देशभर में लाखों खाद्य नमूनों की जांच के बावजूद लाइसेंस रद्द करने जैसे कड़े कदमों में गिरावट दर्ज हुई है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि उल्लंघन लगातार सामने आ रहे हैं, लेकिन कार्रवाई कमज़ोर होती जा रही है. इससे खाद्य सुरक्षा तंत्र की प्रभावशीलता और उपभोक्ताओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.
नई दिल्ली: फरवरी 2026 में आंध्र प्रदेश के ईस्ट गोदावरी जिले में अचानक कुछ लोगों को उल्टी, पेट दर्द, पेशाब न आने और गुर्दे से जुड़ी समस्याएं शुरू हुईं. जब किडनी फेल होने के गंभीर लक्षणों वाले कई मरीज़ सामने आए तब स्वास्थ्य अधिकारियों ने जांच शुरू की. 16 फरवरी से 21 मार्च के बीच इन लक्षणों के साथ कुल 20 लोग विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हुए, जिनमें से 16 को नहीं बचाया जा सका, तीन का इलाज चल रहा है और एक को ठीक होने के बाद छुट्टी दे दी गई.
इन मरीज़ों में बुज़ुर्ग और बच्चे भी शामिल थे, जिनमें से कई को डायलिसिस और वेंटिलेटर सपोर्ट की ज़रूरत पड़ गई थी.
बीते रविवार (22 मार्च) को जारी एक आधिकारिक प्रेस रिलीज़ में लैब जांच के निष्कर्ष साझा किए गए, जो बताते हैं कि इन 16 मरीजों की मृत्यु मिलावटी दूध पीने से हुई, जिसमें ‘एथिलीन ग्लाइकोल’ नाम के ज़हरीले पदार्थ की मिलावट थी. दूषित दूध पीने का असर यह हुआ कि उनके गुर्दे गंभीर रूप से ख़राब हो गए और अंततः कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया.
इससे पहले बीते 14 मार्च को राजस्थान की राजधानी जयपुर से 1.5 लाख किलोग्राम एक्सपायर्ड (अवधि समाप्त) पैक्ड खाद्य सामान जब्त किए गए थे. इसमें नूडल्स, सॉस और मेयोनेज़ शामिल थे. छानबीन के दौरान ऐसे उपकरण भी मिले जिनसे पैकेज की एक्सपायरी डेट बदलकर पुराने सामान को फिर से बाजार में बेचा जा रहा था.
इस महीने की शुरुआत में किए गए अलग-अलग छापों में हैदराबाद कमिश्नर के टास्क फोर्स ने एक टन से अधिक मिलावटी अदरक-लहसुन पेस्ट और सैकड़ों किलोग्राम सड़ चुके बकरी और भेड़ के अंग जब्त किए थे.
पिछले माह झारखंड के पलामू जिले में एक मेले में संदिग्ध मिलावटी भोजन खाने से कम से कम 175 लोग, जिनमें ज्यादातर बच्चे थे, बीमार हो गए.
ये कुछ उदाहरण मात्र हैं, जो आम लोगों की खाने की थालियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है. फर्जी पनीर, मिलावटी शहद, दूषित दूध और गलत लेबल वाले खाद्य उत्पादों की खबरों से इंटरनेट भरा हुआ है. बीच-बीच में खाद्य सुरक्षा और मानकों की नियामक संस्था भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की सीमित कार्रवाइयां भी सुर्खियां बनाती हैं, लेकिन असुरक्षित खाद्य पदार्थों का बाज़ार चलता रहता है.
बीते 13 मार्च को लोकसभा में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से दिए गए एक जवाब के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में देशभर में लाखों खाद्य नमूनों की जांच की गई, लेकिन इसके मुकाबले लाइसेंस रद्द करने जैसे कड़े कदम बेहद सीमित रहे.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 से 2024-25 के बीच कुल मिलाकर 5.18 लाख नमूनों की जांच की गई. हर साल लगभग 1.7 लाख सैंपल की जांच हो रही है.
