गलती की निशानदेही दलील से कीजिए, तमस्ख़ुर, तौहीन और किरदारकुशी से नहीं
इस्लाम ने इल्म को असाधारण मुकाम अता किया है और अहले-इल्म की फ़ज़ीलत और ज़िम्मेदारी को वाज़ेह किया है। उलेमा अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम नहीं हैं और न ही हर आलिम ख़ता से पाक होता है, क्योंकि आलिम भी इंसान है और इंसान से गलती का इमकान बहहरहाल मौजूद रहता है। हालांकि जो शख़्स दीन का इल्म हासिल करता है, क़ुरआन व सुन्नत की तालीम देता है और लोगों को अल्लाह तआला के अहकाम से आगाह करने की कोशिश करता है, उसके साथ अदब, एहतराम और हुस्न-ए-ज़न का मामला करना इस्लामी अख़लाक़ का हिस्सा है।
आज हमारे समाज का एक अफ़सोसनाक पहलू यह है कि कुछ लोग किसी आलिम की एक बात या राय से इख़्तिलाफ़ को ज़ाती दुश्मनी में तब्दील कर लेते हैं। किसी मसले में इख़्तिलाफ़ हुआ तो पूरे तबक़ा-ए-उलेमा को बुरा-भला कहना, उनके लिबास, दाढ़ी, इमामा या दीनी ख़िदमात का मज़ाक उड़ाना, उन पर तंज़ करना और सोशल मीडिया या दूसरे ज़राए-इब्लाग़ पर उनकी तौहीन को रोशन-ख़याली या आज़ादी-ए-इज़हार का नाम देना न इल्म है, न इंसाफ़ और न ही इस्लामी अख़लाक़।
इख़्तिलाफ़ और बुग़्ज़ में फ़र्क़ समझना ज़रूरी
किसी आलिम की राय से इख़्तिलाफ़ करना एक फ़ितरी और इल्मी अमल है, जबकि उलेमा से बुग़्ज़ रखना बिल्कुल अलग रवैया है। अगर किसी आलिम से किसी मसले में इख़्तिलाफ़ हो तो क़ुरआन व सुन्नत की रोशनी में दलील पेश की जा सकती है। इल्मी गुफ़्तगू की जा सकती है। अगर किसी आलिम से कोई गलती हो जाए तो अदब के दायरे में रहते हुए उसकी इस्लाह भी की जा सकती है।
लेकिन किसी एक वाक़िये या कुछ अफ़राद की ग़लतियों को बुनियाद बनाकर पूरे तबक़ा-ए-उलेमा के ख़िलाफ़ नफ़रत पैदा करना किसी भी तौर पर दुरुस्त नहीं है।
यह कहना कि “तमाम उलेमा जाहिल हैं”, “उलेमा ज़माने से पीछे हैं” या “उलेमा को दुनिया की कोई समझ नहीं” और फिर उनकी तज़हीक व तौहीन को मामूल बना लेना एक ख़तरनाक फ़िक्री रवैया है।
इख़्तिलाफ़ दलील से होना चाहिए, नफ़रत और तमस्ख़ुर से नहीं।
क़ुरआन ने अहले-इल्म के मुकाम को वाज़ेह किया
अल्लाह तआला क़ुरआन-ए-करीम में फ़रमाते हैं:
يَرْفَعِ اللّٰهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنْكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ
“अल्लाह तुममें से ईमान वालों और जिन्हें इल्म अता किया गया है, उनके दर्जे बुलंद फ़रमाएगा।”
(सूरह अल-मुजादिला: 11)
एक दूसरे मुकाम पर इरशाद है:
إِنَّمَا يَخْشَى اللّٰهَ مِنْ عِبَادِهِ الْعُلَمَاءُ
“अल्लाह के बंदों में से हक़ीक़तन उससे वही डरते हैं जो इल्म वाले हैं।”
(सूरह फ़ातिर: 28)
ये आयात इस हक़ीक़त की तरफ़ रहनुमाई करती हैं कि हक़ीक़ी इल्म इंसान के अंदर अल्लाह का ख़ौफ़, आजिज़ी, ज़िम्मेदारी और हक़-शनासी पैदा करता है। इल्म अगर इंसान को तकब्बुर के बजाय तवाज़ो और नफ़रत के बजाय ख़ैरख़्वाही की तरफ़ ले जाए तो यही इल्म की हक़ीक़ी रूह है।
