चुनावी वादों से आगे बढ़कर हुक़ूक़, तरक़्क़ी और सियासी नुमाइंदगी को तवज्जो देने की ज़रूरत
जम्हूरियत में वोट अवाम की सबसे बड़ी ताक़त है। इसी ताक़त के ज़रिए लोग अपने नुमाइंदों का चुनाव करते हैं और हुकूमत बनाने में अहम किरदार अदा करते हैं। लेकिन हिंदुस्तान की सियासत में बार-बार एक सवाल उठता है कि क्या मुसलमान सिर्फ़ चुनाव के वक़्त वोट देने वाली बिरादरी हैं, या उन्हें भी मुल्क की तरक़्क़ी, सियासी फ़ैसलों और सरकारी मामलों में बराबर के मौक़े और मुनासिब नुमाइंदगी हासिल करने का हक़ है?
हिंदुस्तान का संविधान तमाम नागरिकों को बराबरी, आज़ादी और इंसाफ़ के उसूलों की ज़मानत देता है। मुसलमान भी इस मुल्क के बराबर हुक़ूक़ रखने वाले नागरिक हैं। हिंदुस्तान की तारीख़, तहज़ीब, तालीम, तिजारत और क़ौमी तामीर में मुस्लिम बिरादरी का अहम किरदार रहा है। इसलिए उनके हुक़ूक़, तरक़्क़ी और सियासी शिरकत पर बातचीत करना जम्हूरी नज़रिए से ज़रूरी है।
चुनाव के वक़्त वादे, बाद में जवाबदेही कहां?
चुनाव क़रीब आते ही सियासी पार्टियां अवाम के बीच पहुंचती हैं और तरह-तरह के वादे करती हैं। सड़कों, पीने के पानी, तालीम, सेहत, रोज़गार और बुनियादी सहूलतों को बेहतर बनाने की यक़ीन-दहानियां कराई जाती हैं। मुस्लिम आबादी वाले इलाक़ों में भी इस तरह के वादे किए जाते हैं।
लेकिन चुनाव ख़त्म होने के बाद यह देखना ज़रूरी है कि उन वादों पर कितना अमल हुआ। क्या नौजवानों के लिए रोज़गार के मौक़े बढ़े? क्या तालीमी सहूलतों में बेहतरी आई? क्या ज़रूरतमंद परिवारों को सरकारी फ़लाही स्कीमों का फ़ायदा मिला? क्या अवामी नुमाइंदे अपने हलक़ों के मसाइल हल करने के लिए संजीदगी से कोशिश कर रहे हैं?
ये सवालात किसी एक सियासी पार्टी तक महदूद नहीं हैं। अवाम के वोटों से सत्ता हासिल करने वाली तमाम पार्टियों और चुने हुए नुमाइंदों की ज़िम्मेदारी है कि वे अपने वादों और कारगुज़ारी के बारे में लोगों को जवाब दें। चुनावी वादों पर अमली इक़दाम ही अवाम के भरोसे को मज़बूत बना सकते हैं।
सियासी नुमाइंदगी को भी मिलनी चाहिए अहमियत
चुनाव में वोट देना एक बात है, जबकि सियासी फ़ैसलों और सरकारी मामलों में मुनासिब नुमाइंदगी हासिल करना दूसरी अहम बात है। अगर किसी बिरादरी की हिमायत को सियासी तौर पर अहम समझा जाता है, तो उसके मसाइल और मुतालबात को पॉलिसी बनाने के दौरान भी मुनासिब तवज्जो मिलनी चाहिए।
मक़ामी इदारों, म्युनिसिपल कॉरपोरेशन, विधानसभा, संसद और सियासी तंजीमों में क़ाबिल और सलाहियत रखने वाले मुस्लिम उम्मीदवारों को भी मौक़े दिए जाने चाहिए। उम्मीदवारों के चुनाव और अहम ज़िम्मेदारियों की तक़सीम में मुख़्तलिफ़ तबक़ों की मुनासिब नुमाइंदगी को ध्यान में रखना सियासी पार्टियों की ज़िम्मेदारी है।
इसके साथ ही मुस्लिम बिरादरी को भी तालीम, ईमानदारी, अवामी ख़िदमत और इंतिज़ामी सलाहियत रखने वाली क़ियादत तैयार करने पर तवज्जो देनी चाहिए। सियासी नुमाइंदगी का मक़सद सिर्फ़ ओहदा हासिल करना नहीं, बल्कि अवाम के मसाइल हल करना और उनकी ज़िंदगी में सकारात्मक बदलाव लाना होना चाहिए।
तालीम और रोज़गार तरक़्क़ी की बुनियाद हैं
