पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 150 सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा थी. इनमें से भाजपा ने 99 सीटें जीतीं, जबकि 2021 में वह ऐसी सिर्फ 19 सीटों पर जीती थी.
कोलकाता: कड़े मुकाबले वाले चुनावी क्षेत्रों में नतीजे अक्सर बेहद मामूली अंतर से तय होते हैं, जहां हर वोट की अहमियत होती है. इस बार तमिलनाडु में एक सीट सिर्फ एक वोट से तय हुई, जबकि राजस्थान और मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनावों के दौरान भी सांसद केवल एक वोट के अंतर से जीते थे. यानी हर वोट मायने रखता है.
पश्चिम बंगाल में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (एसआईआर) का दायरा बेहद बड़ा था. मतदाता सूची से कुल 91 लाख नाम हटाए गए. इसमें ड्राफ्ट पुनरीक्षण के दौरान एएसडीडी (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लिकेट) श्रेणियों के तहत हटाए गए 58 लाख नाम शामिल थे, जबकि 27 लाख मतदाताओं को ‘अंडर एडजुडिकेशन’ (यूए) मामलों की न्यायिक समीक्षा के बाद अयोग्य घोषित कर दिया गया.
जब 28 फरवरी 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में जोड़े गए 1.88 लाख नए मतदाताओं के आंकड़े को इसके साथ देखा जाए, तो यह साफ संकेत मिलता है कि इस पुनरीक्षण प्रक्रिया ने चुनावी नतीजों पर गणितीय रूप से निर्णायक असर डाला है.
यह प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा था, ‘अगर 10 प्रतिशत मतदाता वोट नहीं डालते और जीत का अंतर 10 प्रतिशत से ज्यादा है, तो क्या होगा? लेकिन मान लीजिए जीत का अंतर 2 प्रतिशत है और 15 प्रतिशत ऐसे मतदाता, जिनकी पहचान की गई थी, वोट नहीं डाल सके, तब स्थिति अलग हो सकती है… हम अभी कोई राय नहीं दे रहे, लेकिन हमें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा.’
निर्वाचन क्षेत्रों के आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर केवल मतदाता सूची की सामान्य सफाई भर नहीं था. इसकी राजनीतिक अहमियत इस एक तथ्य से समझी जा सकती है कि बड़ी संख्या में ऐसी सीटें थीं, जहां हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी.
यह अपने आप में यह साबित नहीं करता कि हर ऐसा नतीजा एसआईआर की वजह से बदला, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण सीधे चुनावी प्रतिस्पर्धा के केंद्र में आ गया था.
150 सीटों पर हटाए गए वोट जीत के अंतर से ज्यादा
एसआईआर के चुनावी नतीजों पर निर्णायक असर का सबसे मजबूत संकेत उन सीटों पर दिखता है, जहां जीत का अंतर कुल हटाए गए मतदाताओं से कम था. यानी एएसडीडी और यूए श्रेणियों के तहत हटाए गए मतदाताओं की संयुक्त संख्या विजयी अंतर से ज्यादा थी.
जब एएसडीडी और यूए के तहत हटाए गए मतदाताओं की संख्या को जोड़ा गया, तो कुल हटाए गए मतदाता 150 विधानसभा सीटों पर अंतिम जीत के अंतर से ज्यादा निकले. पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं, यानी ऐसी सीटों की संख्या आधे सदन से भी अधिक है.

इन सीटों में भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बढ़त मिली और वह 100 सीटों पर आगे रही, जबकि तृणमूल कांग्रेस 48 सीटों पर और कांग्रेस दो सीटों पर आगे रही.
2021 में यही तस्वीर अलग थी. तब तृणमूल कांग्रेस ने इन 150 सीटों में से 131 जीती थीं, जबकि भाजपा केवल 19 सीटें जीत सकी थी.
कोलकाता से सटे दो जिलों ने मतदाता सूची में कटौती का सबसे बड़ा असर झेला और कुल अत्यधिक प्रभावित सीटों में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी इन्हीं जिलों की रही.
उत्तर 24 परगना में 2021 में तृणमूल कांग्रेस का दबदबा था, जहां उसने प्रभावित 26 में से 23 सीटें जीती थीं. लेकिन 2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई और भाजपा ने इनमें से 21 सीटों पर कब्जा कर लिया.
