महंगाई ने इकॉनॉमिक ग्रोथ के दावों पर उठाए बड़े सवाल, आम आदमी की खाली जेब बनी सबसे बड़ी चिंता

महंगाई, बेरोज़गारी और बढ़ते कर्ज़ के बोझ ने तरक़्क़ी के दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया

 

आज मुल्क में हर तरफ़ बेचैनी और मायूसी का माहौल दिखाई दे रहा है। किसी भी मुल्क की असली ताक़त उसकी मज़बूत, मुस्तहकम और ख़ुदकफ़ील इकोनॉमी होती है। मआशी इस्तेहकाम के ज़रिए ही क़ौमी तरक़्क़ी, सियासी ख़ुदमुख़्तारी, समाजी ख़ुशहाली और दुनिया में मुल्क की इज़्ज़त की बुनियाद तैयार होती है।

जिस मुल्क की इकोनॉमी मज़बूत होती है, वह अपने फ़ैसले आज़ादी और ख़ुदएतमादी के साथ कर सकता है। तरक़्क़ीयाफ़्ता मुल्क लगातार नई टेक्नोलॉजी, इंडस्ट्री, तिजारत, रिसर्च और इंसानी वसाइल पर इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं। दूसरी तरफ़ तरक़्क़ी कर रहे मुल्कों के सामने बेरोज़गारी, महंगाई, ग़रीबी, कर्ज़ और आमदनी में गैर-बराबरी जैसे संगीन मसाइल मौजूद हैं।

ऐसे हालात में सिर्फ़ मआशी तरक़्क़ी के बड़े-बड़े दावे काफ़ी नहीं हैं। ज़रूरत इस बात की है कि तरक़्क़ी के फल आम शहरी तक भी पहुँचें।

मज़बूत इकोनॉमी का पहला सुतून पैदावारी सलाहियत है। जो मुल्क ज़्यादा पैदा करता है, बेहतर प्रोडक्ट तैयार करता है और ग्लोबल मार्केट में अपनी जगह बनाता है, वही मआशी तौर पर ज़्यादा मुस्तहकम होता है।

किसी भी मुल्क की सबसे बड़ी ताक़त उसकी नौजवान आबादी होती है। लेकिन अगर यही नौजवान तालीम मुकम्मल करने के बावजूद रोज़गार से महरूम रहें तो यह ताक़त एक क़ौमी मसले में बदल सकती है। इसलिए ऐसी तालीमी पॉलिसी की ज़रूरत है जो सिर्फ़ डिग्रियाँ बाँटने के बजाय नौजवानों को हुनर, टेक्नोलॉजी, रिसर्च और अमली मैदान के लिए तैयार करे।

इसी तरह महंगाई आम आदमी की ज़िंदगी को सबसे ज़्यादा मुतास्सिर करती है। जब ज़रूरी अशिया की कीमतें लगातार बढ़ती रहें और आमदनी उस रफ़्तार से न बढ़े तो मिडिल क्लास और ग़रीब तबक़ा शदीद मुश्किलात का शिकार हो जाता है।

मज़बूत इकोनॉमी का मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि सरकारी ख़ज़ाने के आंकड़े बेहतर दिखाई दें। इसका असल मतलब यह है कि आम आदमी को मुनासिब रोज़गार, बेहतर तालीम, इलाज और इज़्ज़त के साथ ज़िंदगी गुज़ारने के मौक़े हासिल हों।

करप्शन, वसाइल की गैर-मुनासिब तक़सीम और दौलत का चंद हाथों में सिमट जाना मआशी तरक़्क़ी की राह में बड़ी रुकावटें हैं। अगर तरक़्क़ी का फायदा सिर्फ़ कुछ ख़ास तबक़ों तक महदूद रह जाए और आम शहरी महंगाई व बेरोज़गारी के बोझ तले दबता रहे तो ऐसी तरक़्क़ी को मआशी कामयाबी नहीं कहा जा सकता।

हक़ीक़ी तरक़्क़ी वही है जिसमें समाज के कमज़ोर तबक़े भी शरीक हों।

असल इकोनॉमी यह है कि घर का चूल्हा कितनी आसानी से जल रहा है, बच्चों की तालीम का ख़र्च कहाँ से पूरा होगा, इलाज के लिए कितनी रकम चाहिए, बिजली, ईंधन और रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों की बढ़ती कीमतों के बाद महीने की आमदनी में कितना पैसा बचता है?

