दिल्ली के सत्य निकेतन में रहने वाले छात्र इस इलाके को अपनी पसंद से नहीं चुनते. साउथ कैंपस के आसपास रहने के सुरक्षित और सस्ते विकल्प सीमित हैं और डीयू के हॉस्टल में सीटें इतनी कम हैं कि अधिकांश छात्र निजी पीजी और किराए के फ्लैट पर निर्भर हैं. छात्र कहते हैं कि समस्या केवल पुरानी या असुरक्षित इमारतों की ही नहीं है, बल्कि उस पूरे सिस्टम की है, जिसमें छात्रों की सुरक्षा और ज़रूरत कारोबार से नीचे आती हैं.

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों छात्र दिल्ली आते हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की होती है, जिनके लिए राजधानी में पढ़ाई के साथ सबसे पहली चुनौती रहने की जगह तलाशना होती है. विश्वविद्यालय के हॉस्टलों में सीमित सीटों के कारण अधिकांश छात्रों को पीजी या किराए के मकानों पर निर्भर रहना पड़ता है. दक्षिण दिल्ली का सत्य निकेतन ऐसे ही छात्रों के लिए लंबे समय से एक प्रमुख ठिकाना रहा है.

लेकिन 6 सितंबर को सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत के ढहने से यह सवाल अचानक कहीं ज्यादा गंभीर हो गया कि जिन जगहों को छात्र अपना घर समझकर रह रहे हैं, क्या वे वास्तव में रहने के लिए सुरक्षित हैं.

हादसे में आधिकारिक तौर पर सात लोगों की मौत हुई है और छह लोग घायल हैं. इमारत में बड़ी संख्या में छात्र रह रहे थे, जिनमें अधिकांश दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के कॉलेजों में पढ़ते थे.

हादसे के बाद सत्य निकेतन के पीजी में रहने वाले कई छात्र अपना कमरा छोड़कर किसी दूसरे ठिकाने या रिश्तेदारों के घर चले गए हैं. कुछ छात्र अब भी वहीं रह रहे हैं, लेकिन डर के बीच. उनके सामने तत्काल दूसरा विकल्प भी आसान नहीं है, डीयू के आसपास सुरक्षित और किफायती आवास सीमित हैं और विश्वविद्यालय के हॉस्टलों में सभी छात्रों के लिए पर्याप्त जगह नहीं है.

सत्य निकेतन में रहने वाले छात्रों से बातचीत में बार-बार एक ही बात सामने आती है: वे यहां अपनी पसंद से नहीं, बल्कि मजबूरी में रहते हैं.

राहत और बचाव कार्य में जुटी दिल्ली पुलिस और एनडीआरएफ की टीम.

झारखंड के धनबाद की निशु दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री वेंकटेश्वर कॉलेज में स्नातक की दूसरे वर्ष की छात्रा हैं. वह हादसे वाली इमारत से करीब सात-आठ मकान छोड़कर बने एक तीन मंजिला पीजी में रहती हैं. हादसे के बाद वह अपने कमरे में लौटने से डर रही हैं और सोमवार की शाम तक वेंकटेश्वर कॉलेज में रह रही थीं, जहां सत्य निकेतन के पीजी में रहने वाले कई दूसरे छात्रों के लिए अस्थायी तौर पर रहने की व्यवस्था की गई है.

‘मैं उस इमारत के पास ही एक तीन मंजिला पीजी में रहती हूं. हादसे के बाद उसमे रहने वाली बाकी लड़कियों में से कुछ अपने रिश्तेदारों के घर चली गईं. मुझे भी वहां रहना ठीक नहीं लग रहा था, इसलिए मैं कॉलेज आ गई,’ निशु ने द वायर हिंदी को बताया.

निशु जिस पीजी में रहती हैं, उसमें सिर्फ चार कमरे हैं. वह नॉन फूड पीजी (जहां भोजन की व्यवस्था नहीं होती) के लिए प्रति महीने 9,000 रुपये देती हैं और एसी की सुविधा लेने पर अलग से भुगतान करना पड़ता है. उनके मुताबिक, सत्य निकेतन में 15-17 हजार रुपये में ऐसे पीजी मिलते हैं, जहां खाना तक नहीं मिलता, और खाना देने वाले पीजी का किराया 24-25 हजार रुपये तक पहुंच जाता है.

