मुसलमानों का एहसास-ए-तहफ़्फ़ुज़ और राष्ट्रीय धारा में प्रभावी भागीदारी
इख़्तिलाफ़-ए-राय को दबाने से मसाइल हल नहीं होते
हिंदुस्तानी जम्हूरियत में एहतिजाज यानी विरोध सिर्फ़ हुकूमत से इख़्तिलाफ़ का इज़हार नहीं, बल्कि अवाम के हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त, हुक्मरानों की जवाबदेही तय करने और जनता के मसाइल की तरफ़ तवज्जो दिलाने का एक अहम आईनी ज़रिया भी है। जम्हूरियत की मज़बूती सिर्फ़ चुनाव कराने से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि नागरिकों को अपने मुतालबात पेश करने, सरकारी पॉलिसियों पर सवाल उठाने और पुरअमन तरीके से अपनी मुख़ालफ़त ज़ाहिर करने की कितनी आज़ादी हासिल है।
जब एहतिजाज करने वालों की बात सुनने के बजाय उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाती है, तो सवाल उठता है कि क्या इख़्तिलाफ़-ए-राय को दबाने से मसाइल हल हो सकते हैं? हाल के बरसों में छात्रों, नौजवानों, किसानों और समाजी कारकुनों की तहरीकों ने इस सवाल को बार-बार सामने रखा है।
चुनावी शफ़्फ़ाफ़ियत पर सवाल उठाना जम्हूरी हक़
चीफ़ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ चुनावी शफ़्फ़ाफ़ियत की माँग को लेकर दिल्ली में होने वाला एहतिजाज भी इसी बड़ी बहस का हिस्सा है। वोटर लिस्ट में नज़र-ए-सानी, चुनावी अमल और इलेक्शन कमीशन की जवाबदेही जैसे मामलों पर सवाल उठाना जम्हूरी निज़ाम का हिस्सा है।
इन सवालों का फ़ैसला सियासी नारों या जज़्बात के बजाय हक़ायक़, शवाहिद और आईनी उसूलों की रोशनी में होना चाहिए। अगर किसी एहतिजाज में क़ानून की ख़िलाफ़वर्ज़ी होती है, तो क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन पुरअमन एहतिजाज और ग़ैरक़ानूनी सरगर्मियों के बीच फ़र्क़ बनाए रखना ज़रूरी है।
इंतज़ामिया की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ अमन-ओ-अमान क़ायम रखना नहीं, बल्कि नागरिकों के आईनी हुक़ूक़ का एहतराम करना भी है।
राष्ट्रीय मुद्दों पर मुस्लिम नौजवानों की शिरकत कम क्यों दिखाई देती है?
इस बहस का एक अहम पहलू हिंदुस्तानी मुसलमानों की शिरकत है। चुनावी शफ़्फ़ाफ़ियत, रोज़गार, महंगाई, तालीम, इम्तिहान के निज़ाम में ख़राबियां और नौजवानों के मुस्तक़बिल जैसे मसाइल किसी एक मज़हब या बिरादरी तक महदूद नहीं हैं। इनका असर तमाम नागरिकों पर पड़ता है।
इसके बावजूद, जब ऐसे राष्ट्रीय मुद्दों पर एहतिजाज होते हैं, तो उनमें मुस्लिम छात्रों और नौजवानों की शिरकत अक्सर बहुत कम दिखाई देती है। यह सिर्फ़ तादाद का मसला नहीं, बल्कि इस सवाल से भी जुड़ा है कि क्या मुसलमान ख़ुद को मुल्क की जम्हूरी जद्दोजहद का बराबर का शरीक समझते हैं? क्या वे अपने हुक़ूक़ के लिए आवाज़ उठाने में एतमाद महसूस करते हैं, या किसी संभावित कार्रवाई और रद्द-ए-अमल के ख़ौफ़ से पीछे हट जाते हैं?