- 2022-23 में 1.77 लाख
- 2023-24 में 1.70 लाख
- 2024-25 में 1.70 लाख
यानी निगरानी का दायरा व्यापक है और जांच के आंकड़े लगभग स्थिर हैं. इसके बावजूद, लाइसेंस रद्द करने के मामलों की संख्या सैकड़ों में सिमटी हुई है और हाल के वर्षों में इसमें भारी गिरावट भी दर्ज की गई है.
2022-23 में जहां 500 से अधिक लाइसेंस रद्द किए गए थे, वहीं 2024-25 में यह संख्या घटकर करीब 200 के आसपास रह गई. इसके विपरित 2022-23 की तुलना में 2024-25 में दोषसिद्धि और जुर्माना के साथ निपटाए गए मामलों की संख्या बढ़ी है, इससे यह साबित होता है कि खाने में मिलावट के मामले बढ़े हैं.
तीन साल में आधे हो गए हैं लाइसेंस रद्द करने के मामले
| 2022-23 | 533 मामले |
| 2023-24 | 408 मामले |
| 2024-25 | 220 मामले |
दोषसिद्धि और जुर्माना के साथ निपटाए गए मामले
| वर्ष | आपराधिक मामले/दोषसिद्धि की संख्या | दीवानी मामले/जुर्माना से निपटाए गए मामलों की संख्या |
| 2022-23 | 1188 | 28464 |
| 2024-25 | 1265 | 30142 |
यह रुझान इस सवाल को जन्म देता है कि जब उल्लंघनों की पहचान लगातार हो रही है, तो सख्त कार्रवाई क्यों नहीं बढ़ रही और क्या जुर्माना आधारित सिस्टम उल्लंघनों को रोकने में नाकाम है?
इन सवालों के जवाब के लिए संवाददाता ने भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) से संपर्क किया है, जिसने ख़बर के प्रकाशन तक जवाब नहीं दिया है. उनका उत्तर मिलने पर खबर में जोड़ दिया जाएगा.
हालांकि, केंद्र सरकार का कहना है कि खाद्य सुरक्षा कानून का प्रवर्तन केंद्र और राज्यों की साझा जिम्मेदारी है. यानी केंद्र सरकार का काम मानक तय करना और कानून बनाना है वहीं, इन मानकों को लागू करने और खाद्य सुरक्षा की व्यवस्था खड़ी करने की जिम्मेदारी राज्यों की होती है, जिसके तहत फूड कंट्रोलर, फूड इंस्पेक्टर और फूड सेफ्टी ऑफिसर नियुक्त किए जाते हैं.
किन राज्यों में सबसे ज्यादा उल्लंघन?
राज्यवार आंकड़ों में असंतुलन स्पष्ट दिखाई देता है. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में 2024-25 के दौरान 30 हजार से अधिक नमूनों की जांच की गई और करीब 15 हजार मामलों में उल्लंघन दर्ज हुए, लेकिन लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई महज 16 मामलों तक सीमित रही.
राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी हजारों मामलों के बावजूद लाइसेंस रद्द करने के मामले उंगलियों पर गिने जा सकते हैं.
दक्षिण भारत के राज्यों में तस्वीर कुछ अलग जरूर दिखती है, जहां आपराधिक मामलों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है. तमिलनाडु और केरल में सैकड़ों आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए हैं, लेकिन वहां भी अंतिम दंडात्मक कार्रवाई सीमित ही नजर आती है.


सरकार का कहना है कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत निरीक्षण, सैंपलिंग और प्रवर्तन की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है और उल्लंघन पाए जाने पर जुर्माना, नोटिस या अन्य नियामक कार्रवाई की जाती है. हालांकि, उपलब्ध आंकड़े यह संकेत देते हैं कि अधिकतर मामलों में कार्रवाई जुर्माने या चेतावनी तक ही सीमित रह जाती है, जबकि लाइसेंस रद्द करने जैसे कड़े कदम बहुत कम उठाए जाते हैं.