इसी तरह दक्षिण 24 परगना में तृणमूल कांग्रेस ने पहले सभी 19 प्रभावित सीटें जीती थीं, लेकिन एसआईआर के बाद भाजपा ने गहरी सेंध लगाते हुए इनमें से 10 सीटें अपने नाम कर लीं.
इन केंद्रों से आगे भी मतदाता सूची में शुद्ध कटौती का असर मुस्लिम बहुल और कड़े मुकाबले वाले जिलों में साफ दिखा. मुर्शिदाबाद में 2021 में तृणमूल ने प्रभावित 15 में से 13 सीटें जीती थीं, लेकिन 2026 में यह संख्या घटकर सिर्फ 6 रह गई. यहां भाजपा ने 7 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं.
पूर्व बर्दवान में तृणमूल कांग्रेस ने पहले जीती हुई 13 में से 11 सीटें भाजपा से गंवा दीं. यही रुझान हावड़ा और हुगली में भी दिखा. इन दोनों जिलों की कुल 22 प्रभावित सीटों पर 2021 में तृणमूल कांग्रेस जीती थी, लेकिन हालिया चुनाव में भाजपा ने इनमें से 14 सीटें जीत लीं.
यह व्यापक बदलाव केवल ग्रामीण या सीमांत इलाकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी इसका असर साफ दिखाई दिया.
पश्चिम बर्धमान में भाजपा ने अत्यधिक प्रभावित सभी 8 सीटों पर जीत दर्ज की, जिनमें से 5 सीटें पहले तृणमूल कांग्रेस के पास थीं.
कोलकाता उत्तर और दक्षिण जैसे राजधानी क्षेत्रों में भी भाजपा ने 11 प्रभावित सीटों में से 6 सीटें तृणमूल कांग्रेस से छीन लीं. इनमें भवानीपुर भी शामिल है, जहां निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शुभेंदु अधिकारी से हार गईं. 2021 में इन सीटों पर तृणमूल कांग्रेस का लगभग पूर्ण वर्चस्व था.
यह संकेत देता है कि मतदाता सूची में कटौती बेतरतीब ढंग से नहीं हुई थी. इसका सबसे अधिक असर उन इलाकों पर पड़ा, जो पिछली बार तृणमूल कांग्रेस के मजबूत गढ़ माने जाते थे. भाजपा ने ऐसे 150 अत्यधिक प्रभावित चुनावी क्षेत्रों में से 100 पर कब्जा कर लिया.
सतगछिया सीट इसका एक उदाहरण है, जहां भाजपा उम्मीदवार महज 401 वोटों से जीता. लेकिन यहां कुल हटाए गए मतदाताओं की संख्या 26 हजार से अधिक थी, जिसमें 17,669 एएसडीडी और 8,785 यूए मतदाता शामिल थे.
इसी तरह राजारहाट न्यू टाउन में जीत का अंतर केवल 316 वोट था, जबकि कुल हटाए गए मतदाता 63 हजार से ज्यादा थे. रैना सीट पर भाजपा 834 वोटों से आगे रही, जबकि हटाए गए मतदाताओं की संख्या 23 हजार से ऊपर है.
क्या सबसे अधिक एएसडीडी कटौती वाले इलाकों ने भाजपा को बढ़त दी?
यदि केवल एएसडीडी (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट) श्रेणी में हटाए गए मतदाताओं को देखा जाए और यूए मामलों को अलग रखा जाए, तब भी इसका असर बेहद बड़ा दिखाई देता है.
राज्य की 110 विधानसभा सीटों पर केवल एएसडीडी कटौती की संख्या ही जीत के अंतर से अधिक थी.
इन सीटों पर भी भाजपा को असमान रूप से लाभ मिला. पार्टी ने 72 सीटें जीतीं, जो तृणमूल कांग्रेस की 36 सीटों से ठीक दोगुनी हैं. कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं.
इन सीटों पर भी लगभग पहले वाला ही पैटर्न मिलता है. उत्तर 24 परगना (19 सीटें) और दक्षिण 24 परगना (17 सीटें) इस सूची में सबसे ऊपर रहे.

