इल्म इंसान को बड़ा बनाए तो कमाल है, लेकिन अगर उसे मगरूर बना दे तो यही इल्म ज़वाल का सबब बन जाता है।
इल्म इंसान को सिर्फ यह नहीं बताता कि दुनिया में क्या है, बल्कि यह भी सिखाता है कि अभी कितना कुछ ऐसा है जिसे हम नहीं जानते। शायद इसी वजह से इल्म की असली ज़ीनत गुरूर नहीं, बल्कि तवाज़ो यानी विनम्रता है और इंसानियत की असली पहचान सिर्फ अल्फाज़ नहीं, बल्कि दर्द-ए-दिल और इंसानी हमदर्दी है।
इल्म एक बेकरां समंदर की तरह है। इसका न कोई आखिरी किनारा है और न कोई ऐसी मंज़िल, जहां पहुंचकर इंसान यह कह सके कि अब जानने के लिए कुछ बाकी नहीं। वक्त के साथ तजुर्बा बढ़ता है, मुतालआ का दायरा वसीअ होता है और सोच में पुख्तगी आती है। लेकिन एक सच्चे साहिब-ए-इल्म के अंदर अपनी कम-मायगी और अपनी सीमाओं का एहसास भी बढ़ता जाता है। वह जितना ज्यादा जानता है, उतना ही महसूस करता है कि उसके इल्म की हदें कितनी छोटी हैं।
लेकिन अफसोस, कभी-कभी कुछ किताबें, कुछ लेख, थोड़ी-सी तारीफ और थोड़ी-सी शोहरत इंसान के अंदर हुरूफ का गुरूर पैदा कर देती है। फिर उसे अपनी राय, अपनी तहरीर और अपने इल्म के बाहर की हर बात कमतर दिखाई देने लगती है। वह भूल जाता है कि इख्तिलाफ-ए-राय हमेशा जहालत की निशानी नहीं होता, बल्कि जिंदा और आज़ाद सोच की पहचान भी हो सकता है।
तहरीर का मकसद असर हो, गुरूर नहीं
तहरीर का मकसद असर पैदा करना जरूर है, लेकिन असर और गुरूर के बीच बहुत मामूली-सा फासला होता है। जब लगातार तारीफ मिलने लगे तो इंसान को अपने अंदर झांकते रहना चाहिए। उसे खुद से पूछना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन हुरूफ के जरिए वह दूसरों के दिलों को रोशन करने की कोशिश कर रहा है, वही हुरूफ उसके अपने दिल की खिड़कियां बंद कर रहे हैं?
अगर इल्म इंसान को नरमदिल नहीं बनाता तो वह सिर्फ मालूमात का बोझ है। अगर तहरीर दिल में दर्द और इंसानी हमदर्दी पैदा नहीं करती तो वह सिर्फ अल्फाज़ की सजावट है। और अगर मजहब इंसान को दूसरे इंसान की इज्जत करना नहीं सिखाता तो उसकी रूह का कोई अहम हिस्सा हमसे ओझल हो गया है।
कानून और निज़ाम हैं, लेकिन इंसान कहां है?
हमारी दुनिया में कानून कम नहीं हैं, संस्थाएं कम नहीं हैं, रिसर्च कम नहीं है और तालीम की भी कमी नहीं है। इसके बावजूद समस्याएं आज भी मौजूद हैं।
कत्ल रोकने के लिए कानून हैं, सजाएं हैं और अदालतें हैं, फिर भी कत्ल होते हैं। करप्शन रोकने के लिए संस्थाएं हैं, निगरानी है और नियम-कायदे हैं, फिर भी बदعنوانी खत्म नहीं हुई। सड़कें पहले से बेहतर हैं, गाड़ियां पहले से ज्यादा सुरक्षित हैं, लेकिन कई जगह हादसों में कमी के बजाय इजाफा देखने को मिलता है।
इसका मतलब यह नहीं कि कानून, संस्थाएं या तालीम बेकार हैं। असली सवाल यह है कि इन सबके बावजूद इंसान खुद कहां खड़ा है?
हमने सिस्टम तो बना लिए, लेकिन क्या हमने इंसान भी बनाया?
हम मजहब के नाम पर फख्र करते हैं, अपनी तहज़ीब को अज़ीम कहते हैं, अपनी सरज़मीन को मुकद्दस मानते हैं और अपनी जम्हूरियत को दुनिया की बड़ी जम्हूरियत कहते हैं। ये सब बातें अपनी जगह काबिल-ए-एहतराम हैं। लेकिन किसी भी तहज़ीब की असली महानता उसके नारों में नहीं, बल्कि उसके इंसानों के रवैये में दिखाई देती है।
अगर इबादतगाहें आबाद हों लेकिन दिल वीरान हों, अगर ज़बान पर अमन हो लेकिन हाथ ज़ुल्म के लिए उठें, अगर किताबें मुकद्दस हों लेकिन इंसान बे-कद्र हो जाए, तो हमें एक पल के लिए रुककर अपने अंदर झांकना चाहिए।
तहज़ीब वह नहीं जो हम अपने बारे में कहते हैं; तहज़ीब वह है जो हमारे रवैये दूसरों को महसूस कराते हैं।
सोशल मीडिया: रिश्ते जोड़ने की ताकत या नफरत फैलाने का जरिया?