यही वह मुक़ाम है जहाँ काग़ज़ी इकोनॉमी और ज़मीनी इकोनॉमी का फ़र्क़ साफ़ दिखाई देता है।

भारत में इन दिनों एक तरफ़ मआशी तरक़्क़ी के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ महंगाई आम आदमी की ख़रीदने की ताक़त को लगातार कमज़ोर कर रही है। अगर आमदनी की रफ़्तार ख़र्च की रफ़्तार से पीछे रह जाए तो तरक़्क़ी के तमाम दावे आम शहरी के लिए बे-मानी हो जाते हैं।

मज़दूर, किसान, मिडिल क्लास और छोटे कारोबारी वे तबक़े हैं जो इकोनॉमी का असल बोझ महसूस करते हैं। उनके पास बढ़ती कीमतों का सामना करने के लिए न बड़े ज़ख़ीरे होते हैं और न ही आमदनी के कई ज़रिए।

हमारे मआशी निज़ाम का एक बड़ा अलमिया यह है कि दौलत की गर्दिश सीमित होती जा रही है। पूँजी चंद हाथों में सिमटती जा रही है, जबकि बड़ी आबादी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के लिए जद्दोजहद कर रही है।

दौलत की मुनसिफ़ाना तक़सीम मआशी तरक़्क़ी का असल मक़सद होना चाहिए।

बेरोज़गारी बनी बड़ा सवाल

बढ़ती बेरोज़गारी इकोनॉमी का वह ज़ख़्म है जिसे सिर्फ़ आंकड़ों के ज़रिए छिपाया नहीं जा सकता। एक नौजवान बरसों तालीम हासिल करने के बाद अगर मुनासिब रोज़गार से महरूम रहे तो इसका असर सिर्फ़ उसकी ज़ात तक महदूद नहीं रहता, बल्कि पूरा ख़ानदान और आख़िरकार पूरा समाज मुतास्सिर होता है।

बेरोज़गारी सिर्फ़ मआशी मसला नहीं है बल्कि यह समाजी बेचैनी, मायूसी और मुस्तक़बिल के बारे में बेयक़ीनी का भी सबब बनती है।

इकोनॉमी की हक़ीक़त को समझने के लिए छोटे कारोबार, किसान, मज़दूर, नौजवान और मिडिल क्लास की हालत का जायज़ा लेना ज़रूरी है।

एक सेहतमंद इकोनॉमी वही होती है जिसमें तरक़्क़ी का फायदा समाज के निचले तबक़े तक पहुँचे, रोज़गार के मौक़े पैदा हों, छोटे कारोबार महफ़ूज़ रहें और बुनियादी ज़रूरतें आम आदमी की पहुँच से बाहर न हों।

लोकतंत्र में जनता को सवाल करने का हक़

जम्हूरी निज़ाम में अवाम को यह हक़ हासिल है कि वह हुकूमत से सवाल करे कि अगर इकोनॉमी तरक़्क़ी कर रही है तो हमारी ज़िंदगी मुश्किल क्यों होती जा रही है?

अगर मुल्क आगे बढ़ रहा है तो नौजवानों के मुस्तक़बिल में बेयक़ीनी क्यों है? नौजवान तबक़ा मायूसी का शिकार क्यों है? अगर इन्वेस्टमेंट बढ़ रही है तो छोटे कारोबार दबाव में क्यों हैं? और अगर तरक़्क़ी के फल मौजूद हैं तो आम आदमी परेशान क्यों है? इन फलों का फायदा आम जनता तक कब पहुँचेगा?

इकोनॉमी की असल तस्वीर एयर-कंडीशंड कमरों में तैयार होने वाली रिपोर्टों से ज़्यादा बाज़ारों, खेतों, कारखानों और मिडिल क्लास के घरों में दिखाई देती है।

हुकूमतों और पॉलिसी मेकर्स को यह समझना होगा कि मआशी कामयाबी का असल पैमाना सिर्फ़ आंकड़े नहीं बल्कि अवाम का लाइफ़ स्टैंडर्ड है।