2021 में इन 110 सीटों में से 102 पर तृणमूल कांग्रेस जीती थी, जबकि भाजपा के पास केवल 8 सीटें थीं.
यदि दोनों चुनावों के बीच सीधे बदलाव को देखें, तो इनमें से 66 सीटों पर सत्ता परिवर्तन हुआ. तृणमूल कांग्रेस ने ये सभी 66 सीटें गंवा दीं. भाजपा ने इनमें से 64 सीटें अपने नाम कीं, जबकि शेष 2 सीटें कांग्रेस को मिलीं.
कुल मिलाकर आंकड़े संकेत देते हैं कि नियमित एएसडीडी कटौती मुख्यतः उन्हीं सीटों पर केंद्रित रही, जहां पहले तृणमूल कांग्रेस मजबूत थी. जिन क्षेत्रों में यह कटौती जीत के अंतर से अधिक रही, वहां तृणमूल का पुराना दबदबा निर्णायक रूप से टूट गया.
उत्तर और दक्षिण 24 परगना, इन दोनों जिलों में एएसडीडी कटौती का सबसे ज्यादा असर दिखा और कुल प्रभावित सीटों में लगभग एक-तिहाई सीटें यहीं थीं.
उत्तर 24 परगना में 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने 19 में से 18 सीटें जीतकर लगभग क्लीन स्वीप किया था. लेकिन 2026 में तस्वीर तेजी से बदली और भाजपा ने इनमें से 15 सीटों पर कब्जा कर लिया, जबकि तृणमूल कांग्रेस सिर्फ 4 सीटों पर सिमट गई.
इसी तरह दक्षिण 24 परगना में 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने सभी 16 प्रभावित सीटें जीती थीं. लेकिन पुनरीक्षण के बाद भाजपा ने गहरी सेंध लगाते हुए इनमें से 8 कड़े मुकाबले वाली सीटें अपने नाम कर लीं.
हावड़ा और हुगली में भी यही रुझान देखने को मिला. पिछली बार तृणमूल कांग्रेस ने हावड़ा की सभी 12 और हुगली की सभी 8 प्रभावित सीटें जीती थीं. 2026 में भाजपा ने हावड़ा में 6 सीटें जीत लीं, जबकि हुगली में 7 सीटों पर कब्जा कर लगभग पूरा जिला अपने पक्ष में कर लिया.
मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में भी तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका लगा. 2021 में उसने 10 में से 9 अत्यधिक प्रभावित सीटें जीती थीं, लेकिन 2026 में यह संख्या घटकर केवल 2 रह गई. यहां भाजपा ने 6 सीटें जीतीं, जबकि शेष 2 सीटें कांग्रेस को मिलीं.
शहरी इलाकों में भी इसका गहरा असर दिखा. पश्चिम बर्धमान में भाजपा ने प्रभावित सभी 6 सीटें जीत लीं, जिनमें से 5 सीटें पहले तृणमूल कांग्रेस के पास थीं. वहीं कोलकाता उत्तर में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के पिछले क्लीन स्वीप को तोड़ते हुए 4 सीटें अपने नाम कर लीं.
मुस्लिम बहुल सीटों पर यूए कटौती से भाजपा को बढ़त
‘यूए’ चिह्नित मतदाताओं को सूची से बाहर किए जाने का पैटर्न राजनीतिक रूप से कहीं अधिक संवेदनशील दिखाई देता है.
जैसा कि पहले द वायर ने रिपोर्ट किया था, 49 विधानसभा सीटों पर यूए श्रेणी में हटाए गए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी. एएसडीडी श्रेणी की तुलना में यहां राजनीतिक असर अपेक्षाकृत संतुलित दिखा. भाजपा ने ऐसी 26 सीटें जीतीं, तृणमूल कांग्रेस ने 21, जबकि कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं. हालांकि 2021 के नतीजों से तुलना करने पर इसका असर काफी गंभीर नजर आता है.
इन निर्वाचन क्षेत्रों में औसत मुस्लिम आबादी 33.69 प्रतिशत थी. मुर्शिदाबाद सबसे ज्यादा प्रभावित जिला रहा, जहां 8 सीटों पर यूए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी. इसके अलावा उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, पूर्व बर्दवान और हुगली भी प्रभावित जिलों में शामिल रहे.
