दलितों को RSS का मुद्दा क्यों नहीं होना चाहिए?
RSS के पंजीकरण और उसके चंदों के हिसाब-किताब को लेकर देशभर में बहस छिड़ी हुई है। कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे द्वारा RSS की कानूनी स्थिति और वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठाए जाने के बाद यह मुद्दा और गरमा गया है।
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “हिंदू धर्म भी रजिस्टर्ड नहीं है, और कई दूसरी चीजें भी रजिस्टर्ड नहीं हैं।” आलोचकों का कहना है कि यह मूल सवाल का सीधा जवाब नहीं है।
इसी बीच भाजपा सांसद रमेश जिगजिनगी ने प्रियंक खरगे से सवाल किया कि “दलित आदमी को RSS के मामले से क्या लेना-देना?” उन्होंने RSS का बचाव करते हुए कहा कि संगठन के खिलाफ जाने वालों का इतिहास अच्छा नहीं रहा और RSS के कामकाज के बारे में जनता खुद जवाब दे सकती है।
दूसरी ओर, यह तर्क दिया जा रहा है कि प्रियंक खरगे ने यह सवाल एक दलित नेता के तौर पर नहीं बल्कि राज्य के गृह मंत्री के रूप में उठाया है। चूंकि RSS राज्य में नियमित रूप से बैठकें और बड़े कार्यक्रम आयोजित करता है, इसलिए सरकार के लिए यह जानना जरूरी है कि संगठन विधिवत पंजीकृत है या नहीं तथा उसके वित्तीय लेन-देन और चंदों का रिकॉर्ड कानून के मुताबिक उपलब्ध है या नहीं।
आलोचकों के अनुसार यदि कोई बड़ा संगठन देश के कानून के तहत पंजीकृत नहीं है और अपने वित्तीय दस्तावेज सार्वजनिक नहीं करता, तो उसकी जांच होना स्वाभाविक है। इसलिए यह मुद्दा किसी जाति या धर्म का नहीं, बल्कि संविधान और कानून व्यवस्था का है।
बहस में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि “दलितों को RSS के मुद्दे से क्या लेना-देना?” के बजाय पूछा जाना चाहिए कि “दलितों को RSS के मुद्दे से दूर क्यों रखा जाए?” क्योंकि संविधान, समानता और अधिकारों से जुड़े प्रश्न हर नागरिक से संबंधित हैं।
विवाद के केंद्र में यही मांग है कि यदि RSS खुद को राष्ट्रहित में काम करने वाला संगठन बताता है, तो उसे अपने संगठन का विधिवत पंजीकरण कराना चाहिए और अपने वित्तीय स्रोतों व चंदों का विवरण सार्वजनिक कर पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
Source: Vartha Bharathi