कुल मिलाकर, आंकड़े यह दिखाते हैं कि खाद्य सुरक्षा को लेकर निगरानी तो व्यापक है, लेकिन सख्त कार्रवाई का अभाव व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है.
क्या पर्याप्त कार्रवाई हो रही है?
ऐसे में यह चिंता स्वाभाविक है कि क्या मौजूदा तंत्र उपभोक्ताओं को सुरक्षित भोजन सुनिश्चित करने में पर्याप्त रूप से सक्षम है, या फिर यह केवल औपचारिक निगरानी तक सीमित रह गया है. जनहित में पोषण नीति की वकालत करने वाले थिंक टैंक ‘न्यूट्रिशन एडवोकेसी फॉर पब्लिक इंटरेस्ट’ की सदस्य और पब्लिक हेल्थ प्रोफेशनल डॉ. वंदना प्रसाद भारत की वर्तमान नियामक प्रणाली कमजोर बताती हैं.
द वायर हिंदी से बातचीत में वह कहती हैं, ‘खाद्य क्षेत्र का बड़ा हिस्सा असंगठित होने के कारण मिलावट या दूषण तेजी से बढ़ रहा है. लेकिन हमारी वर्तमान नियामक प्रणाली कमजोर है, और इस कारण यह जनस्वास्थ्य के लिए एक गंभीर मुद्दा बन चुका है.’
सरकारी आंकड़े दिखा रहे हैं कि कड़ी कार्रवाइयों कमी आई है, जबकि डॉ. वंदना मानती हैं कि गंभीर मामलों में कड़ी कार्रवाई बहुत जरूरी है.
वह कहती हैं, ‘खाने-पीने की चीजों में मिलावट (एडल्ट्रेशन) ज्यादातर मुनाफे के लिए किया जाता है.’ वह स्पष्ट करती हैं कि यहां हम हल्की मिलावट, जैसे दूध में पानी मिलाना, की बात नहीं कर रहे, बल्कि खाद्य पदार्थों में केमिकल और अन्य हानिकारक तत्वों की मिलावट की गंभीर समस्या की बात कर रहे हैं.
डॉ. वंदना के अनुसार, ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई बेहद जरूरी है ताकि ये उदाहरण बने और अन्य लोग ऐसा करने से डरें. साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि रेगुलेटरी तंत्र का मूल्यांकन भी आवश्यक है, यह देखने के लिए कि वर्तमान व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं. उनका कहना है कि केवल तभी प्रभावी नियंत्रण संभव है जब दोषियों को पकड़ा जाए और ठोस निगरानी तंत्र काम करे.
इस मुद्दे को संसद में उठाने वाले गंगानगर से सांसद कुलदीप इंदौरा ने द वायर हिंदी से बातचीत में कहा कि सरकार के अपने आंकड़े ही खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी उजागर करते हैं.
उन्होंने कहा, ‘आंकड़ों से यह साफ है कि उल्लंघन तो हो रहे हैं, लेकिन कार्रवाई कमजोर होती जा रही है. एफएसएसएआई और सरकार की यह ढिलाई मिलावटखोरों को खुला संरक्षण देने जैसी है. आज हालात यह हैं कि लोग नियम तोड़ते हैं और पकड़े जाने पर भी मामूली जुर्माना देकर बच निकलते हैं.’
उन्होंने चिंता जताई कि मिलावटी और घटिया खाद्य पदार्थ आम लोगों की थाली तक पहुंच रहे हैं, जो ‘धीमे जहर’ की तरह काम कर रहे हैं. इंदौरा ने कहा, ‘अगर सरकार सच में गंभीर है, तो केवल कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि सख्त और प्रभावी दंड सुनिश्चित करने होंगे. वरना मौजूदा व्यवस्था मिलावटखोरों के लिए ‘नो-फियर रेजीम’ बन चुकी है.’