ऐतिहासिक रूप से इन अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में तृणमूल कांग्रेस का लगभग पूर्ण वर्चस्व रहा था. 2021 में उसने ऐसी 49 में से 48 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा के पास केवल 1 सीट थी.

लेकिन 2026 के नतीजों ने इस पूरी तस्वीर को बदल दिया.
भाजपा ने इन 49 सीटों में से 26 पर जीत हासिल की, यानी उसे 25 सीटों का सीधा फायदा हुआ. वहीं तृणमूल कांग्रेस घटकर सिर्फ 21 सीटों पर रह गई और उसे कुल 27 सीटों का बड़ा नुकसान हुआ. कांग्रेस ने भी 2 सीटें जीत लीं.
कुल मिलाकर आंकड़े बताते हैं कि बेहद करीबी मुकाबलों वाली सीटों पर ‘यूए’ मतदाताओं की कटौती एक अहम कारक साबित हुई, जिसके चलते तृणमूल कांग्रेस अपने आधे से ज्यादा मजबूत गढ़ भाजपा से हार गई.
इसके कई उदाहरण सामने आए. समसेरगंज में यूए कटौती 74,775 थी, जबकि तृणमूल कांग्रेस की जीत का अंतर केवल 7,587 वोट था. रानीनगर में कांग्रेस 2,701 वोटों से जीती, लेकिन वहां यूए कटौती 17,140 थी. जंगीपुर में भाजपा 10,542 वोटों से जीती, जबकि यूए कटौती 36,581 थी. इस सीट पर मुस्लिम आबादी 51 प्रतिशत से अधिक है.
पूर्व बर्धमान की रैना सीट पर भाजपा 834 वोटों से जीती, लेकिन अयोग्य घोषित किए गए यूए मतदाताओं की संख्या 11,284 थी. यानी जीत के अंतर और हटाए गए मतदाताओं के बीच बहुत बड़ा फर्क था.
यदि यूए श्रेणी में ये कटौतियां नहीं हुई होतीं, तो पांच सीटों के नतीजे बदल सकते थे, चार सीटें भाजपा से तृणमूल कांग्रेस के खाते में जातीं, जबकि एक सीट कांग्रेस से तृणमूल कांग्रेस को मिल सकती थी.
यह कहना सही नहीं होगा कि 2021 के बाद राजनीतिक हालात बिल्कुल नहीं बदले, या हटाए गए सभी मतदाता एक ही दिशा में वोट देते. लेकिन जब इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाएं और जीत-हार बेहद मामूली अंतर से तय हो, तब यह देखना जरूरी हो जाता है कि एसआईआर प्रक्रिया ने किन लोगों को मतदान से बाहर किया.
नए मतदाताओं के जुड़ने से सीमित रूप में भाजपा को बढ़त
जहां मतदाता सूची से नाम हटने की प्रक्रिया करीबी मुकाबलों की बड़ी कहानी बनी, वहीं नए मतदाताओं के जुड़ने ने भी कुछ सीटों पर असर डाला, हालांकि इसका प्रभाव सीमित इलाकों तक केंद्रित रहा.
सिर्फ पांच सीटों, सतगछिया, राजारहाट न्यू टाउन, इंदस, रैना और मंदिरबाजार, पर अंतिम मतदाता सूची में जुड़े नए मतदाताओं की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी. यानी सैद्धांतिक रूप से ये नए वोट अंतिम नतीजे को प्रभावित कर सकते थे.
इन सीटों पर भाजपा सबसे बड़ी लाभार्थी रही और उसने 5 में से 4 सीटें जीतीं, जबकि तृणमूल कांग्रेस को 1 सीट मिली. इन क्षेत्रों में औसत अनुसूचित जाति आबादी 31.14 प्रतिशत थी, जिससे संकेत मिलता है कि नए मतदाताओं का असर मुख्यतः एससी बहुल या अर्ध-ग्रामीण सीटों पर दिखा.
