नौजवानों की आलोचनात्मक सोच और सवाल करने की रवायत ने छेड़ी नई बहस

सियासी ब्रांडिंग के जवाब में तंज़, तनक़ीद और नई मज़ाहमती आवाज़ का उभार

कुछ हद तक यह खुशआइंद बात है कि अब मुल्क के नौजवान अच्छे और बुरे में फर्क महसूस करने लगे हैं। तभी तो अपने ऊपर ‘कॉकरोच’ का लेबल लगाए जाने के बाद उन्होंने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बना ली और हुकूमत से उसकी कोताहियों और कारगुज़ारियों पर सवाल करने शुरू कर दिए।

मुल्क के तालीमी निज़ाम, खास तौर पर दाखिला जाती इम्तिहानों (NEET) में हो रही बे-कायदगियों के खिलाफ नौजवानों ने ज़ोरदार एहतिजाज किया। ऐसा लगता है कि इम्तिहान कराने वाली कौमी संस्था NTA में कोताहियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। अब UGC-NET के तीन पेपरों का इम्तिहान भी मुल्तवी कर दिया गया है और ये इम्तिहान दोबारा होंगे।

अंग्रेज़ी, सोशियोलॉजी और कॉमर्स जैसे मज़ामीन में डिग्री कॉलेजों में पढ़ाने के लिए अहल असातिज़ा की क़ाबिलियत तय करने वाले इम्तिहान के सवालिया परचों में बे-तरतीबी के चलते इम्तिहान मुल्तवी किए गए। ऐसा महसूस होता है कि गैर-जिम्मेदारी और लापरवाही मरकज़ी तालीमी इदारों की खास पहचान बनती जा रही है।

बहरहाल, हालिया जश्न-ए-आज़ादी से पहले ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने मुल्क के नौजवानों से अपील की थी कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल करें कि उनकी हुकूमत नौजवानों के लिए कौन-से खास मंसूबे अपनाने वाली है। साथ ही यह भी मांग की गई थी कि प्रधानमंत्री लाल किले की फसील से अपने खिताब में इसका ऐलान मुल्क के सामने करें।

हुआ भी यही। अपनी करीब 75 मिनट की तकरीर में प्रधानमंत्री मोदी ने मुल्क के नौजवानों को रिझाने की भरपूर कोशिश की। उन्होंने नौजवानों को मुल्क की तरक्की की ताकत करार दिया। अपनी तकरीर के दौरान मोदी ने 52 बार नौजवानों का ज़िक्र किया। इनमें 20 बार ‘युवा’, 22 बार ‘नौजवान’ और 10 बार ‘साथियों’ के जरिए नौजवानों को मुखातिब किया गया।

यानी अपनी तकरीर के दौरान लगभग हर डेढ़ मिनट में प्रधानमंत्री ने नौजवानों का ज़िक्र किया और उनसे सीधे खिताब करने की कोशिश की।

लेकिन पूरे मुल्क में एक करोड़ नौजवानों को AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तर्बियत देने और खास तौर पर औसत तथा गरीब घरों के तालिबइल्मों को प्रतियोगी इम्तिहानों की तैयारी के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग देने के ऐलान के अलावा कोई बड़ा खास मंसूबा सामने नहीं आया।

पहली बार प्रधानमंत्री ने अपनी तकरीर में नौजवानों को इस शिद्दत के साथ याद किया कि ऐसा तास्सुर पैदा हो कि वह नौजवानों के करीब हैं, उनके हामी हैं और उनके हमख़याल हैं।

हर साल लाल किले की फसील से मुल्क की तरक्की और तामीर में नौजवानों से जुड़ी उम्मीदों का ज़िक्र प्रधानमंत्री करते रहे हैं। 2014 में अपनी पहली स्वतंत्रता दिवस तकरीर में मोदी ने 16 बार नौजवानों का ज़िक्र किया था। 2015-16 की तकरीरों में 10 बार, 2021 में 9 बार, 2022 में 8 बार, 2023 में 21 बार, 2024 में 27 बार और 2025 की तकरीर में 27 बार उन्होंने नौजवानों का ज़िक्र किया था।

लेकिन इस बार 52 बार नौजवानों का ज़िक्र इस बात की तरफ इशारा करता है कि सरकार से जवाब-तलब करने की जो मुहिम इन दिनों नौजवानों के बीच ज़ोर पकड़ रही है, उससे सरकार भी वाकिफ है और शायद इसी वजह से प्रधानमंत्री ने अपनी तकरीर में बार-बार नौजवानों का ज़िक्र किया।

मगर बेरोज़गारी, बदउनवानी, इम्तिहान के निज़ाम में बे-कायदगियों की इस्लाह, छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई और यूनिवर्सिटियों में जात-पात के तफरके जैसे अहम मसलों पर प्रधानमंत्री खामोश ही रहे।

‘वैचारिक नक्सल’ की नई सियासी ब्रांडिंग

मोदी अपने हामी और भक्तों को खुश करने के लिए हमेशा से यह तास्सुर देते आए हैं कि ‘वह हैं तो भारत है, सब कुछ है; वह नहीं तो कुछ भी नहीं।’ इसी तरह इस बार स्वतंत्रता दिवस के अपने खिताब में उन्होंने कुछ ऐसे जुमले इस्तेमाल किए जिनसे सियासी माहौल को अपने हक़ में करने की कोशिश महसूस हुई।

