असम विधानसभा के चुनाव प्रचार में देश के गृह मंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री समेत भाजपा नेताओं के ‘घुसपैठियों’ पर बड़े-बड़े दावों के बावजूद इसे लेकर आधिकारिक आंकड़े सामने नहीं हैं. ‘घुसपैठियों’ पर जानकारी को लेकर दायर एक आरटीआई आवेदन के जवाब में केंद्र और राज्य दोनों सरकारों ने इससे संबंधित डेटा देने से इनकार कर दिया है.
नई दिल्ली: ‘आज से ग्यारह दिन बाद 9 तारीख को असम में चुनाव होने वाले हैं. असम की जनता को यह नहीं सोचना है कि फिर आपका वोट हिमंता बिस्वा शर्मा को मुख्यमंत्री बनाने के लिए या अपने प्रत्याशियों को विधायक बनाने के लिए है. आपका यह वोट घुसपैठिया-मुक्त असम बनाने के लिए है.’
29 मार्च (रविवार) को देश के गृह मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता असम विधानसभा प्रचार के लिए सोनितपुर और नलबारी में जनसभाएं कर रहे थे, जहां उन्होंने मतदाताओं से राज्य को ‘घुसपैठियों से मुक्त करने’ के लिए वोट देने की अपील की.
शाह ने विपक्षी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा, ‘गौरव गोगोई और राहुल गांधी कितना भी प्रयास करें, घुसपैठियों पर सख्त कार्रवाई जारी रहेगी और प्रत्येक घुसपैठिए को वापस भेजने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा.’
उल्लेखनीय है कि राज्य में 2015 से भाजपा गठबंधन सरकार में है और साल 2019 से स्वयं अमित शाह केंद्रीय गृह मंत्रालय की ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं, जिनके कार्यक्षेत्र के दायरे में देश की विभिन्न सीमाओं की सुरक्षा आती है.
उन्होंने यह भी जोड़ा कि केंद्र सरकार देशभर में घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें मतदाता सूची से हटाने और कानून के अनुसार उनके मूल स्थान पर वापस भेजने के लिए प्रतिबद्ध है. उनका यह भी दावा है कि असम की भाजपा सरकार ने पिछले 10 वर्षों में 1.25 लाख एकड़ जमीन ‘घुसपैठियों’ से मुक्त कराई है और अब कोई घुसपैठिया असम में प्रवेश नहीं कर सकता.
उधर, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा भी ‘घुसपैठियों को राज्य से निकालने’ के वादे करते नज़र आ रहे हैं. 27 मार्च को हिमंता बिस्वा शर्मा ने एक चुनावी सभा में कहा कि अगली बार सत्ता में आने पर उनकी सरकार ‘बांग्लादेशी मिया’ की ‘कमर तोड़ देगी.’
उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले पांच वर्षों में 1.5 लाख बीघा जमीन अतिक्रमण से मुक्त कराई गई है और अगले कार्यकाल में यह आंकड़ा 5 लाख बीघा तक ले जाया जाएगा.
हालांकि, चुनावी भाषणों में इतनी प्रमुखता से उठाए जा रहे ‘घुसपैठ’ के इस मुद्दे पर खुद सरकारों के पास स्पष्ट आंकड़े नहीं हैं. सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए आधिकारिक आंकड़े न तो केंद्र सरकार दे पा रही है और न ही राज्य सरकार.
असम में कितने घुसपैठिए पहचाने या पकड़े गए?
आरटीआई एक्टिविस्ट कन्हैया कुमार ने 23 फरवरी, 2026 को असम सरकार के मुख्यमंत्री सचिवालय में एक आवेदन दाखिल किया था. इस आवेदन में उन्होंने तीन प्रमुख जानकारियां मांगी थीं:
- पिछले 10 वर्षों (या उपलब्ध अवधि) में असम में कितने ‘घुसपैठिए’ पहचाने या पकड़े गए.
- इसी अवधि में कितनों को निर्वासित (डिपोर्टेड) या प्रत्यावर्तित (रिपैट्रिएटेड) किया गया.
- इन ‘घुसपैठियों’ का देशवार (राष्ट्रीयता के आधार पर) विवरण.
इस संबंध में असम का मुख्यमंत्री सचिवालय कोई जानकारी नहीं दे पाया और आवेदन को पॉलिटिकल (बी) डिपार्टमेंट को ट्रांसफर कर दिया, जो राज्य के गृह एवं राजनीतिक विभाग का एक आंतरिक सेक्शन है.
असम सरकार ने क्या जवाब दिया?
राज्य सरकार के गृह एवं राजनीतिक विभाग ने अपने जवाब में कहा कि मांगी गई जानकारी उनके पास नहीं है, असम पुलिस बॉर्डर ऑर्गनाइजेशन के पास है. साथ ही विभाग ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि असम पुलिस बॉर्डर ऑर्गनाइजेशन को आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) के तहत जानकारी देने से छूट प्राप्त है.

धारा 24(4) क्या कहती है?
अधिनियम की धारा 24 कुछ सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को आरटीआई के दायरे से बाहर रखती है. इसी धारा की उपधारा 4 राज्य सरकारों द्वारा स्थापित उन खुफिया और सुरक्षा संगठनों पर भी लागू नहीं होता, जिन्हें राज्य सरकार समय-समय पर राजपत्र में नोटिफिकेशन जारी करके इस छूट में शामिल करती है.
लेकिन यहां एक शर्त है कि भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी जानकारी को छुपाया नहीं जा सकता.

केंद्र सरकार ने भी नहीं दिए थे आंकड़े?
गौरतलब है कि इससे पहले द वायर हिंदी ने फरवरी 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया था कि अमित शाह के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय का कहना है कि उनके पास ‘घुसपैठियों’ के आंकड़े नहीं हैं.
जनवरी 2026 में गृह मंत्रालय ने एक आरटीआई के जवाब में कहा था कि उसके पास देशभर में ‘घुसपैठियों’ से संबंधित कोई केंद्रीकृत डेटा उपलब्ध नहीं है.

मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि अवैध प्रवासियों की पहचान, गिरफ्तारी और निर्वासन की जिम्मेदारी राज्यों को सौंपी गई है. यानी केंद्र ने डेटा की जिम्मेदारी राज्यों पर डाली, जबकि अब राज्य सरकार भी जानकारी देने से इनकार कर रही है.
विरोधाभास पर उठते सवाल
अब जब केंद्र सरकार डेटा राज्यों के पास होने की बात कहती है और राज्य सरकारें आरटीआई में जानकारी देने से इनकार कर रही हैं, तो यह सवाल खड़ा होता है कि चुनावी मंचों से ‘घुसपैठियों’ से जुड़े दावे किस आधार पर किए जा रहे हैं.
यह विरोधाभास न केवल सरकारी दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि ‘घुसपैठ’ जैसा संवेदनशील मुद्दा किस तरह चुनावी राजनीति का हिस्सा बन गया है.
बता दें कि राज्य की 126 विधानसभा सीटों के लिए 9 अप्रैल, 2026 को एक ही चरण में मतदान होना है, जबकि मतगणना 4 मई को होगी.
इस चुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष के बीच है. भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही है, ऐसे में ‘घुसपैठ’ का मुद्दा उसके चुनावी एजेंडे का एक केंद्रीय हिस्सा बन गया है.
Source: The Wire