वेंकटेश्वर कॉलेज की छात्रा निशु.

वह कहती हैं, ‘अवैध निर्माण के अलावा इस इलाके के पीजी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि किराया बहुत ज्यादा है, लेकिन उसके हिसाब से सुविधाएं नहीं मिलतीं. कमरे बहुत छोटे होते हैं. वाशिंग मशीन जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं होती. छात्र बहुत पैसे दे रहे हैं, लेकिन उसके बदले उन्हें ढंग की सुविधाएं नहीं मिलतीं. सबसे बुरा ये की इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.’

निशु ने यह भी आरोप लगाए कि पीजी में रहने वाले छात्रों को अगर इमारत या उससे जुड़ी कोई शिकायत हो, तो मालिक अक्सर उसे गंभीरता से नहीं लेते.

‘अगर पीजी के भीतर चल रहे निर्माण कार्य या बिल्डिंग से जुड़ी कोई दिक्कत हो और हम मालिक से शिकायत करें, तो वे हमारी बात सुनते हैं, लेकिन उस पर कार्रवाई नहीं करते.’

उन्होंने बताया कि ‘इसके अलावा पीजी वाले एक या दो साल का अनुबंध साइन करवाते हैं और सिक्योरिटी डिपॉजिट भी लेते हैं. एक बार पैसे दे देने के बाद छात्र वहां रहने के लिए मजबूर हो जाते हैं, भले ही उसे वहां का हाल उन्हें पसंद न हो.’

निशु का कहना है कि सत्य निकेतन में कई पीजी लोगों के अपने घरों के भीतर बने हुए हैं और उनकी जानकारी में कुछ के पास पीजी चलाने का लाइसेंस भी नहीं है. हादसे के बाद अब उन्हें इस बात का डर और ज्यादा सताने लगा है कि जिस इमारत को वे अपना घर समझकर रह रहे हैं, वह वास्तव में कितनी सुरक्षित है.

हालांकि डर और तमाम कठिनाइयों के बावजूद निशु फ़िलहाल सत्य निकेतन में ही रहेंगी. ‘मैं यहां एक साल से रह रही हूं और फिलहाल शायद यहीं रहना पड़ेगा. इतनी जल्दी कोई ऐसी जगह ढूंढना आसान नहीं है जो लड़कियों के लिए सुरक्षित हो, आसपास का माहौल अच्छा हो और किराया भी हमारी पहुंच में हो. इसलिए अभी मेरे पास तुरंत कोई दूसरा विकल्प नहीं है,’ वह कहती हैं.

‘हम यहां अपनी मर्जी से नहीं रहते’

सत्य निकेतन में रहने वाले छात्रों से बात चीत में एक बात बार-बार सामने आती है, वो ये कि छात्र इस इलाके को अपनी पसंद से नहीं चुनते. साउथ कैंपस के आसपास रहने के लिए सुरक्षित और सस्ता विकल्प सीमित हैं और विश्वविद्यालय के हॉस्टल में सीटें इतनी कम हैं कि अधिकांश छात्रों को निजी पीजी और किराए के फ्लैट पर निर्भर रहना पड़ता है.

मोतीलाल नेहरू कॉलेज के दूसरे वर्ष के छात्र राज झारखंड से दिल्ली पढ़ने आए हैं. पिछले एक साल से वह सत्य निकेतन में पीजी में रह रहे हैं. उनके पीजी में एक बेड का किराया 12 से 15 हजार रुपये से कम नहीं है और खाना-पीना जोड़ने पर महीने का खर्च करीब 20 हजार रुपये तक पहुंच जाता है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र राज.

हादसे के दिन राज अपने पीजी में ही थे.

