डिजिटल दौर में बचपन की हिफाज़त का चैलेंज

स्मार्टफोन की चमकती स्क्रीन, बचपन के बदलते रंग

क्या डिजिटल सहूलियत बच्चों की सेहत, तालीम, तख़्लीकी सलाहियत और ख़ानदानी रिश्तों को मुतास्सिर कर रही है?

आज के डिजिटल दौर में स्मार्टफोन और इंटरनेट हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं। तालीम, मालूमात और राब्ते के मैदान में टेक्नोलॉजी ने बेशुमार सहूलियतें फ़राहम की हैं। लेकिन बच्चों में स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल ने वालिदैन, असातिज़ा और माहिरीन-ए-तालीम के सामने कई अहम सवाल भी खड़े कर दिए हैं।

फ़िक्र की बात ये है कि कम उम्र बच्चे भी मोबाइल फ़ोन चलाने, वीडियो देखने और गेम खेलने में ग़ैरमामूली दिलचस्पी लेने लगे हैं। जो बच्चा अभी ठीक से बोलना भी नहीं सीखा, वो भी स्क्रीन पर अपनी पसंद की वीडियो तलाश करने और उसे चलाने में महारत दिखाता है।

ज़ाहिर है, ये टेक्नोलॉजी से वाक़िफ़ियत और ज़हानत की अलामत महसूस होती है। लेकिन जब इसका इस्तेमाल ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाए, तो यही आदत बच्चों की जिस्मानी, ज़ेहनी, तालीमी और समाजी नशोनुमा पर मनफ़ी असर डाल सकती है।

बच्चे स्मार्टफोन जल्दी क्यों सीख लेते हैं?

बचपन सीखने, देखने और नई चीज़ों को समझने का सबसे अहम दौर होता है। बच्चे अपने आस-पास के माहौल को देखकर चीज़ों की नक़ल करते हैं।

स्मार्टफोन की रंग-बिरंगी स्क्रीन, हरकत करती तस्वीरें, दिलचस्प आवाज़ें और फ़ौरन मिलने वाला रिस्पॉन्स बच्चों को अपनी तरफ़ खींचता है। वीडियो और गेम इस तरह बनाए जाते हैं कि बच्चा बार-बार उनकी तरफ़ लौटने की ख़्वाहिश महसूस करे।

बच्चे अभी अपने वक़्त और आदतों को कंट्रोल करना पूरी तरह नहीं सीख पाते। इसी वजह से वो मोबाइल के इस्तेमाल में आसानी से हद से आगे बढ़ सकते हैं।

लेकिन मोबाइल चलाने की महारत को ज़ेहनी पुख़्तगी या हक़ीक़ी ज़हानत का पैमाना समझना दुरुस्त नहीं। असल बात ये है कि बच्चा टेक्नोलॉजी को किस मक़सद के लिए और कितनी देर इस्तेमाल कर रहा है।

स्मार्टफोन के ज़्यादा इस्तेमाल से जिस्मानी नुक़सान

लगातार स्क्रीन देखने से बच्चों में आँखों की थकान, ख़ुश्की, सरदर्द और आँखों पर दबाव जैसी शिकायतें हो सकती हैं। ख़ास तौर पर जब बच्चा लंबे वक़्त तक मोबाइल को आँखों के क़रीब रखकर देखता रहे और बीच में ब्रेक न ले, तो परेशानी बढ़ सकती है।

मोबाइल में ज़्यादा मसरूफ़ रहने की वजह से बच्चे खेल-कूद, दौड़ने, साइकिल चलाने और खुली हवा में वक़्त गुज़ारने से दूर हो जाते हैं। जिस्मानी सरगर्मियों की कमी से वज़न बढ़ने, सुस्ती और सेहत से जुड़े दूसरे मसाइल पैदा हो सकते हैं।

रात देर तक मोबाइल इस्तेमाल करने से नींद का मामूल भी ख़राब हो सकता है। स्क्रीन की रोशनी और दिलचस्प वीडियो बच्चों को देर तक जगाए रख सकती हैं। इसका नतीजा अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन और पढ़ाई में दिलचस्पी की कमी की सूरत में सामने आ सकता है।

ज़ेहनी और नफ़्सियाती असरात

बच्चों के ज़रूरत से ज़्यादा स्क्रीन इस्तेमाल का एक अहम पहलू उनके रवैये में तब्दीली है।

अगर बच्चा हर वक़्त मोबाइल मांगे, मोबाइल न मिलने पर बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा करे या दूसरे कामों में दिलचस्पी खोना शुरू कर दे, तो वालिदैन को इस आदत पर तवज्जो देनी चाहिए।

अलबत्ता, हर बार ग़ुस्सा करना या रोना मोबाइल की लत की अलामत नहीं होता। इसके पीछे दूसरी वजहें भी हो सकती हैं।

तेज़ रफ़्तार वीडियो, लगातार बदलते मंज़र और छोटे-छोटे वीडियो देखने की आदत से कुछ बच्चों के लिए किताब पढ़ना, सबक़ याद करना और किसी एक काम पर देर तक तवज्जो देना मुश्किल हो सकता है।

अगर मोबाइल बच्चों की हक़ीक़ी ज़िंदगी की सरगर्मियों पर हावी हो जाए, तो दोस्तों, बहन-भाइयों और घर के दूसरे अफ़राद के साथ मिलने-जुलने के मौक़े भी कम हो सकते हैं।

बचपन में बातचीत, मिल-जुलकर खेलना और दूसरों के जज़्बात को समझना, बच्चे की शख़्सियत बनाने में अहम किरदार अदा करता है।

