जब मोबाइल उस्ताद से बढ़कर वक्त का निगहबान बन जाए

आज के दौर में मोबाइल फोन सिर्फ बातचीत और मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई और जानकारी का एक अहम जरिया भी बन चुका है। लेकिन यही मोबाइल कब जरूरत से बढ़कर आदत और फिर आदत से लत बन जाता है, इसका एहसास अक्सर देर से होता है।

राशिद का सपना था कि वह NEET में कामयाबी हासिल कर डॉक्टर बने। आर्थिक हालात ऐसे नहीं थे कि वह महंगी कोचिंग ले सके। इसलिए ऑनलाइन लेक्चर के लिए मोबाइल ही उसका उस्ताद और उम्मीद बन गया।

एक रात पढ़ाई के दौरान लेक्चर खत्म हुआ तो स्क्रीन पर एक रील दिखाई दी। फिर दूसरी और तीसरी… राशिद का अंगूठा स्क्रॉल करता रहा और देखते ही देखते एक घंटा गुजर गया। सुबह नींद पूरी नहीं हुई, सिर दर्द कर रहा था और आंखों में जलन थी। दोपहर के मॉक टेस्ट में कम नंबर आए तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।

आईने के सामने खड़े होकर उसने खुद से सवाल किया—“मोबाइल मेरा उस्ताद था या मैं ही उसका कैदी बन गया?”

उसने गैरजरूरी ऐप्स हटा दिए, नोटिफिकेशन बंद किए और मोबाइल इस्तेमाल करने का वक्त तय कर लिया। अब मोबाइल उसके हाथ में था, लेकिन उसका वक्त मोबाइल के हाथ में नहीं था।

कुछ ही हफ्तों बाद उसके मॉक टेस्ट में शानदार नंबर आने लगे।

मां ने एक दिन पूछा,
“अब मोबाइल से जान छूट गई?”

राशिद मुस्कुराया और बोला,
“नहीं अम्मी! मोबाइल अभी भी मेरे पास है, मगर अब मैं इसे अपनी मर्जी और अपने कायदे के मुताबिक चलाता हूं।”

स्क्रीन वही थी, मगर कैदी आजाद हो चुका था।

आज यह सवाल सिर्फ राशिद से नहीं, हम सभी से है—

क्या हम मोबाइल चला रहे हैं, या मोबाइल हमें चला रहा है?

📌 मोबाइल को अपना साधन बनाइए, अपना मालिक नहीं।
वक्त की हिफाजत कीजिए, क्योंकि गुजरा हुआ वक्त कभी वापस नहीं आता।

लेखक: रहबर तमापुरी

Source: Haqeeqat Times