जनता की बेचैनी, लोकतंत्र पर सवाल और बदलाव की आहट
वोट के अधिकार से लेकर रोजगार तक, क्या भारत की शासन व्यवस्था में सुधार की जरूरत है?
दिल्ली और मुंबई समेत हिंदुस्तान के मुख्तलिफ शहरों में वोटर लिस्ट के मामले पर एहतिजाज, भर्ती और कॉम्पिटिटिव इम्तिहानात के सिस्टम से परेशान नौजवानों की नाराज़गी, और मुल्क के अलग-अलग हिस्सों में रोज़गार, किसानों के मसाइल, महिलाओं की हिफाज़त और शहरी हुकूक के लिए उठती आवाज़ें एक अहम सवाल खड़ा करती हैं: क्या हिंदुस्तान में जारी ये एहतिजाज सिर्फ अलग-अलग शिकायतें हैं, या किसी बड़ी तब्दीली की शुरुआत का इशारा हैं?
वोटर लिस्ट की नज़र-ए-सानी के खिलाफ एहतिजाज करने वालों को अंदेशा है कि इस अमल में काबिल वोटरों के नाम हटाए जा सकते हैं। वहीं, इलेक्शन कमीशन का कहना है कि वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने के लिए यह अमल ज़रूरी है।
इस इख्तिलाफ का हल सियासी इल्ज़ामात से नहीं, बल्कि शफ़्फ़ाफ़ तरीके-कार, भरोसेमंद आंकड़ों और मुतास्सिरा शहरीयों की शिकायतों के असरदार अज़ाले से होना चाहिए।
क्योंकि वोट सिर्फ इंतिखाबी अमल का हिस्सा नहीं, बल्कि एक शहरी की जम्हूरी आवाज़ है। अगर किसी काबिल वोटर का नाम गलती से लिस्ट से हटा दिया जाए, तो इसका असर सिर्फ एक नाम के हटने तक महदूद नहीं रहता, बल्कि उसके नुमाइंदगी के हक़ को भी मुतास्सिर करता है।
यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि मौजूदा एहतिजाज किसी बड़े इंकलाब की शुरुआत हैं, लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ करना भी दानिशमंदी नहीं होगी।
जब वोट का हक़, तालीम, रोज़गार, मआशी तहफ्फुज़ और इज़हारे-राय की आज़ादी जैसे बुनियादी मसाइल पर सवाल उठने लगें, तो यह बेचैनी सिर्फ चंद अफराद की शिकायत नहीं रहती, बल्कि निज़ाम-ए-हुकूमत की जवाबदेही का सवाल बन जाती है।
वोट का हक़ और वोटर लिस्ट में शफ़्फ़ाफ़ियत
जम्हूरियत की बुनियाद इस भरोसे पर कायम होती है कि हर काबिल शहरी को वोट देने का बराबर मौका मिलेगा।
वोटर लिस्ट को दुरुस्त करना ज़रूरी है, लेकिन इस अमल में शफ़्फ़ाफ़ियत और एहतियात भी उतनी ही अहम हैं।
अगर किसी शहरी का नाम वोटर लिस्ट से हट जाता है, तो उसे वक्त पर इत्तिला, आसानी से एतराज़ दर्ज कराने की सहूलत और जल्द से जल्द गलती सुधारने का मौका मिलना चाहिए।
सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि वोटर लिस्ट को दुरुस्त किया जा रहा है। यह यकीनी बनाना भी ज़रूरी है कि इस अमल में किसी काबिल वोटर का हक़ मुतास्सिर न हो।
वोटर लिस्ट के मामले में असल सवाल यह नहीं कि सरकार या इलेक्शन कमीशन की नीयत क्या है, बल्कि यह है कि पूरा तरीका-ए-कार कितना शफ़्फ़ाफ़, जांच के काबिल और जवाबदेह है।
इलेक्शन कमीशन की जिम्मेदारी है कि वह एतराज़ात का वाज़ेह जवाब दे और गलतियों की इस्लाह को यकीनी बनाए।
