इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी आईटी नियम, 2021 के प्रस्तावित संशोधनों में ऑनलाइन सामग्री, ख़ासकर समाचार और समसामयिक मामलों पर केंद्र सरकार के नियंत्रण को और बढ़ाने का प्रावधान है. इसके तहत न सिर्फ मध्यस्थ (सोशल मीडिया मंच) बल्कि उन यूज़र्स को भी निगरानी के दायरे में लिया जा रहा है, जो ‘प्रकाशक’ नहीं हैं लेकिन ऑनलाइन ख़बरें और समसामयिक सामग्री पोस्ट या साझा करते हैं.
नई दिल्ली: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सोमवार (30 मार्च) को सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में प्रस्तावित संशोधन प्रकाशित किए.
इन संशोधनों में ऑनलाइन सामग्री, खासकर समाचार और समसामयिक मामलों पर, केंद्र सरकार के नियंत्रण को और बढ़ाने का प्रावधान है. इसके तहत निगरानी तंत्र को न सिर्फ मध्यस्थों (इंटरमीडियरीज़) बल्कि उन उपयोगकर्ताओं (यूज़र्स) को भी दायरे में लिया जा रहा है, जो ‘प्रकाशक’ नहीं हैं लेकिन ऑनलाइन समाचार और समसामयिक सामग्री पोस्ट या साझा करते हैं.
इन मसौदा नियमों को डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं, जिनमें इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) भी शामिल है, ने ‘डिजिटल तानाशाही’ करार दिया है. संगठन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कार्यपालिका के बढ़ते नियंत्रण को लेकर चिंता जताई है.
सोमवार को जारी इन मसौदा नियमों का शीर्षक ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) द्वितीय संशोधन नियम, 2026’ है, जिन पर 14 अप्रैल तक हितधारकों से सुझाव मांगे गए हैं. ये नियम हाल के हफ्तों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, जैसे एक्स और मेटा को जारी किए गए कई टेकडाउन आदेशों के बाद आए हैं, जिनके तहत नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट और हैंडल हटाए गए हैं.
मसौदा नियमों में नियम 8(1) के तहत संशोधन का प्रस्ताव है, इसके तहत नियम 14 (अंतर-विभागीय समिति का गठन), नियम 15 (सामग्री को ब्लॉक करने की प्रक्रिया और निर्देश) और नियम 16 (आपातकालीन स्थिति में सामग्री ब्लॉक करने के प्रावधान) अब दो स्तरों पर लागू होंगे- (क) सभी मध्यस्थ (इंटरमीडियरी) प्लेटफॉर्म्स पर; (ख) उन यूज़र्स द्वारा पोस्ट या साझा किए गए समाचार और समसामयिक सामग्री पर, जो स्वयं ‘प्रकाशक’ नहीं हैं, लेकिन इन प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट अपलोड, प्रकाशित या साझा करते हैं.
मसौदे में नियम 3(1)(g) और 3(1)(h) में भी संशोधन का प्रस्ताव है, जिसके तहत अन्य कानूनों के साथ-साथ डेटा को सुरक्षित रखने (डेटा रिटेंशन) को अनिवार्य बनाया गया है. इसके अलावा, यह भी प्रावधान किया गया है कि मध्यस्थों को लिखित रूप में जारी किसी भी स्पष्टीकरण, परामर्श, आदेश, निर्देश, मानक संचालन प्रक्रिया, आचार संहिता या दिशानिर्देश का पालन करना होगा और उसे लागू करना होगा.
मसौदे में नियम 14(2) में भी संशोधन का प्रस्ताव है, जिसके तहत अंतर-विभागीय समितियों के दायरे को ‘शिकायतों या ग़रीवेंस’ सुनने से बढ़ाकर ‘मामलों’ की सुनवाई तक विस्तारित किया गया है, जिनमें इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा संदर्भित मामले भी शामिल होंगे.
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) ने एक बयान में कहा कि भले ही इन मसौदा नियमों को ‘स्पष्टीकरणात्मक और प्रक्रियात्मक’ बताया गया हो, लेकिन वे ऑनलाइन अभिव्यक्ति पर कार्यपालिका के अधिकारों का खतरनाक विस्तार हैं.
आईएफएफ ने कहा, ‘नियम 8(1) का विस्तार कर नियम 14, 15 और 16 को शामिल करना, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (एमआईबी) की ब्लॉकिंग शक्तियों को मध्यस्थों के साथ-साथ उन यूज़र्स तक बढ़ाने का प्रयास है, जो ‘प्रकाशक’ नहीं हैं लेकिन ऑनलाइन समाचार और समसामयिक सामग्री पोस्ट करते हैं.’
‘अब अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी) मध्यस्थ प्लेटफॉर्म्स पर यूज़र्स द्वारा पोस्ट की गई समाचार सामग्री से जुड़े ‘मामलों’ की जांच कर सकती है, जबकि आचार संहिता की संवैधानिक वैधता पर अभी अदालतों में फैसला होना बाकी है. यानी, एक अलग प्रक्रियात्मक रास्ते के जरिए सरकार को वही सामग्री निगरानी तंत्र मिल जाता है, जिसे तीन उच्च न्यायालय पहले ही समस्याग्रस्त बता चुके हैं.’
आईएफएफ ने यह भी कहा कि लंबे समय तक यूज़र डेटा को अनिवार्य रूप से सुरक्षित रखने से निगरानी (सर्विलांस) और संवेदनशील डेटा के लीक होने का खतरा बढ़ सकता है.
संगठन ने कहा, ‘हम कार्यपालिका की अनियंत्रित शक्तियों के लगातार विस्तार से गहरे तौर पर चिंतित हैं, जो भारत के संविधान के खिलाफ है. मंत्रालय की मौजूदा कार्रवाई ‘डिजिटल तानाशाही’ की ओर इशारा करती है और हम इन प्रस्तावित संशोधनों को वापस लेने की मांग करते हैं.’
‘सही तरीका यह है कि लंबित मामलों पर अदालतों के अंतिम फैसले का इंतजार किया जाए, अदालतों द्वारा दी गई अंतरिम राहत का सम्मान किया जाए, और नियम बनाने के बजाय कानून बनाकर (संसद के जरिए) इन उद्देश्यों को पूरा किया जाए, ताकि वे मूल कानून की सीमा से बाहर न जाएं.’
Source: The Wire