इस सवाल का जवाब तलाश करने के लिए मुसलमानों की समाजी, सियासी और मआशी सूरत-ए-हाल को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। पिछले कई दशकों के तजुर्बात ने कुछ तबक़ों में अदम तहफ़्फ़ुज़ और सियासी बेएतमादी के एहसास को गहरा किया है।
किसी एहतिजाज में शिरकत के बाद क़ानूनी कार्रवाई का ख़दशा, समाजी मुख़ालफ़त, ख़ानदान की फ़िक्र और रोज़गार या तालीमी मुस्तक़बिल के बारे में अंदेशे भी नौजवानों को एहतियात बरतने पर मजबूर करते हैं। इसके अलावा, सियासी क़ियादत पर भरोसे की कमी और मुश्तरका जद्दोजहद के लिए असरदार प्लेटफ़ॉर्म का फ़ुक़दान भी अहम वजहें हो सकती हैं।
हालाँकि, सभी मुसलमानों की कम शिरकत को किसी एक वजह से जोड़ना सही नहीं होगा। मुख़्तलिफ़ इलाक़ों, तबक़ों और तालीमी पृष्ठभूमि रखने वाले नौजवानों के तजुर्बात अलग-अलग हो सकते हैं।
एहतियात और पूरी तरह किनारा कर लेना एक जैसी बातें नहीं
ऐसे हालात में यह समझना ज़रूरी है कि एहतियात बरतना और हर मामले से पूरी तरह किनारा कर लेना दो अलग बातें हैं। हर एहतिजाज में शामिल होना ज़रूरी नहीं, लेकिन हर अवामी मसले से लाताल्लुक़ रहना भी मुनासिब नहीं है।
नागरिकों को यह हक़ हासिल है कि वे एहतिजाज के मक़सद, उसके मुंतज़िमीन, तरीक़ा-ए-कार और संभावित नतीजों का जायज़ा लेकर अपनी राय क़ायम करें। अगर मुतालबात जायज़ हों और जद्दोजहद पुरअमन व आईनी हो, तो उसमें शिरकत जम्हूरी ज़िम्मेदारी निभाने का ज़रिया बन सकती है।
इख़्तिलाफ़ की सूरत में भी दलील, बातचीत और क़ानूनी तरीक़ों के ज़रिए अपना मौक़िफ़ पेश किया जा सकता है। जम्हूरियत में एक सक्रिय नागरिक होने का मतलब किसी सियासी पार्टी या तहरीक का बग़ैर सोचे-समझे हिमायती बनना नहीं, बल्कि अपने और दूसरों के हुक़ूक़ के बारे में शऊर रखना है।
हार्दिक पटेल का सियासी सफ़र क्या बताता है?
गुजरात की पाटीदार तहरीक से उभरने वाले हार्दिक पटेल का सियासी सफ़र भी एहतिजाजी सियासत और सियासी निज़ाम के ताल्लुक़ की एक मिसाल है। नौजवानों की तहरीक से पहचान बनाने वाले हार्दिक बाद में बीजेपी में शामिल हुए और विधायक बने।
उनकी मिसाल यह याद दिलाती है कि एहतिजाजी सियासत से उभरने वाले लीडर वक़्त के साथ सियासी निज़ाम का हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन किसी लीडर के सियासी सफ़र से यह साबित नहीं होता कि तहरीक के तमाम मुतालबात पूरे हो गए हैं।
असल अहमियत इस बात की है कि नौजवानों के रोज़गार, तालीम और समाजी इंसाफ़ जैसे बुनियादी मसाइल पर क्या पेशरफ़्त हुई। इसलिए किसी तहरीक का जायज़ा सिर्फ़ शख़्सियतों के सियासी सफ़र से नहीं, बल्कि उसके मक़सद और नतीजों की बुनियाद पर लिया जाना चाहिए।
मुस्लिम नौजवानों को कैसी रहनुमाई की ज़रूरत है?