दक्षिण 24 परगना की सतगछिया सीट पर जीत का अंतर केवल 401 वोट था, जबकि मतदाता सूची में 3,023 नए नाम जुड़े थे. 2021 में यही सीट तृणमूल कांग्रेस ने 23,318 वोटों से जीती थी.
इसी तरह राजारहाट न्यू टाउन में जीत का अंतर 316 वोट था, जबकि 2,543 नए मतदाता जुड़े. 2021 में यहां तृणमूल कांग्रेस 56,432 वोटों के बड़े अंतर से जीती थी.

अगर ऐसा न हुआ होता…
एसआईआर के वास्तविक असर और उसके राजनीतिक महत्व को समझने के लिए एक अहम काल्पनिक सवाल उठता है, अगर मतदाता सूची में इतने बड़े पैमाने पर यह पुनरीक्षण नहीं हुआ होता, तो 2026 का चुनावी परिदृश्य कैसा दिखता?
यह ठीक-ठीक बताना असंभव है कि जो नाम जोड़े गए या हटाए गए, उनमें से किसने किस उम्मीदवार को वोट दिया होता.
इसलिए यह विश्लेषण एक गणितीय परीक्षण की तरह है. इसमें एसआईआर के अधिकतम संभावित असर, यानी नए जुड़े मतदाता, एएसडीडी कटौती और यूए कटौती, को जोड़कर अंतिम जीत के अंतर से तुलना की गई है.
विश्लेषण मॉडल-1
पहले परिदृश्य में माना गया है कि जीतने वाले उम्मीदवार के खिलाफ सबसे खराब स्थिति बनी. यानी जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए, वे सभी दूसरे नंबर पर रहे उम्मीदवार को वोट देते, जबकि नए जुड़े सभी मतदाता विजेता को वोट देते.
अगर 2021 से 2026 के बीच बदलीं 137 सीटों को देखें, तो आंकड़े बताते हैं कि इनमें से 87 सीटों पर नतीजा सैद्धांतिक रूप से मतदाता सूची पुनरीक्षण से प्रभावित हो सकता था. यानी अगर एसआईआर नहीं हुआ होता, तो ये 87 सीटें शायद उन्हीं दलों के पास रहतीं, जिन्होंने उन्हें 2021 में जीता था.
इन 87 बेहद करीबी और गणितीय रूप से संवेदनशील सीटों पर 2021 में तृणमूल कांग्रेस जीती थी. लेकिन 2026 में भाजपा ने इनमें से 84 सीटों पर कब्जा कर लिया, जबकि कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं.
अगर एसआईआर नहीं हुआ होता, तो गणितीय संभावना यह बनती है कि तृणमूल कांग्रेस इन 87 सीटों को बचा सकती थी.
यदि ऐसा होता, तो विधानसभा की अंतिम तस्वीर काफी अलग दिखती और भाजपा की कुल बढ़त भी काफी कम हो सकती थी.
उदाहरण: जहां एसआईआर का असर बेहद बड़ा दिखा
यह समझने के लिए कि मतदाता सूची में बदलाव ने चुनावी मुकाबलों को कितना प्रभावित किया, उन सीटों को देखा जा सकता है जहां तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा विधायक भाजपा से हार गए. कई जगहों पर जोड़े गए और हटाए गए मतदाताओं की संख्या सिर्फ जीत के अंतर से थोड़ी ज्यादा नहीं थी, बल्कि उससे कई गुना अधिक थी.

हेमताबाद और कुशमंडी जैसी सीटों पर हटाए गए नाम जीत के अंतर से लगभग तीन गुना थे. सबसे उल्लेखनीय उदाहरण करंदीघी का है. यहां करीब 20 हजार वोटों की जीत सामान्य तौर पर स्पष्ट जनादेश मानी जाती, लेकिन मतदाता सूची से कुल 52,807 नाम हटाए गए थे.
यह मॉडल वास्तविक मतदान का दावा नहीं करता, बल्कि केवल संभावित असर को मापता है. फिर भी यह संकेत देता है कि मतदाता सूची में हुए बदलाव केवल प्रशासनिक प्रक्रिया भर नहीं थे, बल्कि इतने बड़े थे कि करीबी मुकाबलों वाली कई सीटों के अंतिम नतीजों को प्रभावित कर सकते थे.