‘रविवार का दिन होने की वजह से हम लोग अपने कमरों में थे. अचानक तेज आवाज आई और पत्थर गिरने लगे. मेरे दोस्तों ने बताया कि हॉस्टल डेज़ पीजी गिर गई है. मैं बाहर भागकर आया तो देखा कि पांच मंजिला इमारत पूरी तरह गिर चुकी थी. उसमें मोतीलाल नेहरू कॉलेज के भी करीब 10-12 लड़के रहते थे और उनमें से कई मेरे जानने वाले थे. मैंने उन्हें फोन किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. शाम तक उनके फोन की घंटी भी आनी बंद हो गई और उसके बाद से मुझे कोई अपडेट नहीं मिला.’

राज कहते हैं कि घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो छात्र अपने परिवार से सैकड़ों किलोमीटर दूर पढ़ने आए हैं, उनके पास सुरक्षित रहने के लिए क्या विकल्प है.

‘हमारी मजबूरी यह है कि डीयू के आसपास छात्रों के लिए पर्याप्त हॉस्टल नहीं हैं. सत्य निकेतन साउथ कैंपस का एक बड़ा ‘स्टूडेंट हब’ है. आसपास मोतीलाल नेहरू कॉलेज, वेंकटेश्वर कॉलेज, रामलाल कॉलेज समेत कई कॉलेज हैं, लेकिन हॉस्टल की सुविधा बहुत कम कॉलेजों में है. इसलिए हमें कॉलेज के पास रहने के लिए सत्य निकेतन जैसे इलाकों में पीजी लेने पड़ते हैं.’

देश में छात्रों के जीवन की कीमत और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए वह कहते हैं, ‘एक छात्र फीस बढ़ोतरी से जूझे, पेपर लीक से जूझे और इन सबके बाद जब रहने की जगह तलाशे तो उसे यह डर भी रहे कि जिस कमरे में वह रह रहा है, कहीं वही उसके ऊपर न गिर जाए और उसकी जान न चली जाए. मैं सरकार से पूछना चाहता हूं कि एक विद्यार्थी को इस देश में और क्या-क्या झेलना बाकी रह गया है? कम से कम सरकार और जिम्मेदार संस्थाओं को इस पर कुछ तो करना चाहिए.’

सौम्या सिंह उत्तर प्रदेश से हैं और मोतीलाल नेहरू इवनिंग कॉलेज की छात्रा हैं. वे कहती हैं, ‘हम यहां अपनी मर्जी से नहीं रहते. दिल्ली विश्वविद्यालय में पर्याप्त हॉस्टल नहीं हैं. हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र यहां पढ़ने आते हैं और उनके पास कॉलेज के आसपास रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. अगर कॉलेज हॉस्टल नहीं देगा, तब छात्र मजबूरी में महंगे पीजी या फ्लैट लेंगे.’

बिहार की कीर्ति मिश्रा भी मोतीलाल नेहरू इवनिंग कॉलेज में पढ़ती हैं, वे कहती हैं कि घर से दूर रह रहे छात्रों के लिए यह डर सिर्फ उनका अपना नहीं है, उनके माता-पिता का भी है.

मोतीलाल नेहरू कॉलेज की छात्रा सौम्या और कीर्ति.

‘हम घर से दूर रहकर पढ़ाई कर रहे हैं. यहां जो कुछ हो रहा है, उसे हम अपनी आंखों से देख रहे हैं, लेकिन हमारे माता-पिता हमसे दूर हैं. वे चौबीस घंटे यही सोचते रहते हैं कि उनके बच्चे सुरक्षित हैं या नहीं. हम इतने महंगे पीजी में रहते हैं, हजारों रुपये किराया देते हैं, लेकिन उसके बावजूद हमारी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है,’ वह कहती हैं.

कीर्ति आगे जोड़ती हैं, ‘एक छात्र पढ़ाई करने के लिए दिल्ली आता है और सिर्फ रहने के लिए हर महीने 15 से 22 हजार रुपये तक खर्च कर रहा है. इसके ऊपर बिजली, खाना और बाकी खर्च अलग हैं. इतनी महंगा पीजी लेने के बावजूद अगर छात्र को यह भरोसा नहीं है कि जिस कमरे में वह रह रहा है, वह सुरक्षित है और उसके ऊपर नहीं गिरेगा, तब यह बहुत गंभीर समस्या है.’