जब तक आम आदमी को महंगाई से हक़ीक़ी राहत, नौजवानों को इज़्ज़त वाला रोज़गार, किसानों को मुनासिब क़ीमत, मज़दूरों को महफ़ूज़ मज़दूरी और मिडिल क्लास को मआशी इस्तेहकाम हासिल नहीं होता, तब तक तरक़्क़ी के बुलंद-बांग दावों और इकोनॉमी की ज़मीनी हक़ीक़त के बीच एक बड़ा फ़ासला बरक़रार रहेगा।

क्योंकि इकोनॉमी की असल हक़ीक़त यह नहीं कि मुल्क के ख़ज़ाने में कितना इज़ाफ़ा हुआ, बल्कि यह देखना ज़रूरी है कि आम आदमी के घर में ज़िंदगी कितनी आसान हुई।

चीनी की कीमतों में अचानक तेज़ इज़ाफ़ा

चीनी समेत रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों की कीमतों में अगस्त के दौरान अचानक ज़बरदस्त इज़ाफ़ा देखने को मिला है। सिर्फ़ 17 दिनों में चीनी की कीमत करीब 19 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गई।

थोक बाज़ार में चीनी की कीमत 44 रुपये से बढ़कर करीब 65 रुपये और कई जगहों पर खुदरा कीमत 80 रुपये प्रति किलो तक पहुँच गई है।

ताजिरों के मुताबिक़ कम स्टॉक, त्योहारों से पहले बढ़ती माँग और बाज़ार में ज़ख़ीरा किए जाने को कीमतों में इज़ाफ़े की बड़ी वजहों में शामिल किया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश के कुछ बाज़ारों में ताजिरों ने एजेंटों की तरफ़ से लगातार ऊँचे रेट पर चीनी बेचे जाने की बात भी कही है।

कीमतों में इज़ाफ़े का असर सिर्फ़ घरेलू बजट पर नहीं पड़ रहा, बल्कि चाय, मिठाई और खाने-पीने की कई दूसरी चीज़ें भी महंगी होने लगी हैं।

फिलहाल कीमतों में तेज़ी बरक़रार है और अवाम महंगाई व बेरोज़गारी से परेशान है।

मंत्रियों के सरकारी बंगलों की मरम्मत पर 10 साल में खर्च तीन गुना

एक तरफ़ आम लोग महंगाई और रोज़मर्रा के बढ़ते ख़र्च से परेशान हैं, वहीं केंद्रीय मंत्रियों के सरकारी बंगलों की मरम्मत और रखरखाव पर होने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

नई दिल्ली के लुटियंस ज़ोन में केंद्रीय मंत्रियों के सरकारी बंगलों की मरम्मत, देखभाल, साज-सज्जा और अपग्रेडेशन पर होने वाले खर्च में पिछले वर्षों के दौरान बड़ा इज़ाफ़ा हुआ है।

आरटीआई से हासिल जानकारी के मुताबिक़ 2014-15 में इन कामों पर 27.47 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जबकि 2025-26 में यह रकम बढ़कर 92.35 करोड़ रुपये हो गई। यानी सालाना खर्च तीन गुना से भी ज़्यादा बढ़ गया।

रिपोर्ट के मुताबिक़ 2014-15 से 2025-26 तक 12 वर्षों में केंद्रीय मंत्रियों की सरकारी रिहाइशों की मरम्मत और रखरखाव पर कुल 547.68 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

ये काम केंद्रीय लोक निर्माण विभाग यानी CPWD के ज़रिए कराए जाते हैं।

आंकड़ों के मुताबिक़ 2019-20 में खर्च 26.37 करोड़ रुपये था, जो 2020-21 में बढ़कर 53.87 करोड़, 2022-23 में 73.86 करोड़ और 2025-26 में 92.35 करोड़ रुपये तक पहुँच गया।

अधिकारियों के मुताबिक़ इनमें से ज़्यादातर बंगले 80 से 100 साल पुराने हैं। इनमें सीलन, दीमक, पुराने बिजली के सिस्टम, पाइपलाइन और दूसरी मरम्मत की समस्याएँ सामने आती रहती हैं।

इसी वजह से रखरखाव का खर्च बढ़ने की एक वजह पुरानी इमारतों की हालत और बढ़ती निर्माण लागत को बताया गया है।

लेकिन इस खुलासे के बाद सियासी हलकों में सवाल भी उठ रहे हैं कि जब आम लोग महंगाई और रोज़मर्रा के ख़र्चों से परेशान हैं तो मंत्रियों के सरकारी बंगलों की मरम्मत और साज-सज्जा पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करने की ज़रूरत क्या है और इसकी निगरानी का निज़ाम कितना कारगर है?

