जम्हूरियत, एहतिजाज और शहरीयत के दरमियान हिंदुस्तान का नया इम्तिहान
अदालत, दस्तूर और इख्तियार की सियासत किस सिम्त बढ़ रही है?
हिंदुस्तान इस वक्त एक ऐसे सियासी दोराहे पर खड़ा है, जहाँ अदालतों के फैसले, रियासती इख्तियार, शहरी आज़ादी और इंतिखाबी ताकत—सब एक ही बड़े सवाल के मुख्तलिफ रुख बन गए हैं। एक तरफ हुकूमत के खिलाफ एहतिजाज को जुर्म बनाने की कोशिशों पर अदालत रोक लगाती है, दूसरी तरफ शहरीयत के मामलों में सख्त कानूनी पैमाने आम शहरी के लिए कड़ी आज़माइश बन जाते हैं, और तीसरी तरफ इख्तिदार के मरकज़ पर मुकम्मल पकड़ की सियासी हिकमत-ए-अमली बहस का मरकज़ बनी हुई है। यही वह मंज़रनामा है जिसमें आज की हिंदुस्तानी सियासत को समझना ज़रूरी हो गया है।
बज़ाहिर ये तीन अलग-अलग कहानियाँ हैं, मगर हक़ीक़त में ये एक ही कड़ी के हिस्से हैं। एहतिजाज करने वाले शहरी, अपनी शहरीयत साबित करने में उलझे हुए लोग, और पार्लियामानी अक्सरियत के ज़रिए निज़ाम-ए-सियासत पर असरअंदाज़ होने वाली जमात—ये सब उसी जम्हूरी तनाज़े का हिस्सा हैं, जिसमें सवाल ये नहीं कि रियासत कितनी मज़बूत है, बल्कि ये है कि उसकी मज़बूती शहरी हुकूक को कितना तहफ़्फुज़ देती है।
बॉम्बे हाई कोर्ट का हालिया फैसला इस बहस में एक अहम संग-ए-मील बनकर सामने आया है। अदालत ने वाज़ेह किया कि हुकूमत की पॉलिसियों के खिलाफ एहतिजाज मुनज्ज़म करना किसी शहरी को शहर-बदर करने की बुनियाद नहीं बन सकता। ये महज़ कानूनी नुक्ता नहीं, बल्कि जम्हूरी उसूल की वाज़ेह तस्दीक है। अदालत ने इस तरह के इंतिज़ामी कदम को उस वक्त नामंज़ूर करार दिया, जब पुलिस के पास इस बात का कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं था कि मुताल्लिक़ा शख्स की सरगर्मियों से अवामी अम्न-ओ-अमान, जान-ओ-माल या पब्लिक ऑर्डर को हक़ीक़ी खतरा था।
ये फैसला दरअसल उस रवैये पर सवाल उठाता है, जिसमें सियासी इख्तिलाफ को इंतिज़ामी खतरे के तौर पर पेश किया जाता है। एहतिजाज, धरना, रैली और नारेबाज़ी अगर पुरअमन दायरे में हों, तो वे जम्हूरी समाज का हक़ हैं, जुर्म नहीं। अदालत ने ये भी याद दिलाया कि शहरीयों को हुकूमत की मर्ज़ी का ताबेदार नहीं बनाया जा सकता और न ही रियासती ताकत का इस्तेमाल इख्तिलाफ-ए-राय दबाने के लिए किया जा सकता है।
ये बात खास तौर पर अहम है कि इस फैसले में सिर्फ एक एक्सटर्नमेंट ऑर्डर खत्म नहीं हुआ, बल्कि एक वसीअ दस्तूरी उसूल को दोबारा ज़िंदा किया गया—यानी हुकूमत से इख्तिलाफ रखने वाला शख्स दुश्मन नहीं होता। अगर रियासत हर एहतिजाज को खतरा समझने लगे, तो फिर शहरी आज़ादी महज़ किताबी जुमला बनकर रह जाएगी।