वोट का हक़ सिर्फ वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने से महफूज़ नहीं होता। इसके लिए ज़रूरी है कि हर काबिल शहरी आसानी से अपने नाम की तस्दीक कर सके और किसी भी गलती को दुरुस्त करा सके।
इंतिखाबी अमल पर अवाम का भरोसा ही जम्हूरियत की असल ताकत है।
तालीम, इम्तिहानात और नौजवानों का मुस्तकबिल
जहां वोटर लिस्ट में शफ़्फ़ाफ़ियत शहरी के जम्हूरी हक़ से जुड़ी है, वहीं तालीम और भर्ती के सिस्टम की शफ़्फ़ाफ़ियत नौजवानों के मुस्तकबिल से जुड़ी हुई है।
लाखों नौजवान सालों तक मेहनत करके कॉम्पिटिटिव इम्तिहानात की तैयारी करते हैं। उनके खानदान अपनी जमा-पूंजी उनकी तालीम पर खर्च करते हैं।
लेकिन इम्तिहानात में गड़बड़ियों के इल्ज़ाम, पेपर लीक के वाक़ियात, इम्तिहानात का मंसूख होना, नतीजों में देरी और भर्ती प्रक्रिया का लंबे वक्त तक अटके रहना उनकी मेहनत और उम्मीदों को मुतास्सिर करता है।
हर इम्तिहानी विवाद में बदउनवानी साबित नहीं होती, लेकिन जहां गड़बड़ी सामने आए, वहां फौरी और गैर-जानिबदाराना जांच के साथ जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई ज़रूरी है।
इम्तिहान मंसूख करना या भर्ती रोक देना किसी इंतिज़ामी मसले का हल हो सकता है, लेकिन इसकी कीमत उन उम्मीदवारों को नहीं चुकानी चाहिए जिन्होंने ईमानदारी से मेहनत की है।
शफ़्फ़ाफ़ जांच, तयशुदा वक्त पर इम्तिहानात, नतीजों का बरवक्त ऐलान और भरोसेमंद भर्ती सिस्टम मुहैया कराना हुकूमत की बुनियादी जिम्मेदारी है।
तालीम का मकसद सिर्फ डिग्रियां देना नहीं, बल्कि नौजवानों को उनकी सलाहियत के मुताबिक रोज़गार और इज्ज़त के साथ जिंदगी गुज़ारने के मौके देना भी है।
अगर तालीमी निज़ाम रोज़गार की ज़रूरतों के मुताबिक न हो, इम्तिहानात में अनिश्चितता बनी रहे और भर्तियां वक्त पर पूरी न हों, तो नौजवानों में मायूसी बढ़ना फितरी है।
जिस निज़ाम में नौजवान की मेहनत का नतीजा उसकी सलाहियत के बजाय अनिश्चितता पर मुनहसिर हो जाए, वहां भरोसा बहाल करने के लिए सिर्फ दावे नहीं, बल्कि ठोस इस्लाहात की ज़रूरत होती है।
किसान, महिलाएं और मज़हबी आज़ादी
किसान मुल्क के लिए अनाज पैदा करता है, लेकिन पैदावार की लागत, फसल की मुनासिब कीमत, कर्ज़ और मंडी के उतार-चढ़ाव के बीच उसकी आमदनी अनिश्चित रहती है।
कृषि पॉलिसियों की कामयाबी का पैमाना सिर्फ सरकारी ऐलान नहीं, बल्कि किसानों की आमदनी और उनकी जिंदगी में आने वाली हकीकी बेहतरी होनी चाहिए।
इसी तरह महिलाओं की हिफाज़त के लिए कानून और जागरूकता मुहिम अपनी जगह अहम हैं। लेकिन जब तक कानूनों पर असरदार अमल, जल्द इंसाफ और महफूज़ माहौल यकीनी नहीं बनाया जाएगा, तब तक मनचाहे नतीजे हासिल करना मुश्किल है।
महिलाओं की आज़ादी को महदूद करना उनकी हिफाज़त का हल नहीं है। असल मकसद यह होना चाहिए कि महिलाएं बगैर किसी खौफ के तालीम हासिल कर सकें, नौकरी कर सकें और अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी गुज़ार सकें।