मुस्लिम नौजवानों के सामने एक और उलझन मज़हबी और समाजी रहनुमाओं के मुख़्तलिफ़ मशवरों की है। कुछ रहनुमा उन्हें अवामी एहतिजाज में शामिल होने और अपने हुक़ूक़ के लिए आवाज़ उठाने की तरग़ीब देते हैं, जबकि कुछ दूसरे उन्हें ऐसे इज्तिमाओं से दूर रहने का मशवरा देते हैं।
इन मुख़्तलिफ़ राय के पीछे अलग-अलग ख़दशात और तरजीहात हो सकती हैं। इसलिए हर इख़्तिलाफ़ को सिर्फ़ सही और ग़लत के दो ख़ानों में बाँटना मुनासिब नहीं है।
नौजवानों को ऐसी रहनुमाई ज़रूर मिलनी चाहिए जो उन्हें ख़ौफ़ज़दा करने या जज़्बात में बहाने के बजाय सोच-समझकर फ़ैसला करने के क़ाबिल बनाए।
मज़हबी रहनुमा और समाजी इदारे मुसलमानों की मज़हबी व अख़लाक़ी ज़िंदगी में अहम किरदार अदा करते हैं। उन्हें चाहिए कि वे नौजवानों को संविधान, शहरी हुक़ूक़, क़ानून की पाबंदी, पुरअमन एहतिजाज और जम्हूरी ज़िम्मेदारियों के बारे में भी आगाह करें।
अगर किसी एहतिजाज में शिरकत मुनासिब नहीं है, तो उसकी वजहें साफ़ की जानी चाहिए। और अगर किसी जायज़ मुतालबे की हिमायत ज़रूरी है, तो उसके पुरअमन और क़ानूनी तरीक़े बताए जाने चाहिए। सिर्फ़ एहतिजाज से रोक देना या हर तहरीक में शामिल होने की तलक़ीन करना काफ़ी नहीं है। नौजवानों को अपने फ़ैसले ख़ुद करने के लिए इल्म, एतमाद और तन्क़ीदी शऊर की ज़रूरत है।
फ़िल्म ‘गर्म हवा’ और आज के मुसलमानों के लिए पैग़ाम
इस पूरे मामले को समझने के लिए तक़रीबन आधी सदी पुरानी फ़िल्म ‘गर्म हवा’ की मिसाल ख़ास अहमियत रखती है। एम.एस. सथ्यू की हिदायत में बनी इस फ़िल्म में तक़सीम-ए-हिंद के बाद हिंदुस्तान में रह जाने वाले एक मुस्लिम ख़ानदान की बेयक़ीनी, मआशी परेशानियों और समाजी तन्हाई को पेश किया गया है।
फ़िल्म में सलीम मिर्ज़ा और उसका ख़ानदान ऐसे हालात से गुज़रता है, जहाँ मुस्तक़बिल अनिश्चित दिखाई देता है। पाकिस्तान हिजरत करने का ख़याल भी इसी बेचैनी और मायूसी के माहौल में पैदा होता है।
लेकिन फ़िल्म में सलीम मिर्ज़ा के बेटे सिकंदर का फ़ैसला कहानी को एक अहम मोड़ देता है। वह रोज़गार के मुतालबे के लिए एहतिजाज करने वाले नौजवानों के जुलूस में शामिल होता है। इस मंज़र में उसकी ज़ाती महरूमी सामूहिक जद्दोजहद से जुड़ जाती है।
सिकंदर का किरदार आज के हिंदुस्तानी मुसलमानों के सामने एक अहम सवाल रखता है: जब मआशी परेशानियाँ, इम्तियाज़ी रवैया या अदम तहफ़्फ़ुज़ का एहसास बढ़ता है, तो क्या रास्ता अपनाया जाए? क्या समाज से अलग हो जाना और ख़ुद को राष्ट्रीय मसाइल से दूर रखना इसका हल है, या दूसरे नागरिकों के साथ मिलकर अपने हुक़ूक़ और बेहतर मुस्तक़बिल के लिए आवाज़ उठाना ज़्यादा असरदार रास्ता हो सकता है?
