ज़िंदगी अनमोल है, नाकामी आख़िर नहीं—गुफ़्तगू और सहारा ही हल

ज़िंदगी एक बहुत क़ीमती तोहफ़ा है। जब इंसान इस दुनिया में पहली सांस लेता है, तभी से उसके पास महसूस करने और तजुर्बा करने के अनगिनत मौके होते हैं। सही कहा गया है कि ज़िंदगी सबसे खूबसूरत जश्न है, जिसे हम मना सकते हैं। लेकिन कुछ वक़्त ऐसे भी आते हैं जब यही ज़िंदगी बोझ लगने लगती है और जीने की वजह खत्म होती हुई महसूस होती है।

आज के दौर में नौजवानों पर तालीम, करियर और उम्मीदों का दबाव इतना बढ़ गया है कि वो नाकामी को बर्दाश्त नहीं कर पाते। वालिदैन अक्सर अपने अधूरे ख़्वाब बच्चों पर थोप देते हैं। बचपन से ही हर फील्ड में कामयाबी हासिल करने का दबाव दिया जाता है—चाहे पढ़ाई हो, खेल हो या कोई और हुनर। इस दौड़ में बच्चे अपनी दिलचस्पी और जुनून से दूर होते जाते हैं।

नंबर लाने की होड़ में बच्चे असल सीखने की प्रक्रिया भूल जाते हैं और सिर्फ इम्तिहान तक महदूद हो जाते हैं। 90 फ़ीसदी से ज़्यादा नंबर ही कामयाबी का पैमाना बन गया है। ऐसे में जब पहली बार नाकामी सामने आती है, तो ना बच्चे और ना ही उनके घर वाले उसे संभाल पाते हैं। यहीं से मनफी सोच और डिप्रेशन की शुरुआत होती है।

डिप्रेशन के शुरुआती असरात में तन्हाई, चिड़चिड़ापन, तवज्जो की कमी, दिलचस्पी का खत्म होना और सेहत का गिरना शामिल हैं। अगर वक़्त रहते इन्हें समझा न जाए, तो नौजवान नशे या खुदकुशी जैसे खतरनाक रास्तों की तरफ बढ़ सकते हैं।

तारीख गवाह है कि दुनिया के कई बड़े लोग शुरुआत में नाकाम रहे। होंडा, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल और फोर्ड जैसी कंपनियां उन्हीं लोगों ने बनाई जिन्होंने कई बार नाकामी का सामना किया। आइंस्टीन और एडिसन को भी शुरू में नाकाबिल समझा गया था। ये साबित करता है कि नाकामी ही कामयाबी की असल सीढ़ी है।

माहिरीन के मुताबिक इस मसले का सबसे बड़ा हल है गुफ़्तगू। घर वालों के साथ वक्त गुजारना, बच्चों से खुलकर बात करना और उनके जज़्बात समझना बेहद जरूरी है। रोज़ कम से कम एक वक्त साथ बैठकर बात करना रिश्तों को मजबूत करता है और ज़ेहनी दबाव कम करता है।

समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। हर बच्चे की अपनी अलग सलाहियत और ख़्वाहिश होती है। पारंपरिक करियर के अलावा भी कई रास्ते हैं, जिन्हें अपनाने के लिए हौसला अफ़ज़ाई की जानी चाहिए।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मुश्किल वक्त में थोड़ा सा जज़्बाती सहारा, एक अच्छा लफ़्ज़ या एक मोहब्बत भरी झप्पी भी किसी की जान बचा सकती है। जरूरत पड़े तो प्रोफेशनल काउंसलिंग लेना भी जरूरी है।

आख़िर में वालिदैन से यही गुज़ारिश है कि वो अपने बच्चों का हर क़दम पर साथ दें और उन्हें ये यक़ीन दिलाएं कि नाकामी ज़िंदगी का अंत नहीं, बल्कि कामयाबी की तरफ एक अहम पड़ाव है।