हिंदुस्तान का आईनी तसव्वुर मज़हबी तनव्वो और शहरी मुसावात पर कायम है। इसके बावजूद मज़हब और जाति की बुनियाद पर नफरत भरे बयान, शहरीयों की वतनपरस्ती पर सवाल और मज़हबी पहचान की तौहीन करने वाले वाक़ियात समाजी भरोसे को कमज़ोर करते हैं।
टोपी और दाढ़ी, बुर्का और हिजाब किसी शहरी की वफादारी या वतनपरस्ती जांचने का पैमाना नहीं हो सकते।
मज़हबी पहचान की बुनियाद पर किसी को कमतर शहरी समझना आईनी मुसावात के उसूलों के खिलाफ है।
इबादतगाहों के तनाज़े और कानून की यकसां अहमियत
मज़हबी इबादतगाहों से जुड़े तनाज़े में भी एक ही कानूनी उसूल लागू होना चाहिए।
दिसंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इबादतगाहों से जुड़े मुकदमों के सिलसिले में नए मुकदमों के दर्ज होने और ज़ेरे-समा’अत मामलों में असरदार हुक्म जारी करने, जिनमें सर्वे के आदेश भी शामिल हैं, पर आगे की हिदायतों तक रोक लगाई थी।
लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के असरदार लोगों की सरपरस्ती में समाज में नफरत का माहौल बनाए जाने के इल्ज़ाम भी उठते रहे हैं।
मस्जिद हो या मंदिर, किसी भी तनाज़े का फैसला कानून, शवाहिद और अदालती तरीके-कार के मुताबिक होना चाहिए।
इंसाफ पर लोगों का भरोसा तभी कायम रह सकता है, जब कानून का मयार किसी की मज़हबी पहचान या सियासी असर-ओ-रसूख से मुतास्सिर न हो।
इख्तिलाफे-राय गद्दारी नहीं है
जम्हूरियत में हुकूमत से सवाल करना शहरी का हक़ है।
अगर कोई सहाफी बदउनवानी पर सवाल उठाता है, कोई तालिबे-इल्म तालीमी पॉलिसी से इख्तिलाफ करता है, कोई किसान अपने मुतालबात के लिए एहतिजाज करता है या अपोज़िशन हुकूमत के फैसलों पर तनकीद करता है, तो उसका जवाब दलील, तथ्यों और शवाहिद के साथ दिया जाना चाहिए।
कानून तोड़ने की सूरत में कार्रवाई ज़रूरी है, लेकिन सिर्फ हुकूमत को नागवार गुज़रने की वजह से पुरअमन इख्तिलाफ को मुल्क दुश्मनी करार नहीं दिया जा सकता।
ह्यूमन राइट्स वॉच की वर्ल्ड रिपोर्ट 2026 में हिंदुस्तान में सहाफत और पुरअमन इज़हारे-राय के सिलसिले में कानूनी कार्रवाइयों और ऑनलाइन पाबंदियों को लेकर फिक्र का इज़हार किया गया है।
कौमी सलामती और कानून का निफाज़ रियासत की जिम्मेदारी है। लेकिन इनके नाम पर जायज़ इख्तिलाफ की गुंजाइश को महदूद करना जम्हूरी भरोसे को नुकसान पहुंचा सकता है।
इसी तरह, तरक्कीपसंदी, सेक्युलरिज्म और जम्हूरियत की हिमायत का दावा भी तभी भरोसेमंद होगा, जब हुकूक और इंसाफ के उसूल सभी के लिए बराबर हों।
एक तबके के हुकूक के लिए आवाज़ उठाना और दूसरे तबके के हुकूक की पामाली पर खामोश रहना उसूली तज़ाद है।
हालांकि, किसी की नीयत का फैसला सिर्फ उसकी खामोशी या सियासी इख्तिलाफ की बुनियाद पर नहीं करना चाहिए। इसके लिए उसके लगातार रवैये और अमली मौकिफ को देखना ज़रूरी है।
अवामी बेचैनी का जवाब इस्लाह है, खामोशी नहीं
मौजूदा एहतिजाजात का मतलब यह नहीं कि हर आवाज़ को इंकलाब का ऐलान समझ लिया जाए। और न ही हर एहतिजाज को सियासी साज़िश बताकर खारिज कर देना दुरुस्त है।