तालीम और अख़लाक़ी तरबियत पर असर

स्मार्टफोन तालीमी मालूमात और मुफ़ीद कंटेंट तक पहुँचने का बेहतरीन ज़रिया बन सकता है। लेकिन बग़ैर निगरानी के इसका इस्तेमाल बच्चों को नामुनासिब, तशद्दुद पर मबनी या उनकी उम्र के लिहाज़ से ग़ैर-मुनासिब कंटेंट तक भी पहुँचा सकता है।

सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और वीडियो प्लेटफ़ॉर्म पर ज़रूरत से ज़्यादा वक़्त गुज़ारना होमवर्क, मुतालआ और दूसरी तालीमी सरगर्मियों को मुतास्सिर कर सकता है।

वालिदैन को समझना चाहिए कि बच्चे को सिर्फ़ मोबाइल दे देना काफ़ी नहीं है। इस बात पर भी नज़र रखना ज़रूरी है कि बच्चा क्या देख रहा है, किन लोगों से बात कर रहा है और इंटरनेट का इस्तेमाल किस मक़सद के लिए कर रहा है।

बच्चों को ऑनलाइन महफ़ूज़ रखने के साथ उन्हें अच्छे-बुरे की पहचान, अपनी ज़ाती मालूमात की हिफ़ाज़त और अजनबी लोगों से एहतियात करने की तरबियत देना भी ज़रूरी है।

वालिदैन के लिए ज़रूरी एहतियाती तदाबीर

बच्चों को स्मार्टफोन से बिल्कुल दूर रखना हर सूरत में मुमकिन या ज़रूरी नहीं है। लेकिन उनकी उम्र और ज़रूरत के मुताबिक मोबाइल का इस्तेमाल महदूद करना बहुत ज़रूरी है।

आलमी इदारा-ए-सेहत यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन (डब्ल्यूएचओ) की रहनुमाई के मुताबिक, एक साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की सिफ़ारिश नहीं की जाती। एक साल के बच्चों के लिए भी बैठकर स्क्रीन देखने की सिफ़ारिश नहीं है।

दो साल के बच्चों और तीन से चार साल के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम रोज़ाना एक घंटे से ज़्यादा नहीं होना चाहिए। इससे कम वक़्त बेहतर है।

बड़े बच्चों के लिए भी मोबाइल के इस्तेमाल में तवाज़ुन रखना, पूरी नींद लेना और जिस्मानी सरगर्मियों को तरजीह देना ज़रूरी है।

वालिदैन को चाहिए कि बच्चों को चुप कराने, खाना खिलाने या मसरूफ़ रखने के लिए हर बार मोबाइल न दें। खाना खाते वक़्त और सोने से पहले मोबाइल से दूर रहने की आदत डालें।

बच्चों के लिए रोज़ाना खेल-कूद, पेंटिंग, कहानियाँ सुनने, किताबें पढ़ने और दूसरी तख़्लीक़ी सरगर्मियों का वक़्त मुक़र्रर करें।

उन्हें पार्क और खेल के मैदानों में ले जाएँ, ताकि वो सेहतमंद रहने के साथ दूसरे बच्चों से घुलने-मिलने का हुनर भी सीखें।

सबसे अहम बात ये है कि वालिदैन ख़ुद भी अपने रवैये पर ग़ौर करें। अगर घर के बड़े हर वक़्त मोबाइल में मसरूफ़ रहेंगे, तो बच्चों से मोबाइल का कम इस्तेमाल करने की तवक़्क़ो करना मुश्किल होगा।

बच्चों के साथ रोज़ाना कुछ वक़्त मोबाइल से दूर रहकर गुज़ारें। उनकी बातें सुनें, उनके सवालों के जवाब दें और उनके साथ खेलने व सीखने में हिस्सा लें।

तालीमी ज़रूरत के लिए मोबाइल देने की सूरत में पैरेंटल कंट्रोल और महफ़ूज़ कंटेंट की सेटिंग का इस्तेमाल करें। लेकिन याद रखें कि टेक्नोलॉजी पर निगरानी के साथ वालिदैन की रहनुमाई और बच्चों के साथ भरोसे का रिश्ता भी बहुत ज़रूरी है।

बच्चों का मुस्तक़बिल हमारी मुश्तरका ज़िम्मेदारी

बच्चे किसी भी क़ौम का क़ीमती सरमाया होते हैं। उनकी शख़्सियत, आदतों और सोच को बनाने में वालिदैन, असातिज़ा और पूरे मुआशरे का अहम किरदार होता है।

स्मार्टफोन अपने आप में दुश्मन नहीं है। असल मसला इसका बेजा इस्तेमाल और बच्चों को सही रहनुमाई न मिलना है।

अगर टेक्नोलॉजी को तालीम, मालूमात और अच्छी सरगर्मियों के लिए तवाज़ुन के साथ इस्तेमाल किया जाए, तो ये बच्चों के लिए मुफ़ीद साबित हो सकती है।

लेकिन अगर मोबाइल हक़ीक़ी ज़िंदगी, खेल-कूद, मुतालआ और ख़ानदानी रिश्तों की जगह ले ले, तो इसके मनफ़ी असरात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

आज ज़रूरत इस बात की है कि बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन देने से पहले उन्हें इसका सही इस्तेमाल करना सिखाया जाए। वक़्ती सहूलियत और ख़ामोशी की ख़ातिर उनके क़ीमती बचपन को स्क्रीन तक महदूद न कर दिया जाए।

मोहब्बत, तवज्जो, अच्छी तरबियत और मुनासिब निगरानी ही वो बुनियादें हैं जिन पर एक सेहतमंद और बासलाहियत नस्ल की तामीर मुमकिन है।

आख़िरी पैग़ाम

“रोशनी जिसको समझते हो, ज़वाल-ए-वक़्त है,
नस्ल-दर-नस्ल मिटा दे, ये वो तूफ़ान है।”

Source: Haqeeqat Times