारिवारिक रिश्तों को भी मजबूत कर सकती है।

मोबाइल रहे, लेकिन उसके इस्तेमाल की हद भी रहे

आज के दौर में मोबाइल फोन को पूरी तरह छोड़ देना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं है। तालीम, रोज़गार, राब्ते और जरूरी मालूमात के लिए यह एक अहम जरिया है। असल सवाल मोबाइल के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि इस बात का है कि इसे कितने वक्त और किस मकसद के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

खाने के वक्त, परिवार के साथ बातचीत के वक्त, पढ़ाई के दौरान और सोने से पहले के समय को मुमकिन हद तक मोबाइल से पाक रखने की आदत अपनाई जा सकती है। दिनभर मोबाइल पर गुजारे जाने वाले वक्त का जायजा लेकर गैर-ज़रूरी इस्तेमाल को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।

बच्चों को खाना खिलाते वक्त मोबाइल दिखाना कुछ हालात में फौरी हल महसूस हो सकता है, लेकिन वालिदैन को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि यह रोज़मर्रा की स्थायी आदत न बन जाए। बच्चे के हाथ में मोबाइल देने के बजाय कुछ मिनट मोबाइल एक तरफ रखकर उससे बात करना, खेलना या खाने के बारे में बातचीत करना ज्यादा बामानी तरीका हो सकता है।

मोबाइल फोन हमारी जिंदगी को आसान बनाने वाला जरिया होना चाहिए, हमारे कीमती वक्त को पूरी तरह अपने कब्जे में लेने वाला माध्यम नहीं। टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल जरूर करें, लेकिन उसके इस्तेमाल की हद भी खुद तय करें। बच्चों का बचपन मोबाइल स्क्रीन तक महदूद न हो, बल्कि परिवार की सतह पर स्वस्थ और संतुलित डिजिटल आदतों को फरोग देना वक्त की अहम जरूरत है।

लेखक: शब्बीर अहमद

Source: Haqeeqat Times