ज़रूरत मसाइल की संजीदा पहचान और उनके अमली हल की है।
इसके लिए कुछ बुनियादी कदम ज़रूरी हैं:
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वोटर लिस्ट की गलतियों की फौरी इस्लाह और काबिल वोटरों के हुकूक की हिफाज़त।
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इम्तिहानात और भर्ती के अमल में शफ़्फ़ाफ़ियत और तयशुदा वक्त की पाबंदी।
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नौजवानों के लिए रोज़गार के हकीकी मौके पैदा करना।
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किसानों के लिए कारगर और अमली कृषि पॉलिसियां लागू करना।
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महिलाओं के लिए महफूज़ माहौल और जल्द इंसाफ यकीनी बनाना।
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तमाम शहरीयों को बगैर किसी इम्तियाज़ के बराबर आईनी तहफ्फुज़ देना।
शहरीयों और सियासी जमातों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। एहतिजाज पुरअमन और आईनी दायरे में होने चाहिए। इल्ज़ामात शवाहिद पर मबनी होने चाहिए और मुख्तलिफ तबकों के मसाइल को एक-दूसरे के मुकाबले में खड़ा करने के बजाय उन्हें साझा शहरी हुकूक के तौर पर देखा जाना चाहिए।
पायेदार तब्दीली की बुनियाद नफरत नहीं, इंसाफ है; सिर्फ नारे नहीं, अमली इस्लाहात हैं; और खौफ नहीं, बल्कि भरोसा है।
जम्हूरियत सिर्फ वोट डालने का नाम नहीं है। यह उस यकीन का नाम है कि शहरी का वोट महफूज़ रहेगा, उसकी मेहनत का हक़ बर्बाद नहीं होगा, उसके सवाल को गद्दारी नहीं कहा जाएगा और उसकी मज़हबी पहचान उसके शहरी हुकूक के रास्ते में रुकावट नहीं बनेगी।
इक्तिदार के लिए सबसे बड़ा खतरा अवाम का सवाल नहीं, बल्कि उस सवाल को सुनने से इनकार करना है।
वोटर लिस्ट में नाम की गलती हो या इम्तिहान में गड़बड़ी, दोनों का नुकसान उस वक्त कई गुना बढ़ जाता है, जब शहरी को इस्लाह के बजाय इनकार, वज़ाहत के बजाय खामोशी और इंसाफ के बजाय इंतजार मिलता है।
याद रखना चाहिए कि अवाम का भरोसा किसी सरकारी ऐलान से पैदा नहीं होता, बल्कि मुंसिफाना अमल से हासिल किया जाता है।
अगर काबिल वोटर को अपने वोट की हिफाज़त, नौजवान को अपनी मेहनत के सही नतीजे और शहरी को अपने हुकूक की हिफाज़त का यकीन नहीं रहेगा, तो तरक्की के बड़े-बड़े दावे भी इस कमी को पूरा नहीं कर पाएंगे।
तारीख में इक्तिदार की ताकत का फैसला उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके एहतिसाब और जवाबदेही से होता है।
अवाम की बेचैनी को दबाने से मसाइल खत्म नहीं होते, बल्कि वे अगली बार सामने आने तक इंतजार करते हैं।
असल दानिशमंदी इसी में है कि अवाम की आवाज़ को संकट बनने से पहले सुना जाए। क्योंकि जब अवाम का भरोसा टूटता है, तो सिर्फ फैसले बदलने से काम नहीं चलता, बल्कि पूरे निज़ाम-ए-हुकूमत के तरीके में तब्दीली की ज़रूरत पड़ती है।
लेखक: शरफुद्दीन सैयद, बेंगलुरु