विपक्षी पार्टियों ने भी इस मामले को लेकर हुकूमत पर सख़्त तनक़ीद की है।

तीन जाने-माने विशेषज्ञों की चेतावनी

एक ऐसे वक़्त में जब हुक्मरान भाजपा मुल्क में सियासी तौर पर बेहद मज़बूत पोज़ीशन में दिखाई दे रही है और लगातार चुनावी कामयाबियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अवामी छवि को और मज़बूत किया है, वहीं मुल्क की इकोनॉमी के बारे में एक बिल्कुल अलग और चिंता पैदा करने वाली तस्वीर सामने आ रही है।

भारत के तीन जाने-माने मआशी और सियासी माहिरों ने मुल्क की मौजूदा मआशी हालत और मुस्तक़बिल की सिम्त के बारे में गंभीर चेतावनी दी है।

इन तीनों विशेषज्ञों का ताल्लुक़ कांग्रेस समेत किसी सियासी पार्टी से नहीं है और न ही वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े हुए हैं।

इन तीनों के बयानों ने मुल्क में एक नई बहस छेड़ दी है। इस बहस का बुनियादी सवाल यह है कि भाजपा चुनाव तो जीत रही है, लेकिन क्या मुल्क इकोनॉमी के मैदान में पीछे जा रहा है?

मआशी हालत पर सवाल उठाने वाली इन शख़्सियतों में पहला नाम अरविंद सुब्रमणियन का है। वे 2014 से 2018 तक मोदी हुकूमत के चीफ़ इकोनॉमिक एडवाइज़र रह चुके हैं और इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड यानी IMF समेत पीटरसन इंस्टीट्यूट जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में काम करने का लंबा तजुर्बा रखते हैं।

दूसरी अहम शख़्सियत सुरजीत भल्ला की है। उन्हें मार्केट रिफॉर्म्स का मज़बूत हिमायती माना जाता है और मोदी हुकूमत ने उन्हें IMF में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के तौर पर नामित किया था।

तीसरी अहम शख़्सियत मशहूर अर्थशास्त्री संजय बारू हैं। वे पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया एडवाइज़र रह चुके हैं और मशहूर किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ के लेखक हैं।

अतीत में भाजपा समर्थक उनकी किताब और लेखों का इस्तेमाल मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की क़ियादत का मुक़ाबला करने के लिए भी करते रहे हैं।

अब यही तीनों जानी-मानी आवाज़ें भारतीय इकोनॉमी के अंदरूनी निज़ाम पर गंभीर सवाल उठा रही हैं।

क्या यह सोचने का वक़्त नहीं है कि मुल्क की इकोनॉमी को मुश्किलात से निकालने के लिए गंभीरता से ग़ौर-ओ-फ़िक्र किया जाए?

भारत पर बढ़ता विदेशी कर्ज़

इधर मुल्क पर कर्ज़ का बोझ भी लगातार बढ़ता जा रहा है। भारत के विदेशी कर्ज़ में एक बार फिर इज़ाफ़ा हुआ है।

भारतीय रिज़र्व बैंक यानी RBI के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ मार्च 2026 के अंत तक मुल्क का कुल विदेशी कर्ज़ 762.8 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जो एक साल पहले के मुक़ाबले 26.3 अरब डॉलर ज़्यादा है।

मौजूदा एक्सचेंज रेट के हिसाब से मीडिया रिपोर्टों में इसे करीब 72 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा बताया गया है।

आंकड़ों के मुताबिक़ भारत के विदेशी कर्ज़ और GDP का अनुपात बढ़कर 20.8 फ़ीसद हो गया है, जबकि एक साल पहले यह 19.8 फ़ीसद था।

यानी मुल्क की इकोनॉमी के आकार के मुक़ाबले विदेशी कर्ज़ का बोझ बढ़ा है।

रिपोर्ट में एक और अहम बात सामने आई है कि एक साल या उससे कम अवधि में अदा किए जाने वाले शॉर्ट टर्म विदेशी कर्ज़ का हिस्सा बढ़कर 19.6 फ़ीसद हो गया, जो पिछले साल 18.3 फ़ीसद था।