दूसरी तरफ असम का शहरीयत मामला हिंदुस्तान की एक और पेचीदा हक़ीक़त को सामने लाता है। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि सिर्फ दस्तावेज़ों की कस्रत किसी शख्स की भारतीय शहरीयत साबित नहीं करती। दरख्वास्तगुज़ार ने इंतिखाबी फेहरिस्त, ज़मीन की रजिस्ट्री, पैन कार्ड, वोटर आईडी और 1951 की एनआरसी की नक़ल समेत कई दस्तावेज़ पेश किए थे, मगर अदालत के मुताबिक ये तमाम रिकॉर्ड कानूनी तौर पर इतने मज़बूत और मुतसल्सिल नहीं थे कि शहरीयत का दावा साबित कर सकें।
यहाँ असल मसला सिर्फ एक शख्स का नहीं, बल्कि पूरे निज़ाम का है। जब शहरीयत साबित करने की पूरी ज़िम्मेदारी फर्द पर डाल दी जाती है, तो मामला सिर्फ कानूनी नहीं रहता, बल्कि समाजी और इंसानी भी बन जाता है। एक आम शहरी के लिए पुराने रिकॉर्ड जुटाना, उनकी तस्दीक कराना और अपने आबा-ओ-अजदाद से रिश्ता साबित करना आसान नहीं होता। खास तौर पर उन इलाकों में जहाँ तारीख, हिजरत और दस्तावेज़ी रिकॉर्ड हमेशा गैर-वाज़ेह रहे हों, वहाँ ये सवाल और भी हस्सास बन जाता है।
अदालत का मौक़िफ अपनी जगह कानूनी तौर पर मज़बूत हो सकता है, मगर इस फैसले ने एक बड़ा समाजी सवाल भी खड़ा किया है—क्या शहरीयत का इम्तिहान सिर्फ दस्तावेज़ों की तादाद से तय होना चाहिए, या उसमें इंसानी हक़ीक़त, तारीखी पस-ए-मंज़र और अमली रुकावटों को भी देखा जाना चाहिए? यही वह मुकाम है जहाँ कानून और ज़िंदगी आमने-सामने आ जाते हैं।
एहतिजाज और शहरीयत, दोनों अलग मसले होते हुए भी एक ही सियासी फिज़ा में एक-दूसरे को मुतास्सिर करते हैं। अगर एहतिजाज करने वालों को रियासती सख्ती का सामना करना पड़े और शहरीयत के मामले में आम शहरी लगातार सबूत देने के दबाव में रहे, तो समाज में गैर-महफूज़ी का एहसास बढ़ने लगता है। एक तरफ आवाज़ उठाने वाले को निज़ाम-ओ-नसक के नाम पर दबाया जाता है, दूसरी तरफ अपनी पहचान साबित करने वाला खुद को मुश्तबा महसूस करता है।
यही वजह है कि ये दोनों मामले सिर्फ अदालतों तक महदूद नहीं रहते, बल्कि अवामी शऊर, सियासी ज़बान और रियासती रवैये में भी इनके असरात दिखाई देते हैं। जब किसी मुल्क में एहतिजाज को मुश्तबा और शहरीयत को मशरूत बना दिया जाए, तो वहाँ जम्हूरियत का बुनियादी मिज़ाज बदलने लगता है।
अब इस तस्वीर में तीसरा और शायद सबसे वसीअ पहलू शामिल होता है—”मोदी मिशन 360″ जैसी सियासी सोच। अगरचे ये कोई सरकारी एलानशुदा प्रोग्राम नहीं, लेकिन सियासी मुबस्सिरीन इसे हुक्मरान जमात की उस हिकमत-ए-अमली से जोड़ते हैं, जिसका मकसद पार्लियामेंट के दोनों सदनों में ऐसी अक्सरियत हासिल करना है, जो सिर्फ हुकूमत चलाने के लिए नहीं, बल्कि मुस्तकबिल के बड़े सियासी और दस्तूरी फैसलों के लिए भी काफी हो।