क़ुरआन का उसूल: जिसे इल्म न हो, अहले-इल्म से पूछे
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
“अगर तुम नहीं जानते तो अहले-ज़िक्र से पूछो।”
(सूरह अन-नहल: 43)
यह आयत एक बुनियादी उसूल बयान करती है कि जिस मामले का हमें इल्म न हो, वहाँ अपनी राय, क़यास या सुनी-सुनाई बात को हतमी हक़ीक़त समझने के बजाय अहले-इल्म से रुजू किया जाए।
आज सूरत-ए-हाल यह है कि कुछ लोग दीनी मसाइल में किसी मुस्तनद आलिम से रुजू करने के बजाय चंद लम्हों की एक वीडियो या सोशल मीडिया पर गर्दिश करने वाली एक तहरीर देखकर राय क़ायम कर लेते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इलाज के लिए हम माहिर डॉक्टर, क़ानूनी मामले में माहिर वकील और तामीर के लिए माहिर इंजीनियर की ज़रूरत तस्लीम करते हैं, तो फिर दीन के पेचीदा मसाइल में अहले-इल्म की ज़रूरत से इनकार क्यों?
रसूलुल्लाह ﷺ ने उलेमा को अंबिया का वारिस क़रार दिया
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ الْعُلَمَاءَ وَرَثَةُ الْأَنْبِيَاءِ
“बेशक उलेमा अंबिया के वारिस हैं।”
(सुनन अबी दाऊद)
अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम ने माल और दौलत को विरासत में नहीं छोड़ा, बल्कि इल्म और हिदायत की मीरास छोड़ी। उलेमा उसी दीनी इल्म को आगे पहुंचाने की कोशिश करते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि हर शख़्स जो आलिम कहलाता है, उसकी हर बात लाज़िमन दुरुस्त है। हर इंसान ख़ता कर सकता है। लेकिन चंद अफ़राद की ग़लतियों को बुनियाद बनाकर पूरे तबक़ा-ए-उलेमा को निशाना बनाना इंसाफ़ के तक़ाज़ों के ख़िलाफ़ है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
مَنْ يُرِدِ اللّٰهُ بِهِ خَيْرًا يُفَقِّهْهُ فِي الدِّينِ
“अल्लाह तआला जिसके साथ ख़ैर का इरादा फ़रमाता है, उसे दीन की समझ अता फ़रमाता है।”
(सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम)
दीन की समझ अल्लाह तआला की अज़ीम नेमत है। इस इल्म को हासिल करना, सीखना, सिखाना और आने वाली नस्लों तक पहुंचाना एक अज़ीम ख़िदमत है।
आलिम की गलती की इस्लाह कैसे की जाए?
यहाँ एक अहम तवाज़ुन को समझना ज़रूरी है। उलेमा का एहतराम इस बात का नाम नहीं कि उनकी हर बात को बिला-दलील दुरुस्त मान लिया जाए। इस्लाम अंधी तक़लीद के बजाय हक़, दलील और तहक़ीक़ की तालीम देता है।
अगर किसी आलिम से गलती हो तो गलती को गलती कहा जाए, लेकिन आलिम की तज़लील न की जाए। दलील पेश की जाए, इल्मी जवाब दिया जाए और इस्लाह की कोशिश की जाए, लेकिन गाली, तमस्ख़ुर, किरदारकुशी और तौहीन से बहहरहाल इज्तिनाब किया जाए।
किसी आलिम की एक राय को ग़लत क़रार देना और उसकी पूरी शख़्सियत को बुरा-भला कहना दो अलग चीज़ें हैं।