मोदी ने कहा कि हथियारों के जरिए हालात बिगाड़ने वाले मुसल्लह नक्सलवाद का अब खात्मा हो चुका है। लेकिन अब वैचारिक इंतिहापसंदी के बारे में उन्होंने ‘वैचारिक नक्सल’ यानी Intellectual Naxal की नई इस्तिलाह इस्तेमाल की।

उन्होंने कहा कि समाज को गलत रास्ते पर ले जाने के लिए इस तरह के लोग तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। ऐसे ‘वैचारिक नक्सल’ मौके की तलाश में हैं। इन्हें पहचानना होगा और इन्हें अलग-थलग करना होगा।

जैसे ही प्रधानमंत्री की तकरीर में इस नई इस्तिलाह का ज़िक्र हुआ, सोशल मीडिया पर एक नई पार्टी ‘दिमागी नक्सल जनता पार्टी’ (DNJP) के क़याम का ऐलान सामने आ गया।

देखते ही देखते बड़ी तादाद में लोगों ने इसका समर्थन किया और सोशल मीडिया पर इस नई सियासी तंज़िया पहल का खैरमकदम किया जाने लगा।

अब प्रधानमंत्री के ‘वैचारिक नक्सल’ वाले बयान और इस नई इस्तिलाह की मीडिया तथा सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है। सियासी अपोज़िशन पार्टियों ने भी इस बयान को लेकर प्रधानमंत्री पर ज़ोरदार तनक़ीद की है।

इस बीच मोदी कैबिनेट में वज़ीर किरेन रिजिजू ने इसकी वज़ाहत करते हुए कहा कि यह इस्तिलाह अपोज़िशन के लिए नहीं, बल्कि उन माओवादी लोगों के लिए है जो मुल्क के संविधान की पैरवी नहीं करते।

लेकिन वज़ाहत चाहे जो दी गई हो, अब यह तास्सुर आम होता जा रहा है कि मोदी सरकार अपने मुखालिफ़ीन के लिए अलग-अलग दौर में अलग-अलग सियासी ब्रांडिंग करती रही है।

‘अवार्ड वापसी गैंग’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘आंदोलनजीवी’ के बाद अब मुखालिफ़त और इख्तिलाफ़ की नई ब्रांडिंग के तौर पर ‘वैचारिक नक्सल’ की इस्तिलाह सामने आई है।

नौजवानों ने तंज़ को बनाया जवाब

इस नई ब्रांडिंग का जवाब नौजवानों ने भी तंज़ और मज़ाहिया अंदाज़ में देना शुरू कर दिया है।

नौजवानों का कहना है कि अगर हुकूमत से सवाल करना, आलोचनात्मक सोच रखना और अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाना ‘दिमागी’ होने की निशानी है, तो उन्हें अपने दिमाग और अपनी सोच का इस्तेमाल करने पर कोई शर्म नहीं।

DNJP ने अपने बानी के नाम की जगह ‘एक दिमागी नक्सली भारतीय’ लिखा है, जबकि सह-बानी के तौर पर ‘56 इंच सीना’ लिखकर एक मानीखेज़ सियासी तंज़ किया गया है।

इस पार्टी ने अपना मकसद बताते हुए कहा है कि वह तनक़ीदी सोच के साथ लोकतंत्र में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में कोशिश करेगी।

यानी मोदी ने जिस मकसद से ‘वैचारिक नक्सल’ जैसी नई इस्तिलाह का इस्तेमाल किया, वही इस्तिलाह अब पलटकर उनके खिलाफ सियासी तंज़ का हथियार बनती दिखाई दे रही है।

एक नई पार्टी ने यह भी बताने की कोशिश की है कि अब सिर्फ कहने वाले ही नहीं, बल्कि सुनने वाले भी कमाल करना जानते हैं।

इन तमाम तब्दीलियों को देखते हुए ऐसा महसूस होता है कि पहले सहने, खामोश रहने और सिसकने की जो आदत थी, वह अब हिम्मत, साबित-क़दमी और नए एतमाद में बदलने लगी है।

मुल्क के नौजवान अब अपने सियासी इस्तेमाल को समझने लगे हैं। चुनावी फायदे के लिए जिन नौजवानों को लंबे समय तक इस्तेमाल किया गया, वही नौजवान अब अपने हक़, इंसाफ़, रोज़गार और बेहतर तालीम के लिए हुकूमत से सवाल कर रहे हैं।

‘दिमागी नक्सल’ जैसी जुमलेबाज़ी प्रधानमंत्री के ओहदे की गरिमा और उसके गैर-जानिबदार किरदार के मुताबिक नहीं लगती। प्रधानमंत्री के इस बयान से ऐसा तास्सुर पैदा हुआ कि वह पूरे मुल्क के प्रधानमंत्री के बजाय किसी एक सियासी पार्टी के सरबराह की तरह अपने मुखालिफ़ीन को मुखातिब कर रहे हैं।

और शायद यही वजह है कि जिस ‘ब्रांडिंग’ के जरिए असहमति की आवाज़ को दबाने की कोशिश की गई, उसी ब्रांडिंग ने नौजवानों को एक नया तंज़िया प्लेटफॉर्म दे दिया—‘दिमाग है, इसलिए सवाल है।’

लेखक : मोहम्मद आज़म शाहिदؔ, बेंगलुरु

Source: Haqeeqat Times