फ़िल्म यह नहीं कहती कि तमाम इख़्तिलाफ़ात और परेशानियाँ सिर्फ़ एक जुलूस में शामिल होने से ख़त्म हो जाती हैं। इसका बुनियादी पैग़ाम यह है कि मायूसी और तन्हाई के मुक़ाबले में सामूहिक अमल इंसान को उम्मीद, मक़सद और अपने मुस्तक़बिल पर असर डालने का हौसला दे सकता है।
यही वह रिश्ता है जो ‘गर्म हवा’ की मिसाल को आज की एहतिजाजी सियासत से जोड़ता है। सिकंदर का रोज़गार के लिए एहतिजाज में शामिल होना इस बात की निशानी है कि उसकी तरजीहात सिर्फ़ ज़ाती बक़ा या हिजरत के ख़याल तक महदूद नहीं रहतीं, बल्कि वह उसी समाज में अपना मुस्तक़बिल बेहतर बनाने की कोशिश करता है जहाँ वह रहता है।
आज मुस्लिम नौजवान भी तालीम, नौकरी, इम्तिहान के निज़ाम में शफ़्फ़ाफ़ियत, महंगाई और शहरी हुक़ूक़ जैसे मामलों में दूसरे नौजवानों के साथ मिलकर जद्दोजहद कर सकते हैं। इसका मतलब अपने ख़ास मसाइल को नज़रअंदाज़ करना नहीं, बल्कि उन्हें इंसाफ़, बराबर के मौक़ों और राष्ट्रीय तरक़्क़ी की व्यापक बहस का हिस्सा बनाना है।
राष्ट्रीय धारा में शिरकत से बढ़ सकती है आपसी समझ
जब मुस्लिम नौजवान मुश्तरका मसाइल पर दूसरे नागरिकों के साथ खड़े होते हैं, तो उन्हें अपने मुतालबात के लिए व्यापक हिमायत हासिल करने का मौक़ा मिलता है। ऐसी शिरकत से ग़लतफ़हमियाँ दूर करने और समाज के मुख़्तलिफ़ तबक़ों के बीच राब्ते बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
इसके बरअक्स, अगर कोई बिरादरी लगातार अलग-थलग रहे, तो उसके मसाइल के अवामी बहस में कम नुमायां होने का ख़दशा रहता है।
अलबत्ता, यह बात भी तस्लीम करनी चाहिए कि राष्ट्रीय धारा में शामिल होने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मुसलमानों पर नहीं डाली जा सकती। सियासी पार्टियों, शहरी तंज़ीमों और जम्हूरी इदारों को भी ऐसा माहौल फ़राहम करना होगा, जहाँ हर नागरिक की शिरकत का एहतराम हो और किसी को मज़हबी पहचान की वजह से निशाना बनाए जाने का ख़ौफ़ न हो।
मनमोहन सिंह का बयान और बराबर के मौक़ों का सवाल
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 9 दिसंबर 2006 को राष्ट्रीय विकास परिषद से ख़िताब करते हुए इस बात पर ज़ोर दिया था कि तरक़्क़ी के फ़ायदे अक़ल्लियतों, ख़ास तौर पर मुसलमानों तक भी इंसाफ़ के साथ पहुँचने चाहिए।
इस मौक़िफ़ का बुनियादी नुक़्ता यह था कि तरक़्क़ी के मौक़ों और उसके फ़ायदों से कोई भी तबक़ा महरूम न रहे। इस तसव्वुर को किसी एक बिरादरी की बरतरी या दूसरों के हुक़ूक़ पर फ़ौक़ियत के तौर पर नहीं, बल्कि बराबर के मौक़ों और इंसाफ़ पर आधारित शमूलियत के उसूल के तौर पर समझना चाहिए।
अगर किसी तबक़े को तालीम, रोज़गार या तरक़्क़ी के मौक़ों में रुकावटों का सामना हो, तो उनकी निशानदेही और इस्लाह पूरे मुल्क के मुफ़ाद में है। इस बयान को दक्षिणपंथी हलक़ों ने सियासी रंग देने की कोशिश की थी।
मुसलमानों की शिरकत के साथ हुकूमत की ज़िम्मेदारी भी अहम
यहाँ मुसलमानों की शहरी शिरकत और रियासत की ज़िम्मेदारी, दोनों को एक साथ देखना ज़रूरी है। एक तरफ़ मुसलमानों को अपने हुक़ूक़ के लिए क़ानूनी और जम्हूरी तरीक़ों से आवाज़ उठानी चाहिए, तो दूसरी तरफ़ हुकूमतों और इदारों पर भी लाज़िम है कि वे इम्तियाज़ से पाक पॉलिसियाँ और इंसाफ़ पर आधारित मौक़े यक़ीनी बनाएं।
