कर्नाटक कांग्रेस: कयादत का नाज़ुक मरहला
खामोश तैयारी, खुला टकराव और गैर-यक़ीनी अंजाम

؀ हुई ताख़ीर तो कुछ बाइस-ए-ताख़ीर भी था,
आप आते थे मगर कोई अना-गीर भी था

कर्नाटक की सियासत इस वक्त एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ी है, जहां फैसले अभी होने बाकी हैं, मगर उनके असर पहले ही सामने आने लगे हैं। उपचुनाव के नतीजों का इंतजार जरूर है, लेकिन सियासी हलकों में असली बहस नतीजों पर नहीं, बल्कि उसके बाद कयादत में मुमकिन तब्दीली पर हो रही है। वज़ीर-ए-आला Siddaramaiah और नायब वज़ीर-ए-आला D. K. Shivakumar के दरमियान चल रही रस्साकशी अब पर्दे के पीछे नहीं रही; ये एक खुली और संगीन ताकत की जंग बन चुकी है।

डी. के. शिवकुमार की दिल्ली में बढ़ती सरगर्मियां इस पूरी सूरत-ए-हाल को समझने की कुंजी बन गई हैं। उनकी लगातार मुलाकातें, एहतियात भरे बयान और सियासी अंदाज़ ये इशारा करते हैं कि वो कयादत की तब्दीली को मरहला-दर-मरहला आगे बढ़ाना चाहते हैं। उनका ये कहना कि “मैं जानता हूं सिद्धारमैया को किस तरह इज़्ज़त के साथ रुख़्सत करना है” सिर्फ एक जुमला नहीं, बल्कि एक साफ सियासी पैग़ाम है।

दूसरी तरफ, सिद्धारमैया का रवैया ज़ाहिर में नरम मगर अंदर से काफी मज़बूत और मुनज़्ज़म है। वो सीधी टक्कर से बचते हुए एक एहतियाती हिकमत-ए-अमली पर काम कर रहे हैं। अपने करीबियों से मशविरा, मुमकिन कैबिनेट फेरबदल की तैयारी और हाईकमान तक साफ पैग़ाम पहुंचाना ये दिखाता है कि वो अपनी पोज़ीशन को बरकरार रखने के साथ-साथ और मज़बूत करना चाहते हैं।

ये टकराव सिर्फ दो शख्सियतों के दरमियान इक्तेदार की लड़ाई नहीं, बल्कि दो मुख्तलिफ सियासी सोच का टकराव भी है। एक तरफ सिद्धारमैया का तजुर्बा, समाजी इंसाफ का नैरेटिव और “AHINDA” की सियासत है, तो दूसरी तरफ डी. के. शिवकुमार की तंजीमी पकड़, वसाइल पर कंट्रोल और फैसला-कुन कयादत का दावा। यही फर्क इस मसले को और पेचीदा बना देता है।

इसी दौरान मुसलमानों और पसमांदा तबकों में बढ़ती बे-चैनी भी एक अहम मुद्दा बन चुकी है। पिछली Bharatiya Janata Party हुकूमत के दौर में मुस्लिम रिजर्वेशन खत्म कर दिया गया था, और चुनावी वादों के बावजूद मौजूदा हुकूमत इसे अब तक बहाल नहीं कर सकी है। इसका सीधा असर हजारों मुस्लिम तलबा और नौजवानों पर पड़ा है, जो तालीम और नौकरियों के मौकों से महरूम हो रहे हैं।

दूसरी तरफ, पसमांदा तबकों को मुतमइन करने के लिए अंदरूनी रिजर्वेशन का फैसला लिया गया, जिससे एक नया बैलेंस बनाने की कोशिश जरूर हुई है, मगर इसके साथ कुछ तबकों में बेचैनी और तश्वीश भी बढ़ने का अंदेशा है।

सियासी तौर पर असल सवाल नतीजों का नहीं, बल्कि उनकी ताबीर का है। अगर नतीजे हुकूमत के हक में आते हैं, तो सिद्धारमैया इसे अपनी कयादत पर अवाम के एतमाद के तौर पर पेश कर सकते हैं। लेकिन अगर नतीजे कमजोर रहते हैं, तो डी. के. शिवकुमार के लिए ये कयादत में फौरी तब्दीली की मजबूत दलील बन सकता है।

हालात का एक और पहलू “महाराष्ट्र स्टाइल” सियासत का डर है। अगर पार्टी के अंदर इख्तिलाफात बढ़ते हैं, तो अराकीन की वफादारियां बदलने, ग्रुपबाज़ी और यहां तक कि पार्टी में टूट जैसे खतरे भी पैदा हो सकते हैं।

इस पूरी सूरत-ए-हाल में एक इमकान ये भी है कि अगर दोनों बड़े लीडर एक-दूसरे को कमजोर करने में आगे बढ़ते हैं, तो कोई तीसरा चेहरा उभर सकता है। कर्नाटक की सियासत में जात और समाजी बैलेंस हमेशा अहम रहा है, इसलिए अचानक नया कयादती चेहरा सामने आना नामुमकिन नहीं।

अपोज़िशन, खास तौर पर Bharatiya Janata Party और Janata Dal (Secular), इस पूरी सियासी हलचल पर गहरी नज़र रखे हुए हैं। उनके लिए ये एक बड़ा मौका है, जिससे वो फायदा उठाने की पूरी कोशिश करेंगे।

अगर हालात ज्यादा खराब होते हैं—जैसे बहुमत पर सवाल उठें या सियासी संकट गहरा जाए—तो मरकज़ी दखलअंदाजी और आइनी कदम, यहां तक कि राष्ट्रपति राज का इमकान भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांग्रेस हाईकमान किस तरह और किस हद तक दखल देगा। क्या वो कोई फैसला-कुन कदम उठाएगा या मसले को वक्त पर छोड़ देगा? दोनों ही सूरतों में खतरे मौजूद हैं।

कुल मिलाकर, कर्नाटक कांग्रेस इस वक्त एक ऐसे दौराहे पर खड़ी है जहां हर रास्ता आज़माइश से भरा है। अगर कयादत की तब्दीली समझदारी और इत्तेफाक-ए-राय से होती है, तो ये इस्तेहकाम ला सकती है। लेकिन अगर ये दबाव और टकराव के तहत होती है, तो इसके असर लंबे अरसे तक नजर आएंगे।

आने वाले दिनों में सिर्फ ये तय नहीं होगा कि वज़ीर-ए-आला कौन रहेगा, बल्कि ये भी तय होगा कि कर्नाटक की सियासत इस्तेहकाम की तरफ बढ़ेगी या एक नए गैर-यक़ीनी दौर में दाखिल होगी।

— अब्दुल हलीम मंसूर

Source: Haqeeqat Times (Translated In Hindi)