आज हमारे हाथ में एक अजीब और ताकतवर माध्यम है—सोशल मीडिया।
यहां हम ऐसे लोगों से बातचीत करते हैं जिन्हें शायद जिंदगी में कभी देखा भी न हो। न उनकी उम्र मालूम, न उनका पेशा, न उनकी सामाजिक हैसियत और न ही उनकी जिंदगी की पूरी कहानी। फिर भी कुछ अल्फाज़ के जरिए दिल एक-दूसरे तक पहुंच जाते हैं।
यह इंसानी तारीख का एक खूबसूरत इमकान है। लेकिन अफसोस कि इसी ताकत का इस्तेमाल हम नफरत, तंज, तौहीन और इल्जाम के लिए भी कर रहे हैं।
एक जुमला लिखने से पहले हम यह नहीं सोचते कि स्क्रीन के दूसरी तरफ भी एक इंसान मौजूद है। उसके पास भी एक दिल है। वह भी दुखता है, खुश होता है, परेशान होता है, तन्हा होता है और कभी-कभी सिर्फ एक अच्छे जुमले का मोहताज होता है।
हमें याद रखना चाहिए कि स्क्रीन के दूसरी तरफ सिर्फ एक प्रोफाइल नहीं, बल्कि एक इंसान मौजूद है।
इख्तिलाफ कीजिए, लेकिन इंसान की इज्जत के साथ
इख्तिलाफ कीजिए, जरूर कीजिए। सवाल उठाइए, दलील दीजिए और गलती की निशानदेही भी कीजिए। लेकिन इंसान को उसकी राय से अलग करके देखना सीखिए।
किसी विचार को खारिज करना आसान है, लेकिन किसी इंसान को खारिज कर देना खतरनाक हो सकता है।
इख्तिलाफ में भी शाइस्तगी कायम रह सकती है और तनकीद में भी मोहब्बत और एहतराम की गुंजाइश होती है।
दुनिया को शायद एक और बुलंद आवाज़ की जरूरत नहीं है। उसे कुछ नर्मदिल इंसानों की जरूरत है।
ऐसे इंसान जो अपने इल्म पर फख्र करने के बजाय दूसरों से सीख सकें।
ऐसे लिखने वाले जो अपनी तहरीर से पहले अपने दिल को पढ़ सकें।
ऐसे मजहबी लोग जिनके किरदार से मजहब की खूबसूरती दिखाई दे।
ऐसे दानिशवर जो इख्तिलाफ को दुश्मनी न समझें।
और ऐसे आम इंसान जो किसी अजनबी के दर्द को भी अपना दर्द समझने की सलाहियत रखते हों।
आखिर जिंदगी का हिसाब किस बात का होगा?
आखिरकार हमारी जिंदगी का हिसाब शायद हमारी किताबों की तादाद से नहीं होगा, न हमारी शोहरत की बुलंदी से और न सोशल मीडिया की लोकप्रियता से।
असल सवाल शायद यह होगा कि हमने कितने दिलों को सुकून दिया, कितने दिलों को टूटने से बचाया और कितनी जगहों पर इंसान होने का हक अदा किया।
इसलिए लिखिए, जितना चाहें लिखिए। अपने इल्म को आगे बढ़ाइए, अपनी राय का इज़हार कीजिए, लेकिन हुरूफ के गुरूर में गिरफ्तार मत होइए।
इल्म हमें ऊंचा उठाए तो यह कमाल है, लेकिन इतना भी नहीं कि हमें अपने से नीचे कोई इंसान दिखाई ही न दे।
आइए, अपने अल्फाज़ को थोड़ा नरम, अपने इख्तिलाफ को थोड़ा मुहज़्ज़ब, अपने इल्म को थोड़ा मुतवाज़े और अपने दिल को थोड़ा वसीअ कर लें।
शायद दुनिया को बदलने के लिए हमेशा किसी बड़े इंकलाब की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक नरम लहजा, एक माफी, एक भरोसा, एक अच्छा जुमला और एक दर्दमंद दिल भी किसी की पूरी दुनिया बदल सकता है।
इल्म की ज़ीनत तवाज़ो है और इंसानियत की ज़ीनत दर्द-ए-दिल।
बाकी सब कुछ आरज़ी है।
लेखक: शरफुद्दीन सैयद
Source: Haqeeqat Times