‘पीजी मालिकों को सिर्फ़ पैसों से मतलब है’

श्री वेंकटेश्वर कॉलेज के चौथे वर्ष के छात्र संजय साहू ने अपने शुरुआती तीन साल सत्य निकेतन में बिताए हैं. पहले साल वह पीजी में रहे और अगले दो साल फ्लैट में. हादसे के बाद से वह वेंकटेश्वर कॉलेज में शरण लिए हुए घबराए छात्रों के साथ थे.

उनके मुताबिक सत्य निकेतन की समस्या केवल पुरानी या असुरक्षित इमारतों की नहीं, बल्कि उस पूरे हाउसिंग सिस्टम की है, जिसमें छात्रों की जरूरत को कारोबार से नीचे रखा जाता है.

सत्य निकेतन में जर्जर अवस्था में स्थित एक इमारत.

‘मेरे हिसाब से सबसे बड़ी समस्या मानसिकता की है. यहां जो पीजी मालिक हैं, उन्हें इस बात से ज्यादा फर्क पड़ता है कि उनके पास पैसे कितने आ रहे हैं, इस बात से नहीं कि छात्र किस तरह रह रहे हैं या इमारत की स्थिति क्या है. अगर वे यह सोचें कि यहां रहने वाले छात्र उनके अपने बच्चे भी हो सकते हैं, तब शायद वे उन्हें बेहतर और सुरक्षित सुविधा देने के बारे में सोचेंगे.’

संजय बताते हैं कि हादसे के बाद आसपास के पीजी में रहने वाले छात्रों में डर का माहौल है. उनके मुताबिक, वेंकटेश्वर कॉलेज में उस रात करीब 40-50 लड़कियां और 30-40 लड़के रुके थे. बाद में कई छात्र अपने घर या रिश्तेदारों के यहां चले गए.

‘यह हादसा खासकर फर्स्ट ईयर के छात्रों के लिए सबसे अधित पीड़ादायक है. अभी कुछ ही समय पहले वे अपना घर छोड़ कॉलेज में आए थे और उनके सामने इतना बड़ा हादसा हुआ है. मेरी एक छात्र से बात हुई, जिसके माता पिता ने उसे यहां तक कह दिया कि डिग्री छोड़ दो और घर वापस आ जाओ, क्योंकि सुरक्षा ज्यादा जरूरी है.’

‘डीयू में हॉस्टल होता तो पीजी में क्यों रहते?’

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की दिल्ली विश्वविद्यालय इकाई की अध्यक्ष साबी इस हादसे को एक अलग घटना के तौर पर नहीं देखतीं. उनका कहना है कि सत्य निकेतन में पहले भी इमारत गिर चुकी है और इसके बावजूद छात्रों की आवासीय सुरक्षा को लेकर कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ.

‘यह पहली बार नहीं है. 2022 में भी सत्य निकेतन में एक इमारत गिरी थी, जिसमें छात्र मलबे में दब गए थे और एक छात्र की जान चली गई थी. इसके बावजूद आज तक हालात नहीं बदले हैं.’

साबी के मुताबिक, छात्रों का सत्य निकेतन जैसे इलाकों में रहना उनकी पसंद नहीं, बल्कि हॉस्टल की कमी से पैदा हुई मजबूरी है.

‘छात्र अपनी मर्जी से यहां नहीं रहते, बल्कि मजबूरी में रहते हैं, क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय में पर्याप्त हॉस्टल ही नहीं हैं. जब विश्वविद्यालय के पास पर्याप्त हॉस्टल नहीं हैं, तब छात्रों को ऐसी जगहों पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जहां बेहद संकरी गलियां हैं और पुरानी इमारतों में प्रयाप्त सुरक्षा ऑडिट तक नहीं हुआ है.’

वह इसे संस्थागत विफलता बताते हुए दिल्ली सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र राजनीति से जुड़े संस्थानों की जवाबदेही तय करने की मांग करती हैं.

‘अगर यही भविष्य है तो कैसा भविष्य है?’

हादसे के बाद विस्थापित छात्रों की मदद के लिए कई छात्र संगठन और कॉलेज भी आगे आए हैं. माता सुंदरी कॉलेज की छात्रा जस्टिन एनएसएस की ओर से डोनेशन ड्राइव में शामिल थीं. वह खाना, पानी, टॉयलेट का सामान, कपड़े और दूसरी जरूरी चीजें लेकर सत्य निकेतन पहुंची थीं.