सिर्फ़ यह कहना काफ़ी नहीं कि मुसलमान राष्ट्रीय धारा में शामिल हों। यह भी ज़रूरी है कि राष्ट्रीय धारा उनके लिए खुली, इंसाफ़ पर आधारित और भरोसे के क़ाबिल हो। शिरकत और एतमाद एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
जब नागरिक महसूस करते हैं कि उनकी आवाज़ सुनी जाती है और उनके हुक़ूक़ महफ़ूज़ हैं, तो जम्हूरी अमल में उनकी दिलचस्पी और शिरकत बढ़ने के इमकान पैदा होते हैं।
मुसलमानों की राष्ट्रीय धारा में शिरकत सिर्फ़ चुनावी सियासत या एहतिजाज तक महदूद नहीं रहनी चाहिए। तालीमी इदारों, शहरी तंज़ीमों, सहाफ़त, क़ानूनी जद्दोजहद, मुक़ामी मसाइल और अवामी बहस में उनकी मौजूदगी भी अहम है।
नौजवान अपने मोहल्लों में तालीमी सहूलतों, सफ़ाई, पानी, सेहत, रोज़गार और शहरी सेवाओं जैसे मामलों पर काम करके भी शहरी शऊर का मुज़ाहिरा कर सकते हैं। छात्र इम्तिहान के निज़ाम में शफ़्फ़ाफ़ियत और तालीमी मौक़ों के लिए आवाज़ उठा सकते हैं, जबकि पेशेवर अफ़राद अपनी सलाहियतों और तजुर्बात को समाज की बेहतरी के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।
ऐसी शिरकत धीरे-धीरे एतमाद पैदा करती है और जम्हूरियत को रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़ती है।
क़ौमी यकजहती का मतलब अपनी पहचान छोड़ना नहीं
क़ौमी यकजहती का मतलब अपनी मज़हबी और सक़ाफ़ती पहचान को छोड़ देना नहीं, बल्कि अपनी पहचान के साथ मुश्तरका शहरी ज़िम्मेदारियाँ निभाना है।
हिंदुस्तानी मुसलमान इस मुल्क की तारीख़, तहज़ीब और आईनी निज़ाम का हिस्सा हैं। उन्हें अपने हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त के साथ मुल्क के सामूहिक मसाइल के हल में भी किरदार अदा करना चाहिए।
इसी तरह दूसरे नागरिकों और इदारों को भी मुसलमानों की जायज़ आवाज़, उनके ख़दशात और उनकी शिरकत को क़ुबूल करने का रवैया अपनाना होगा। यकजहती एकतरफ़ा मुतालबा नहीं, बल्कि बाहमी एहतराम, इंसाफ़ और बराबर की शहरी हैसियत से मज़बूत होती है।
आख़िरकार, सवाल शिरकत और शहरी शऊर का है
आख़िरकार, सवाल यह नहीं है कि मुसलमान हर एहतिजाज में शामिल हों या हर तहरीक से दूर रहें। असल सवाल यह है कि वे अपने शहरी हुक़ूक़, सामूहिक मुफ़ाद और आईनी ज़िम्मेदारियों के बारे में कितना शऊर रखते हैं और उनकी बुनियाद पर कितने असरदार फ़ैसले करते हैं।
ख़ौफ़ और एहसास-ए-कमतरी से निकलने का मतलब ख़तरों को नज़रअंदाज़ करना नहीं, बल्कि इल्म, तैयारी, इत्तिहाद और क़ानूनी रास्तों के ज़रिए उनका मुक़ाबला करना है। ‘गर्म हवा’ का सिकंदर इसी वजह से याद रह जाता है कि वह मायूसी और किनाराकशी के बजाय सामूहिक जद्दोजहद का रास्ता अपनाता है।
हिंदुस्तानी मुसलमानों को भी अपने मसाइल को राष्ट्रीय मसाइल से अलग समझने के बजाय इंसाफ़, रोज़गार, तालीम, चुनावी शफ़्फ़ाफ़ियत और बराबर के मौक़ों के लिए होने वाली मुश्तरका जद्दोजहद में सक्रिय किरदार अदा करना चाहिए।
हर एहतिजाज में शामिल होना ज़रूरी नहीं, लेकिन जायज़ मुतालबात की हिमायत, नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ पुरअमन आवाज़ उठाना और मुल्क के मुस्तक़बिल की तश्कील में हिस्सा लेना एक जम्हूरी नागरिक का तक़ाज़ा है।
वतन से वाबस्तगी सिर्फ़ नारों या जज़्बात के इज़हार से साबित नहीं होती, बल्कि मुल्क की बेहतरी, इंसाफ़ के क़याम और मुश्तरका मुस्तक़बिल की तामीर में अमली हिस्सा लेने से भी ज़ाहिर होती है।
लेखक: जावेद जमालुद्दीन
Source: Haqeeqat Times

