उर्दू और कन्नड़ के बीच सांस्कृतिक सौहार्द की परीक्षा

बेंगलुरु: कर्नाटक में उर्दू और कन्नड़ के बीच सदियों से चले आ रहे सांस्कृतिक और साहित्यिक रिश्तों को नफरत की राजनीति से बचाने की जरूरत है। राज्य में प्रस्तावित ‘उर्दू हब्बा’ (उर्दू उत्सव) को लेकर शुरू हुआ विवाद एक बार फिर भाषाई सौहार्द के सवाल को सामने ले आया है।

कर्नाटक के अल्पसंख्यक कल्याण, वक्फ और हज मंत्री यू.टी. खादर ने 29 सितंबर 2026 को घोषणा की थी कि विश्व उर्दू दिवस के मौके पर 9 नवंबर को बेंगलुरु में विधानसभा की भव्य इमारत विधान सौधा की सीढ़ियों पर ‘उर्दू हब्बा’ आयोजित किया जाएगा।

इस कार्यक्रम में मुशायरा, पुस्तक मेला, फूड कोर्ट, उर्दू संस्कृति पर आधारित प्रदर्शनी और उर्दू अकादमी के वार्षिक पुरस्कार वितरण सहित कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने थे।

मंत्री यू.टी. खादर का कहना था कि जब विधान सौधा में कई सरकारी कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो वहां उर्दू का उत्सव भी मनाया जाना चाहिए, क्योंकि उर्दू हमारी साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहज़ीब का आईना है।

लेकिन घोषणा के अगले ही दिन बीजेपी के कुछ विधायकों और कन्नड़ समर्थक संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। कर्नाटक रक्षण वेदिके समेत कुछ संगठनों ने विधान सौधा परिसर में उर्दू उत्सव आयोजित करने पर आपत्ति जताते हुए कार्यक्रम का स्थान बदलने की मांग की।

संगठन का कहना है कि उसे उर्दू भाषा से कोई दुश्मनी नहीं है, लेकिन विधान सौधा जैसे महत्वपूर्ण सरकारी केंद्र में इस तरह का कार्यक्रम आयोजित करने से कन्नड़ और उर्दू बोलने वालों के बीच गलतफहमियां पैदा हो सकती हैं।

विरोध करने वाले संगठनों ने वर्ष 1994 में बेंगलुरु दूरदर्शन पर उर्दू समाचार प्रसारण के दौरान हुए भाषाई दंगों का भी हवाला दिया।

अक्टूबर 1994 में बेंगलुरु दूरदर्शन पर 10 मिनट के उर्दू समाचार शुरू किए गए थे। इसका कुछ कन्नड़ समर्थक संगठनों ने जोरदार विरोध किया था। विरोध के दौरान हिंसा भड़क गई थी, जिसमें 23 लोगों की मौत और 150 से अधिक लोग घायल हुए थे। उस समय उर्दू समाचारों को राजनीतिक लाभ और मुस्लिम वोट बैंक से जोड़कर भी विरोध किया गया था।

अब कुछ कन्नड़ संगठनों ने 32 साल पुराने इस विवाद को मौजूदा ‘उर्दू हब्बा’ से जोड़ना शुरू कर दिया है।

इसी बीच सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने यह दावा भी किया कि उर्दू का कर्नाटक या भारत से कोई संबंध नहीं है और यह एक विदेशी भाषा है। हालांकि, उर्दू का विकास भारतीय उपमहाद्वीप की जमीन पर हुआ और कर्नाटक में भी सदियों से उर्दू भाषा और साहित्य की मजबूत परंपरा रही है।

उर्दू किसी एक धर्म की भाषा नहीं है। इसके विकास में अलग-अलग धर्मों से जुड़े कवियों, लेखकों, साहित्यकारों और कलाकारों का योगदान रहा है। इसी तरह कर्नाटक में मुस्लिम साहित्यकारों, कवियों, पत्रकारों और कलाकारों ने कन्नड़ भाषा और साहित्य को भी समृद्ध किया है।

कर्नाटक की संस्कृति और गौरव को दर्शाने वाला प्रसिद्ध कन्नड़ गीत ‘नित्योत्सव’, जिसे प्रोफेसर के.एस. निसार अहमद ने लिखा था, कर्नाटक और दुनिया भर में रहने वाले कन्नड़ लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। इस गीत का उर्दू अनुवाद भी किया गया है। यह इस बात की मिसाल है कि भाषाएं एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की साझेदार हो सकती हैं।

उर्दू और कन्नड़ के बीच अनुवाद की परंपरा ने दोनों भाषाओं के साहित्यिक संबंधों को और मजबूत किया है। कर्नाटक के उर्दू शायरों ने भी राज्य की संस्कृति, परंपरा और गौरव पर कई कविताएं लिखी हैं। फारसी और उर्दू के कई शब्द आज भी कन्नड़ भाषा में इस्तेमाल होते हैं।

मंत्री यू.टी. खादर ने उर्दू उत्सव के आयोजन स्थल को लेकर उठे विवाद पर कहा है कि विरोध का गंभीरता से जायजा लिया जाएगा और जरूरत पड़ने पर स्थान बदलने की संभावना पर भी विचार किया जाएगा। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से भी स्पष्ट किया गया है कि विधान सौधा में गैर-सरकारी कार्यक्रमों के आयोजन की अनुमति नहीं दी जाएगी।

आखिर सवाल यह है कि क्या किसी भाषा को उसके बोलने वालों के धर्म से जोड़कर देखा जाना चाहिए?

उर्दू हो या कन्नड़, दोनों भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। एक भाषा से प्रेम करने का मतलब दूसरी भाषा से नफरत करना नहीं हो सकता।

भाषाओं के बीच टकराव कभी समाज के हित में नहीं रहा। उर्दू और कन्नड़ के बीच सदियों पुराने साहित्यिक, सांस्कृतिक और भाषाई रिश्तों को मजबूत करना ही कर्नाटक की बहुलतावादी संस्कृति और भाषाई सौहार्द के लिए बेहतर रास्ता है।