‘इस हादसे के बाद बहुत सारे छात्र विस्थापित हो गए हैं. कई बच्चों के पास अभी रहने की जगह नहीं है और वे कॉलेजों में शरण ले रहे हैं. हम उनके लिए खाना-पानी, कपड़े और दूसरी जरूरी चीजें लेकर आए हैं, क्योंकि जो बुनियादी सुविधाएं उनके पास होनी चाहिए थीं, वे इस हादसे के बाद उनसे छिन गई हैं.’

जस्टिन कहती हैं कि यह सिर्फ एक इमारत के गिरने की घटना नहीं है. ‘मेरे लिए यह सिर्फ एक हादसा नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की विफलता है. अगर भारत अपने छात्रों के लिए काम नहीं कर सकता, तो आखिर वह किसके लिए काम कर रहा है? हम हमेशा कहते आए हैं कि छात्र देश का भविष्य हैं. लेकिन अगर यही हमारा भविष्य है, तो हमें सोचना होगा कि हम किस तरह के भविष्य की ओर जा रहे हैं.’

हादसे के बाद अब ‘पलायन’

द हिंदू की 9 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, 150 से अधिक डीयू छात्रों ने अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. छात्रों का आरोप है कि हादसे में मरने वालों की संख्या आधिकारिक आंकड़ों से ज्यादा हो सकती है और तीन-चार, या संभवतः उससे अधिक, छात्र अब भी लापता हो सकते हैं. छात्रों ने मृतकों का सम्पूर्ण आंकड़ा सार्वजनिक करने की मांग की है. साथ ही वे प्रत्येक मृतक के परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवजा, सभी पीजी का सुरक्षा ऑडिट, जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई और दिल्ली विश्वविद्यालय में पर्याप्त हॉस्टल की मांग कर रहे हैं.

सत्य निकेतन में इमारत के गिरने पर छात्रों की जान जाने के बाद एनएसयूआई के छात्र विरोध करते हुए.

बेसमेंट को लेकर भी छात्रों ने सवाल उठाए थे. अख़बार के अनुसार, दिल्ली फायर सर्विस को सोमवार रात बेसमेंट की तलाशी के लिए दोबारा मौके पर जाना पड़ा. एनडीआरएफ द्वारा मुख्य बचाव अभियान समाप्त किए जाने के बाद सभी एजेंसियां वहां से हट गई थीं. बाद में बेसमेंट की पूरी तरह तलाशी हुई या नहीं, इस पर सवाल उठने के बाद फायर अधिकारियों ने वहां खोज की. अधिकारियों के मुताबिक, उस तलाशी में कोई शव नहीं मिला.

इसी बीच, चार या उससे अधिक मंजिल वाली पीजी इमारतों में रहने वाले छात्रों को अपना कमरा खाली करने के लिए कहा जा रहा है. ऐसी इमारतों को प्रशासन द्वारा गिराए जाने की आशंका के बीच छात्र अपना सामान लेकर इलाके से निकल रहे हैं.

इस हादसे के बाद सत्य निकेतन में एक तरफ वे छात्र हैं जो मौतों की आधिकारिक संख्या को लेकर सवाल उठा रहे हैं. दूसरी तरफ वे छात्र हैं जो अपना सामान बांधकर पीजी खाली कर रहे हैं, क्योंकि अब उन्हें अपने कमरे की चार दीवारों पर भरोसा नहीं रहा है. और तीसरी तरफ वे छात्र हैं जो कॉलेजों में अस्थायी जगह तलाश रहे हैं, क्योंकि उनके पास लौटने के लिए दिल्ली में कोई दूसरा ठिकाना नहीं है.

सत्य निकेतन से पलायन करते छात्र उस व्यवस्था की तस्वीर हैं, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने आए हजारों छात्रों के लिए सुरक्षित आवास आज भी एक सुविधा नहीं, बल्कि एक दुर्लभ विकल्प है.

Source: The Wire