चुनाव बाद तजज़िया

West Bengal में सीपीएम और कांग्रेस नेताओं ने सिर्फ खुद को ही नहीं डुबोया, बल्कि Mamata Banerjee को भी नुकसान पहुंचाया। अगर ये पार्टियां टीएमसी के साथ जातीं तो शायद सबकी नैया पार लग जाती। टीएमसी की हार में चुनाव आयोग की तरफ से वोटर लिस्ट से हटाए गए 91 लाख वोटों की भी बड़ी भूमिका बताई जा रही है, जबकि करीब 27 लाख वोट अभी भी जांच के दायरे में हैं। सियासी हलकों में चर्चा है कि सबने मिलकर ममता बनर्जी की पीठ में छुरा घोंप दिया।

पूरे मुल्क की नजरें जिन विधानसभा चुनावों पर टिकी थीं, उनके नतीजे अब सामने आ चुके हैं। पश्चिम बंगाल का चुनाव लोकतंत्र पर सवाल खड़े करने वाला माना जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने एक तरह से जिद ठानकर ममता बनर्जी से बंगाल “छीन” लिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने जिस “वोट चोरी” का मुद्दा उठाया, वह सही है या नहीं, यह अलग बहस है, लेकिन चुनाव आयोग की जल्दबाज़ी में हुई SIR प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

करीब 15 साल पहले जब टीएमसी पहली बार सत्ता में आई थी, तब उसके पास सिंगूर और नंदीग्राम किसान आंदोलन का बड़ा मुद्दा था। किसानों की जमीन अधिग्रहण के खिलाफ उठी आवाज़ ने ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाया। उस वक्त बीजेपी नेता Suvendu Adhikari भी आंदोलन में सक्रिय थे और ममता के करीबी माने जाते थे। लेकिन राजनीति में दोस्त कब दुश्मन बन जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता। आज दोनों एक-दूसरे के सख्त विरोधी हैं।

अब सियासी माहौल पूरी तरह बदल चुका है। किसान आंदोलन की जगह “SIR हथियार” बीजेपी के पक्ष में जाता दिखा। आरोप है कि चुनाव आयोग ने बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए वोटर लिस्ट संशोधन में जल्दबाज़ी दिखाई। वोटर लिस्ट अपडेट होना जरूरी है, लेकिन जिस तरीके और टाइमिंग में यह हुआ, उसने कई शक पैदा कर दिए।

आरोप है कि पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से नाम हटाने का काम अवैज्ञानिक तरीके से हुआ। एक ही घर में कुछ लोगों के नाम रहे और कुछ के गायब हो गए। कहीं बाप का नाम है तो बेटे का नहीं, कहीं भाई का नाम है तो बहन का नहीं। लोगों को अपनी बात रखने का पूरा मौका भी नहीं मिला। जिन नामों की जांच जारी थी, उसी दौरान चुनाव करवा दिए गए।

मुस्लिम बहुल इलाकों में ज्यादा नाम हटाए जाने की बातें भी सामने आईं। 2011 में जो मुस्लिम वोट वाम दलों से हटकर टीएमसी के पास गए थे, इस बार वे बंट गए। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में बीजेपी हिंदू वोटों को एकजुट करने में कामयाब रही। वहीं अल्पसंख्यक वोट टीएमसी को एकमुश्त नहीं मिले बल्कि कांग्रेस, वाम दलों और दूसरी पार्टियों में बंट गए। कई सीटों पर यही वोट बंटवारा टीएमसी की हार का कारण बना।

293 सीटों पर हुए चुनाव में बीजेपी ने 207 सीटें जीतकर बड़ी बढ़त बनाई, जबकि टीएमसी सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई। वोट प्रतिशत में दोनों पार्टियों के बीच सिर्फ 5.4 फीसदी का फर्क था, लेकिन सीटों में भारी अंतर देखने को मिला। बीजेपी को करीब 2.92 करोड़ वोट मिले, जबकि टीएमसी को लगभग 2.60 करोड़ वोट हासिल हुए।

2016 से बीजेपी लगातार बंगाल में मजबूत होती गई। पहले सिर्फ 3 सीटें जीतने वाली पार्टी अब भारी बहुमत तक पहुंच गई। हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण, लगातार हिंदू-मुस्लिम मुद्दों को उठाना और मजबूत ग्राउंड प्लानिंग बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हुई।

दूसरी तरफ कांग्रेस और वाम दल लगातार कमजोर होते चले गए। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बंगाल अब बीजेपी के लिए दूसरा गुजरात बन सकता है, जहां पार्टी लंबे समय तक सत्ता में रह सकती है।

ममता बनर्जी की सरकार पर कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा और पक्षपात जैसे मुद्दों पर भी सवाल उठे। संदेशखाली और आरजी कर अस्पताल केस जैसे मामलों ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया। महिलाओं का एक बड़ा तबका भी उनसे नाराज़ नजर आया।

उधर Vijay की पार्टी TVK ने Tamil Nadu चुनाव में सबको चौंका दिया। युवाओं और महिलाओं ने विजय को मौका दिया, लेकिन किसी भी पार्टी को साफ बहुमत नहीं मिला। इससे तमिलनाडु की सियासत दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है।

वहीं Kerala में उम्मीद के मुताबिक यूडीएफ ने शानदार जीत दर्ज की। मतदाताओं ने साफ तौर पर सत्ता बदलने के पक्ष में फैसला सुनाया।

Source: Vartha Bharathi (Translated In Hindi)