विश्लेषण मॉडल-2
दूसरे परिदृश्य में ‘नो-एसआईआर काउंटरफैक्चुअल मॉडल’ इस्तेमाल किया गया. इसमें यह नहीं माना गया कि हटाए गए सभी मतदाता विजेता के खिलाफ वोट देते. इसके बजाय हर सीट पर 2021 विधानसभा चुनाव के मतदान पैटर्न को आधार बनाया गया.
यह मॉडल तीन चरणों में काम करता है.
पहला, यूए और एएसडीडी श्रेणी में हटाए गए सभी मतदाताओं को फिर से मतदाता सूची में जोड़ा गया.
दूसरा, इन बहाल मतदाताओं को 2021 के पार्टीवार वोट शेयर के अनुसार अलग-अलग दलों में बांटा गया. यानी माना गया कि हटाए गए मतदाता भी 2021 जैसा ही मतदान रुझान रखते.
तीसरा, एसआईआर के दौरान जो नए मतदाता जोड़े गए थे, उन्हें 2026 के वोट पैटर्न के हिसाब से समायोजित किया गया, ताकि नतीजों पर सिर्फ मतदाता सूची में कटौती और जोड़ने के असर को अलग करके देखा जा सके.

यह किसी मतदाता के वास्तविक व्यवहार का दावा नहीं है. यह सीट स्तर पर किया गया एक परीक्षण है, जिसका उद्देश्य यह देखना है कि क्या हटाए गए नामों की संख्या और उनका संभावित रुझान इतना असर डाल सकता था कि नतीजे बदल सकते थे.
इस काल्पनिक ‘नो-एसआईआर’ मॉडल के तहत 11 सीटों के नतीजे बदलते दिखते हैं, और सभी सीटें तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में जाती हैं. ऐसे में भाजपा की संख्या 207 से घटकर 198 हो जाती, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 से बढ़कर 91 पर पहुंचती. कांग्रेस की 2 सीटें घटकर शून्य हो जातीं. यह विश्लेषण 293 सीटों पर किया गया है, क्योंकि फलता सीट की मतगणना अभी बाकी है.
इन 11 सीटों में 9 सीटें भाजपा से तृणमूल कांग्रेस को जातीं, जबकि 2 सीटें कांग्रेस से तृणमूल कांग्रेस के खाते में आतीं. इनमें फरक्का, जंगीपुर, रानीनगर, राजारहाट न्यू टाउन, सतगछिया, टॉलीगंज, जोरासांको, काशीपुर-बेलगछिया, चंपदानी, जंगीपाड़ा और रैना शामिल हैं.
कुछ उदाहरण खास तौर पर ध्यान खींचते हैं. राजारहाट न्यू टाउन में भाजपा की 316 वोटों की बढ़त तृणमूल कांग्रेस की लगभग 14,959 वोटों की बढ़त में बदल जाती. टॉलीगंज में भाजपा की 6,013 वोटों की बढ़त तृणमूल कांग्रेस की 3,603 वोटों की बढ़त बन जाती. जंगीपुर में भाजपा की 10,542 वोटों की बढ़त तृणमूल कांग्रेस की 12,003 वोटों की बढ़त में बदल जाती.
तो निष्कर्ष क्या है?
एसआईआर ने चुनाव के कुल नतीजे को पूरी तरह नहीं पलटा; हमारे ‘नो-एसआईआर’ आकलन में भी भाजपा बढ़त में रहती. लेकिन करीबी मुकाबले वाली कई अहम सीटों पर इसका असर निर्णायक रहा हो सकता है.
आंकड़े संकेत देते हैं कि नाम कटने की प्रक्रिया, खासकर एएसडीडी श्रेणी की कटौतियों, से कम अंतर वाली सीटों पर भाजपा को अपेक्षाकृत लाभ मिला, जबकि यूए कटौतियों का असर अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में ज्यादा दिखाई दिया.
ऐसे राज्य में, जहां अनेक सीटों का फैसला बहुत कम अंतर से होता है, एसआईआर केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहा, बल्कि अपने सांख्यिकीय प्रभाव के कारण खुद एक चुनावी कारक बन गया.
Source: The Wire

