कांग्रेस सरकार के तीन साल — एक जन समीक्षा

कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र और बजट भाषणों में भाजपा का वास्तविक विकल्प बनने वाली सरकार देने का वादा किया था। विशेष रूप से सांप्रदायिक सौहार्द, विभाजनकारी ताकतों पर कार्रवाई, सामाजिक न्याय, जनकल्याण, गारंटी योजनाओं और जनहित विकास का भरोसा दिया गया था।

हालाँकि, पिछले तीन वर्षों में सिद्धरामैया सरकार से लोगों को जितनी उम्मीदें थीं, उससे कहीं अधिक निराशा और वादाखिलाफी देखने को मिली। आज मुख्यमंत्री सिद्धरामैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने अपने तीन वर्ष पूरे कर लिए हैं। इसी अवसर पर कांग्रेस ने तुमकुरु में ‘साधना समर्पण और संकल्प सम्मेलन’ का भव्य आयोजन किया।

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह कार्यक्रम सिद्धरामैया और डीके शिवकुमार जैसे दो शक्ति केंद्रों के बीच राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन था, या किसी नए शक्ति केंद्र के उभरने का संकेत? इसका जवाब वक्त के साथ सामने आएगा।

दूसरी ओर, कांग्रेस सरकार के तीन वर्षों को लेकर भाजपा की आलोचनाओं में भी जनता की वास्तविक चिंता और ईमानदारी कम दिखाई देती है। सत्ता के गलियारों में होने वाली ये बहसें अक्सर राजनीतिक हितों से प्रेरित होती हैं। ऐसे में असली सवाल यही है कि क्या पिछले तीन वर्षों में कांग्रेस सरकार ने कर्नाटक की जनता के जीवन में कोई वास्तविक बदलाव लाया?

2023 में जनता ने भाजपा सरकार की नीतियों से असंतुष्ट होकर कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत दिया था। कांग्रेस को भाजपा की तुलना में अधिक वोट और अधिक सीटें मिलीं। जनता को उम्मीद थी कि कांग्रेस, भाजपा का वास्तविक विकल्प साबित होगी।

लेकिन तीन साल बाद भी कई अहम मुद्दों पर सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी उतरती दिखाई नहीं देती।

सांप्रदायिक सौहार्द नहीं, नरम हिंदुत्व?

कांग्रेस ने सत्ता में आने से पहले बजरंग दल पर प्रतिबंध की समीक्षा करने की बात कही थी। लेकिन सरकार बनने के बाद इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

इसी तरह बाबाबुडन दरगाह, गौहत्या कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून और हिजाब जैसे मुद्दों पर भी सरकार का रुख लगातार सवालों के घेरे में रहा।

आलोचकों का कहना है कि सरकार न्याय और सिद्धांतों की राजनीति के बजाय राजनीतिक समीकरणों और वोट बैंक को ध्यान में रखकर फैसले ले रही है।

सामाजिक न्याय या सामाजिक अन्याय?

आंतरिक आरक्षण लागू करने में देरी और उसके क्रियान्वयन को लेकर उठे विवादों ने सरकार की सामाजिक न्याय नीति पर सवाल खड़े किए हैं।

दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़े वर्गों से जुड़े कई मुद्दों पर भी सरकार की कार्यशैली आलोचना का विषय बनी रही है।

कांग्रेस सरकार या बुलडोज़र मॉडल?

गरीबों की झुग्गियां हटाने, अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई और भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों पर भी सरकार की आलोचना हुई है।

आलोचकों का मानना है कि विकास के नाम पर गरीबों और कमजोर वर्गों के हित प्रभावित हुए हैं।

निष्कर्ष

इसका अर्थ यह नहीं कि भाजपा बेहतर विकल्प है। भाजपा और कांग्रेस दोनों की नीतियों पर अलग-अलग सवाल उठते रहे हैं।

लेकिन यह स्पष्ट है कि केवल सरकार बदलने से जनता की समस्याएं समाप्त नहीं होतीं। लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक न्याय के मूल्यों को मजबूत करने के लिए जनता की सक्रिय भागीदारी और मजबूत जनआंदोलन आवश्यक हैं।

Source: Vartha Bharathi (Translated In Hindi)