ये सोच बज़ाहिर जम्हूरी है, क्योंकि जम्हूरियत में अक्सरियत हासिल करना जुर्म नहीं। मगर सवाल तब पैदा होता है, जब ये अक्सरियत सिर्फ इंतिखाबी जीत तक महदूद न रहकर, कानूनसाज़ी, दस्तूरी तब्दीलियों, रियासती पॉलिसी और इदारा जाती ढाँचे पर फैसला-कुन असर कायम करने की कोशिश बने। यही वह जगह है जहाँ “मिशन” और “गलबा” के दरमियान की लकीर बेहद बारीक हो जाती है।
अगर एक जमात पार्लियामानी सतह पर बहुत ज़्यादा ताकत हासिल कर ले, तो वह कानूनसाज़ी, दस्तूरी तरमीम, रियासती पॉलिसी और वफ़ाकी तवाज़ुन—सब पर असरअंदाज़ हो सकती है। इसलिए “मोदी मिशन 360” को सिर्फ इंतिखाबी इस्तिलाह समझना काफी नहीं। इसे उस वसीअ सियासी रवैये के तौर पर देखना चाहिए, जिसमें इख्तिदार को ज़्यादा से ज़्यादा मरकज़ियत देने की कोशिश शामिल हो सकती है।
हिंदुस्तानी सियासत में इनहिराफ कोई नई बात नहीं। पार्टी बदलना, इत्तिहाद तोड़ना या नए सियासी धड़ों में शामिल होना आज़ादी के बाद से जारी है। मगर पिछले कुछ बरसों में ये रवैया इस हद तक बढ़ा है कि अवामी मैंडेट और सियासी वफ़ादारी के दरमियान का फर्क अक्सर धुंधला पड़ जाता है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और दूसरी रियासतों के तजुर्बात ने दिखाया कि असेंबली या पार्लियामेंट की अददी अक्सरियत हमेशा अवामी एतमाद का मुकम्मल अक्स नहीं होती।
ये सूरत-ए-हाल अपोज़िशन को भी कमज़ोर करती है। अगर अपोज़िशन के अंदर नज़रियााती वहदत न हो, क़ियादत बंटी हुई हो और इलाकाई मफाद क़ौमी हिकमत-ए-अमली पर हावी हो जाएँ, तो हुक्मरान जमात के लिए अपनी ताकत बढ़ाना और आसान हो जाता है। इसी खालीपन में “मिशन 360” जैसी हिकमत-ए-अमली ज़्यादा असरदार दिखाई देती है।
असल सवाल ये है कि क्या अपोज़िशन सिर्फ रद्द-ए-अमल तक महदूद रहेगी या वह एक मुतबादिल जम्हूरी बयानिया भी पेश करेगी? अगर जवाब सिर्फ रद्द-ए-अमल में रहा, तो इख्तिदार की यकतरफा मरकज़ियत और मज़बूत हो सकती है।
इन सबके बीच अदलिया एक ऐसे स्तंभ की तरह नज़र आती है, जो कभी शहरी आज़ादी को सहारा देती है और कभी शहरीयत के कानूनी पैमानों को वाज़ेह करती है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने एहतिजाज के हक़ में एक साफ़ लकीर खींची, जबकि गुवाहाटी हाई कोर्ट ने शहरीयत के सबूत के लिए कानूनी सख्ती को बरकरार रखा। दोनों फैसले मिलकर बताते हैं कि हिंदुस्तानी अदलिया एक ही वक्त में रियासती इख्तियार को हदों में भी रखना चाहती है और कानूनी तकाज़ों को मज़बूत भी।
मगर सवाल ये भी है कि क्या इदारों की ये तवाज़ुन कायम रखने वाली हैसियत मुस्तकबिल में बरकरार रह सकेगी? अगर सियासी ताकत और ज़्यादा मरकज़ियत इख्तियार करती है, तो इदारों पर दबाव बढ़ सकता है। अगर इदारे कमज़ोर हुए, तो शहरी आज़ादी, शहरीयत के उसूल और सियासी मुकाबला—सब मुतास्सिर होंगे।
इसी वजह से मौजूदा हिंदुस्तानी फिज़ा को सिर्फ एक इंतिखाबी मौसम समझना गलत होगा। ये दरअसल इदारों, बयानियों, पहचानों और हुकूक के दरमियान एक तवील कश्मकश का दौर है।