किसी भी बिरादरी की तरक़्क़ी के लिए मयारी तालीम और मआशी ख़ुदमुख़्तारी बुनियादी अहमियत रखती है। मुस्लिम नौजवानों के लिए बेहतर तालीमी मौक़े, हुनरमंदी की ट्रेनिंग, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, कारोबार करने की सलाहियत को बढ़ावा देना और रोज़गार के मौक़ों में इज़ाफ़ा करना ज़रूरी है।
हुकूमतों और अवामी नुमाइंदों को चाहिए कि ज़रूरतमंद तलबा तक तालीमी सहूलतें पहुंचाने के लिए असरदार इक़दाम करें। हुनरमंदी के प्रोग्राम, रोज़गार से जुड़ी रहनुमाई और फ़लाही स्कीमों का फ़ायदा हक़दार लोगों तक पहुंचाया जाए।
इसी तरह बिरादरी को भी ख़वातीन को बा-इख़्तियार बनाने, बच्चों की तालीम, नौजवानों की रहनुमाई और कारोबारी सरगर्मियों को बढ़ावा देने को तरजीह देनी चाहिए।
तरक़्क़ी सिर्फ़ तक़रीरों और चुनावी नारों तक महदूद नहीं रहनी चाहिए। जब आम लोगों का मयार-ए-ज़िंदगी बेहतर हो, नौजवानों को अच्छे मौक़े मिलें और परिवारों की मआशी हालत में सुधार आए, तभी तरक़्क़ी के असल नतीजे सामने आते हैं।
वोट की ताक़त और नागरिकों की ज़िम्मेदारी
मुसलमानों समेत तमाम नागरिकों को उम्मीदवार की ईमानदारी, कारगुज़ारी, अवामी मसाइल के प्रति संजीदगी और संवैधानिक उसूलों से वाबस्तगी को ध्यान में रखते हुए अपने वोट का इस्तेमाल करना चाहिए।
किसी भी सियासी पार्टी की हिमायत करने से पहले उसकी पॉलिसियों, कारगुज़ारी और चुनावी वादों पर अमल का जायज़ा लेना ज़रूरी है।
अवामी नुमाइंदों से सवाल करना, तरक़्क़ियाती कामों की जानकारी हासिल करना और लोगों के मसाइल हल करने का मुतालबा करना नागरिकों का हक़ है। जम्हूरियत सिर्फ़ वोट डालने का नाम नहीं, बल्कि चुनाव के बाद भी चुने हुए नुमाइंदों को जवाबदेह बनाए रखने का नाम है।
मुस्लिम बिरादरी को एक ऐसी इकाई समझना भी सही नहीं है जिसकी सियासी राय हमेशा एक जैसी हो। बिरादरी के अंदर मुख़्तलिफ़ ख़यालात, तरजीहात और सियासी नज़रिए पाए जाते हैं। हर नागरिक को अपनी समझ और आज़ादाना राय के मुताबिक़ सियासी फ़ैसला करने का हक़ हासिल है।
वोट बैंक नहीं, बराबर हुक़ूक़ रखने वाले नागरिक
मुसलमान किस सियासी पार्टी को वोट देते हैं, उससे ज़्यादा अहम सवाल यह है कि अवाम की हिमायत हासिल करने के बाद उनके मसाइल हल करने के लिए क्या इक़दाम किए जाते हैं। सियासी पार्टियों को तमाम नागरिकों के हुक़ूक़, तहफ़्फ़ुज़ और तरक़्क़ी को अपनी जम्हूरी ज़िम्मेदारी समझना चाहिए।
मुस्लिम बिरादरी को भी अपने मसाइल के लिए आवाज़ उठाने के साथ-साथ तालीम, मआशी तरक़्क़ी, समाजी हम-आहंगी, सियासी शऊर और संवैधानिक हुक़ूक़ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए लगातार कोशिश करनी चाहिए।
मुसलमान महज़ वोट बैंक नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के बराबर हुक़ूक़ रखने वाले नागरिक हैं। उनकी इज़्ज़त, तरक़्क़ी, तहफ़्फ़ुज़ और सियासी शिरकत भी उतनी ही अहम है जितनी दूसरे नागरिकों की।
जम्हूरियत की कामयाबी सिर्फ़ हक़-ए-रायदेही में नहीं, बल्कि इस बात में भी है कि हर नागरिक को तरक़्क़ी में हिस्सा लेने, अपनी राय का इज़हार करने और सरकारी फ़ैसलों तक अपनी आवाज़ पहुंचाने का मुनासिब मौक़ा मिले।
इस मज़मून का मक़सद किसी सियासी पार्टी या मज़हबी बिरादरी को निशाना बनाना नहीं, बल्कि बराबर हुक़ूक़, इंसाफ़ पर आधारित सियासी नुमाइंदगी, तरक़्क़ी और अवामी नुमाइंदों की जवाबदेही के बारे में सकारात्मक अवामी बहस को बढ़ावा देना है।
लेखक: शब्बीर अहमद
Source: Haqeeqat Times