जांच की संख्या और अधिक हो सकती है!
पिछले तीन वर्षों से खाद्य नमूनों की जांच की संख्या 1.7 लाख के आस-पास रही है. लेकिन यह अधिक भी हो सकती है.
डॉ. वंदना के अनुसार, जो मामले पकड़े जाते हैं, वे कुल मिलावट का केवल एक छोटा प्रतिशत हैं. आवश्यकतानुसार जितनी जांच और कार्रवाई होनी चाहिए, वह नहीं हो पा रही है. इसका मुख्य कारण मानव संसाधनों की कमी और प्रयोगशालाओं की अपर्याप्त संख्या है.
द वायर में प्रकाशित द नॉलेज कंपनी में सीनियर पार्टनर अंकुर बिसेन की एक लेख से पता चलता है कि 2025 में भारत में पैकेज्ड फूड और फूड सर्विस का कुल उपभोग 16 लाख करोड़ रुपये से अधिक और दवाइयों की खपत लगभग 3 लाख करोड़ रुपये रही. यह देशभर में फैले 2 करोड़ से अधिक बिक्री केंद्रों के जरिए हुआ. लेकिन निगरानी के लिए केवल 8,000 से कम खाद्य सुरक्षा अधिकारी हैं, यानी हर अधिकारी पर औसतन 2,500 से ज्यादा दुकानों की जिम्मेदारी.
अधिकांश राज्यों में 25%-90% रिक्तियों के कारण किसी भी बिक्री केंद्र पर फूड इंस्पेक्टर के पहुंचने की संभावना लगभग तीन साल में एक बार है. उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में 1,100 अधिकारियों की जरूरत थी, लेकिन केवल 130 सक्रिय थे.
कुछ यही हाल प्रयोगशालाओं का भी है. वर्तमान में एफएसएसएआई से मान्यता प्राप्त 200 से थोड़ी अधिक प्रयोगशालाएं हैं, जिन पर पूरे भारत के लगभग 800 जिलों, 5,000 से अधिक कस्बों और 6.4 लाख गांवों को कवर करने की जिम्मेदारी है.
इस बीच यह खबर भी आई है कि केंद्र सरकार एफएसएसएआई द्वारा जारी पंजीकरण और लाइसेंस की वैधता को स्थायी करने वाली है. पहले, खाद्य व्यवसायियों को अपने पंजीकरण और लाइसेंस समय-समय पर नवीनीकृत करने पड़ते थे. अब नए सिस्टम के तहत पंजीकरण और लाइसेंस हमेशा के लिए मान्य रहेंगे, जिससे बार-बार नवीनीकरण की जरूरत खत्म हो जाएगी.
एफएसएसएआई का हाल
एफएसएसएआई ने अपनी आखिरी वार्षिक रिपोर्ट (2023-24) में बताया है कि 824 स्वीकृत पदों में से 594 पर ही नियुक्ति हुई है यानी लगभग 28% पद खाली हैं.
इस दौरान बजट में भी कटौती जारी है. वित्त वर्ष 2024-25 में नियामक संस्था के लिए कुल 620 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया था, लेकिन वास्तव में केवल 520 करोड़ रुपये ही जारी किए गए. इसके अगले वर्ष, 2025-26 में बजट को और घटाकर 525 करोड़ रुपये कर दिया गया.
जनसंख्या के हिसाब से भारत अमेरिका से लगभग चार गुना बड़ा है, फिर भी खाद्य सुरक्षा पर होने वाला खर्च बहुत कम है. अमेरिका अपने बजट का लगभग 0.2% हिस्सा इस क्षेत्र पर खर्च करता है, जबकि भारत में यह केवल 0.02% के आसपास है.