इस पूरी बहस में सबसे अहम फरीक आम शहरी है। वही एहतिजाज भी करता है, वही अपनी शहरीयत भी साबित करता है और वही वोट देकर इख्तिदार की सिम्त भी तय करता है। मगर अक्सर वही शहरी खुद को इस निज़ाम में सबसे कम महफूज़ महसूस करता है। कभी उसे बताया जाता है कि उसका एहतिजाज अम्न-ओ-अमान के लिए खतरा है, कभी उससे कहा जाता है कि अपने वजूद का सबूत दो, और कभी उससे उम्मीद की जाती है कि वह सियासी ताकत के इर्तिकाज़ को जम्हूरी कामयाबी माने।
जम्हूरियत की असली ताकत उसी वक्त बरकरार रहती है, जब शहरी सिर्फ वोटर न हो, बल्कि एक बाक़ायदा इख्तियार रखने वाला शहरी भी हो। अगर शहरी सवाल न कर सके, अपने हक़ का दिफ़ा न कर सके या अपनी पहचान साबित करने में ही उलझा रहे, तो जम्हूरी निज़ाम की अंदरूनी ताकत कमज़ोर हो जाती है।
मुस्तकबिल का हिंदुस्तान इसी बात पर मुनहसिर होगा कि वह इख्तिलाफ को कैसे देखता है, शहरीयत को किस इंसाफ के साथ परखता है और अक्सरियत को किस हद तक ज़िम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करता है। अगर एहतिजाज को जम्हूरी अमल का हिस्सा माना जाए, शहरीयत के मामलों में शफ़्फ़ाफ और इंसानी तरीका अपनाया जाए और पार्लियामानी अक्सरियत को इदारा जाती तवाज़ुन के साथ जोड़ा जाए, तो जम्हूरियत मज़बूत हो सकती है।
लेकिन अगर इख्तिलाफ को दबाने, पहचान को मुश्तबा बनाने और इख्तिदार को मुकम्मल मरकज़ियत देने का रवैया ग़ालिब रहा, तो जम्हूरी इदारे अपनी मान्यता खो सकते हैं। इसलिए आज का हिंदुस्तान सिर्फ सियासी कामयाबियों या अदालती फैसलों का मजमुआ नहीं, बल्कि एक ऐसे सवालनामे की शक्ल इख्तियार कर चुका है, जिसके हर सवाल के जवाब में मुस्तकबिल की सिम्त छुपी हुई है।
मौजूदा हिंदुस्तानी सूरत-ए-हाल को अगर एक जुमले में समेटा जाए, तो कहा जा सकता है कि ये दौर दस्तूरी उसूलों, रियासती इख्तियार और अवामी हक़ के दरमियान एक मुसलसल आज़माइश का ज़माना है। बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला बताता है कि एहतिजाज को जुर्म नहीं बनाया जा सकता, गुवाहाटी हाई कोर्ट का फैसला याद दिलाता है कि शहरीयत का सबूत आसान नहीं, और “मोदी मिशन 360” की बहस ज़ाहिर करती है कि इख्तिदार की सियासत अब महज़ हुकूमतसाज़ी तक महदूद नहीं रही।
यही तीनों अनासिर मिलकर आज के हिंदुस्तान की असल सियासी कहानी बनाते हैं। एक ऐसी कहानी, जिसमें अदालतें हदें याद दिला रही हैं, रियासत सख्तियाँ आज़मा रही है और सियासी ताकतें मुस्तकबिल पर मुकम्मल पकड़ की राहें तलाश कर रही हैं। इस कहानी का आख़िरी बाब अब भी लिखा जा रहा है, और उसे शहरी शऊर, इदारा जाती मज़बूती और जम्हूरी तवाज़ुन ही बेहतर सिम्त दे सकते हैं।
अज़: जावेद जमालुद्दीन
Source: Haqeeqat Times