विदेशी मुद्रा भंडार के मुक़ाबले शॉर्ट टर्म कर्ज़ का अनुपात भी 20.1 फ़ीसद से बढ़कर 21.6 फ़ीसद हो गया है।

12 साल में करीब 9.95 लाख करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ

एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले 12 वर्षों में देशभर के बैंकों ने कुल मिलाकर करीब 9 लाख 95 हजार करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ किए हैं।

कॉरपोरेट कंपनियों और घरानों के कर्ज़ माफ किए जाने के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में सरकार ने संसद को बताया कि पिछले 12 वर्षों के दौरान कुल 9.95 लाख करोड़ रुपये के कर्ज़ बट्टे खाते में डाले गए।

वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान बैंकों ने कुल 1 लाख 48 हजार 753 करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ किए, जबकि सबसे कम कर्ज़ वित्त वर्ष 2025-26 में माफ किया गया, जिसकी कुल रकम 20 हजार 485 करोड़ रुपये रही।

केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने अपने लिखित जवाब में भारतीय रिज़र्व बैंक के आंकड़ों का हवाला देते हुए यह जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि भारी उद्योग और सर्विस सेक्टर को वित्त वर्ष 2025 के दौरान कुल 63 लाख 19 हजार 57 करोड़ रुपये के कर्ज़ दिए गए थे, जो वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 69 लाख 21 हजार 734 करोड़ रुपये हो गए।

उन्होंने RBI की तरफ़ से दी गई जानकारी के आधार पर केंद्र सरकार के कदमों और उनसे मुल्क की माली हालत में आई बेहतरी की जानकारी भी दी।

सरकार का दावा है कि उसकी नीतियों के नतीजे में मुल्क के राजकोषीय घाटे में उल्लेखनीय कमी आई है और GDP में भी सुधार दर्ज किया गया है।

कर्ज़, महंगाई और बेरोज़गारी के साथ मज़बूत राष्ट्र कैसे बनेगा?

इस हक़ीक़त को समझने की ज़रूरत है कि कर्ज़ के सहारे, बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी के साथ कोई भी क़ौम लंबे समय तक मज़बूत नहीं रह सकती।

मज़बूत क़ौम के लिए मज़बूत इकोनॉमी ज़रूरी है और मज़बूत इकोनॉमी के लिए ईमानदार क़ियादत, वाज़ेह पॉलिसी, मेहनती अवाम, आधुनिक तालीम और मुनसिफ़ाना निज़ाम नाक़ाबिले-गुज़ीर हैं।

वक़्त का तक़ाज़ा है कि हम मआशी मसाइल को सिर्फ़ सियासी बहस का मौज़ू बनाने के बजाय क़ौमी तरजीह क़रार दें।

क्योंकि जब इकोनॉमी मज़बूत होगी, तभी मुल्क मज़बूत होगा, अवाम ख़ुशहाल होगी और क़ौम दुनिया के सामने ज़्यादा वक़ार और ख़ुदएतमादी के साथ खड़ी हो सकेगी।

मज़बूत इकोनॉमी ही एक मज़बूत, ख़ुदकफ़ील और बावक़ार क़ौम की सबसे बड़ी ज़मानत है।

मुल्क की असल ताक़त इस बात से मालूम होती है कि आम शहरी की ज़िंदगी कितनी आसान, महफ़ूज़ और बावक़ार है।

बाज़ारों में रौनक़ हो लेकिन अवाम की जेब ख़ाली हो, इकोनॉमी की तरक़्क़ी के बड़े-बड़े दावे हों लेकिन नौजवान रोज़गार के लिए दर-दर भटक रहे हों, अगर सरमायादार और ज़्यादा ताक़तवर और ग़रीब और ज़्यादा कमज़ोर होता जा रहा हो, तो सवाल यह है कि आख़िर यह तरक़्क़ी किसके लिए है?

और ऐसी तरक़्क़ी का क्या मतलब है?

मुल्क की इकोनॉमी इन दिनों संगीन मुश्किलात का सामना कर रही है। लोगों के कारोबार मुतास्सिर हुए हैं, आम आदमी की कमर टूट रही है और उस पर मआशी बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

आख़िर इस मुश्किल से निकलने का रास्ता क्या है?
और इस बारे में गंभीरता से कौन सोचेगा?

लेखक : सरफ़राज़ अहमद क़ासमी, हैदराबाद

Source: Haqeeqat Times