गलती की इस्लाह इल्म से कीजिए, शख़्सियत की तज़लील से नहीं।
क़ुरआन मज़ाक और तौहीन से रोकता है
अल्लाह तआला फ़रमाते हैं:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِنْ قَوْمٍ عَسَىٰ أَنْ يَكُونُوا خَيْرًا مِنْهُمْ
“ऐ ईमान वालों! कोई क़ौम दूसरी क़ौम का मज़ाक न उड़ाए, मुमकिन है कि वे उनसे बेहतर हों।”
(सूरह अल-हुजुरात: 11)
इसी सूरह में फ़रमाया:
وَلَا تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ
“एक-दूसरे को बुरे अलक़ाब से न पुकारो।”
(सूरह अल-हुजुरात: 11)
और इरशाद है:
وَلَا يَغْتَبْ بَعْضُكُمْ بَعْضًا
“तुममें से कोई एक-दूसरे की ग़ीबत न करे।”
(सूरह अल-हुजुरात: 12)
जब आम इंसान की तौहीन, बुरे अलक़ाब और मज़ाक से रोका गया है तो दीन की तालीम और ख़िदमत से जुड़े किसी शख़्स की मुसलसल तज़हीक और तज़लील किस क़दर नामुनासिब और अफ़सोसनाक होगी।
सोशल मीडिया और ज़बान की ज़िम्मेदारी
सोशल मीडिया ने ज़बान के गुनाह को उंगलियों का गुनाह बना दिया है। पहले किसी शख़्स की तौहीन कुछ लोगों तक महदूद रहती थी, आज एक जुमला, एक तस्वीर या एक तंज़िया तहरीर चंद लम्हों में हज़ारों लोगों तक पहुंच सकती है।
इसलिए किसी आलिम या किसी भी मुसलमान के बारे में कुछ लिखने या नशर करने से पहले हमें ख़ुद से पूछना चाहिए:
क्या यह बात हक़ीक़त पर मबनी है?
क्या मैंने असल हवाला देखा है?
क्या मैंने पूरी बात समझी है?
क्या मैं किसी ग़लतफ़हमी को आगे तो नहीं बढ़ा रहा?
और सबसे बढ़कर, क्या मैं अपने इस जुमले की ज़िम्मेदारी अल्लाह तआला के सामने क़ुबूल कर सकूँगा?
आज़ादी-ए-इज़हार ज़िम्मेदारी से आज़ाद होने का नाम नहीं है।
उलेमा से मोहब्बत का मतलब अंधी हिमायत नहीं
उलेमा का एहतराम करने का मतलब यह हरगिज़ नहीं कि हर आलिम की हर बात को बिला-तहक़ीक़ दुरुस्त तस्लीम कर लिया जाए। सही रवैया यह है कि हक़ को हक़ समझा जाए, दलील को दलील की बुनियाद पर परखा जाए, आलिम की इज़्ज़त भी बरक़रार रखी जाए और गलती की इस्लाह भी की जाए।
हम किसी आलिम की राय से इख़्तिलाफ़ कर सकते हैं, लेकिन इख़्तिलाफ़ हमें बदतमीज़ी का लाइसेंस नहीं देता।
जिस तरह किसी डॉक्टर की तश्ख़ीस से इख़्तिलाफ़ किया जा सकता है, लेकिन तमाम डॉक्टरों को जाहिल कहना दुरुस्त नहीं; उसी तरह किसी आलिम की राय से इख़्तिलाफ़ किया जा सकता है, मगर पूरे तबक़ा-ए-उलेमा को बदनाम करना भी इंसाफ़ नहीं।
उलेमा के ख़िलाफ़ नफ़रत दरअसल समाज के अख़लाक़ का मसला है
उलेमा से बुग़्ज़ और अहले-इल्म की तौहीन सिर्फ़ उलेमा का मसला नहीं, बल्कि पूरे समाज के अख़लाक़ और इल्मी मिज़ाज का मसला है।
अगर हम बच्चों को यह सिखाएंगे कि आलिम का मज़ाक उड़ाना ज़हानत है, उस्ताद को हक़ीर समझना आज़ादी है और दीन की बात करने वाले हर शख़्स को दक़ियानूसी कहना तरक़्क़ी है, तो फिर कल वे अपने वालिदैन, असातिज़ा और बुज़ुर्गों के एहतराम को भी क्यों अहम समझेंगे?
एक सेहतमंद समाज वह होता है जहाँ इख़्तिलाफ़ की गुंजाइश हो, सवाल करने की आज़ादी हो, दलील की क़द्र हो और इंसान की इज़्ज़त भी महफ़ूज़ रहे।
सोशल मीडिया के फ़ैसलों से पहले तहक़ीक़ ज़रूरी
आज किसी आलिम के ख़िलाफ़ एक मुख़्तसर वीडियो या चंद जुमलों की तहरीर सामने आती है और लोग मुकम्मल पस-ए-मंज़र जाने बग़ैर फ़ैसला सुना देते हैं। कई बार बात का सिर्फ़ एक हिस्सा दिखाया जाता है, जबकि असल गुफ़्तगू का मतलब बिल्कुल मुख़्तलिफ़ होता है।
इसलिए ज़रूरी है कि हम किसी भी आलिम या दीनी शख़्सियत के बारे में राय क़ायम करने से पहले असल बात, मुकम्मल हवाला और पस-ए-मंज़र को समझें।
तहक़ीक़ के बग़ैर फ़ैसला और दलील के बग़ैर इल्ज़ाम, दोनों इंसाफ़ के मुनाफ़ी हैं।
अहले-इल्म की इज़्ज़त, इल्म की इज़्ज़त है
जिस समाज में उलेमा, असातिज़ा, वालिदैन और अहले-इल्म की इज़्ज़त ख़त्म होने लगे, वहाँ इल्म, तरबियत और अख़लाक़ी क़द्रें भी कमज़ोर पड़ने लगती हैं।
उलेमा फ़रिश्ते नहीं कि उनसे गलती न हो, लेकिन वे दुश्मन भी नहीं कि उनकी हर बात का मज़ाक उड़ाया जाए।
उनकी गलती की इस्लाह कीजिए, मगर उनकी तज़लील न कीजिए।
उनसे सवाल कीजिए, मगर तमस्ख़ुर न कीजिए।
उनसे इख़्तिलाफ़ कीजिए, मगर बुग़्ज़ न पालिए।
दलील पेश कीजिए, मगर गाली न दीजिए।
हमें एक ऐसा दीनी और सामाजिक माहौल पैदा करने की ज़रूरत है जहाँ इख़्तिलाफ़ भी हो और एहतराम भी, सवाल भी हो और अदब भी, इस्लाह भी हो और ख़ैरख़्वाही भी।
उलेमा से सवाल करें।
उलेमा से इख़्तिलाफ़ करें।
उलेमा की इस्लाह करें।
लेकिन उलेमा को गाली न दें।
फ़तवा ग़लत मालूम हो तो दलील लाएं। बात ग़लत मालूम हो तो इल्मी जवाब दें। राय से इख़्तिलाफ़ हो तो मुहज़्ज़ब अंदाज़ इख़्तियार करें। मगर तमस्ख़ुर, तौहीन और किरदारकुशी को अपना तरीक़ा न बनाएं।
याद रखिए, ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ मराहिल में हमें अहले-इल्म की रहनुमाई की ज़रूरत पेश आती है। निकाह हो, विरासत का मसला हो, ज़कात और इबादात के अहकाम हों, हलाल व हराम का मामला हो या ज़िंदगी के आख़िरी मरहले में दीनी रहनुमाई दरकार हो, अहले-इल्म समाज की एक अहम ज़रूरत हैं।
इसलिए उलेमा की इस्लाह ज़रूर करें, लेकिन उनकी बेइज़्ज़ती न करें। इख़्तिलाफ़ ज़रूर करें, लेकिन बुग़्ज़ न पालें। सवाल ज़रूर करें, लेकिन तमस्ख़ुर न करें।
और सबसे बढ़कर, दीन के इल्म की क़द्र करें, अहले-इल्म का अदब करें और अपनी ज़बान व क़लम को अल्लाह तआला के सामने जवाबदेह समझें।
क्योंकि ज़बान से निकला हुआ लफ़्ज़ हवा में तहलील नहीं हो जाता; वह किसी के दिल को ज़ख़्मी भी कर सकता है और इंसान के नाम-ए-आमाल का हिस्सा भी बन सकता है।
इल्म का तक़ाज़ा तवाज़ो है, इख़्तिलाफ़ का तक़ाज़ा अदब है और इस्लाह का तक़ाज़ा ख़ैरख़्वाही है।
कलम: आलिमा मुबीन पालीगार, एम.ए., एम.एड.
प्रिंसिपल, माउंट सिनाई प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज, बेलगावी, कर्नाटक
Source: Haqeeqat Times

