इज़राइल में 27 अक्टूबर को आम चुनाव के लिए नागरिक मतदान करेंगे। गाज़ा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ युद्ध, लेबनान और ईरान के साथ सैन्य संघर्षों के बाद हो रहे इस चुनाव में 26वीं नेसेट (इज़राइली संसद) के सदस्यों का चुनाव किया जाएगा।

इज़राइल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे हैं। वह भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़े मुकदमों का सामना भी कर रहे हैं, हालांकि उन्होंने इन आरोपों को खारिज किया है।

नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसके नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी गठबंधन, यहूदी नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के साथ कड़ी टक्कर में है। इज़राइल की 120 सदस्यीय संसद में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना फिलहाल कम दिखाई दे रही है।

इज़राइल के केंद्रीय चुनाव आयोग के मुताबिक, 18 साल या उससे अधिक उम्र के करीब 73 लाख नागरिक मतदान के पात्र हैं। अधिकतर मतदान केंद्र सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक खुले रहेंगे। मतदान केंद्र बंद होने के समय तक कतार में खड़े सभी मतदाताओं को वोट डालने का मौका मिलेगा। चुनाव के दिन राष्ट्रीय अवकाश रहेगा।

इज़राइल में संसद में प्रवेश के लिए किसी पार्टी को कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करना जरूरी है। संसद का कार्यकाल चार साल का होता है, जबकि प्रधानमंत्री के लिए कोई निश्चित कार्यकाल सीमा नहीं है।

मतदान कैसे होता है?

इज़राइल में मतदाता किसी उम्मीदवार को सीधे वोट देने के बजाय राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं।

सरकार बनाने के लिए 120 में से कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी है। इज़राइल के इतिहास में अब तक किसी एक पार्टी ने अपने दम पर स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं किया है।

चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी को अपने आप सरकार बनाने का अधिकार नहीं मिल जाता। पार्टियों को 61 सीटों का बहुमत जुटाने के लिए गठबंधन बनाने का मौका दिया जाता है। इसके लिए 28 दिन का समय मिलता है, जिसे अधिकतम 14 दिन और बढ़ाया जा सकता है। अगर कोई भी पक्ष सरकार बनाने में सफल नहीं होता, तो देश में दोबारा चुनाव कराए जा सकते हैं।

संसद की सीटों का बंटवारा पार्टियों को मिले राष्ट्रीय वोट प्रतिशत के आधार पर होता है। उदाहरण के लिए, किसी पार्टी को 30 प्रतिशत वोट मिलने पर उसे लगभग 30 प्रतिशत सीटें मिल सकती हैं।

जो पार्टियां 3.25 प्रतिशत वोटों की सीमा पार नहीं कर पातीं, उन्हें संसद में सीटें नहीं मिलतीं। इसी वजह से छोटी पार्टियां अक्सर चुनाव से पहले एकजुट होकर साझा सूची तैयार करती हैं।

किसे वोट देने का अधिकार है और किसे नहीं?

इस चुनाव में करीब 73 लाख इज़राइली नागरिक मतदान कर सकते हैं। लेकिन इज़राइल के नियंत्रण में रहने वाले सभी वयस्कों को इस चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं है।

गाज़ा, कब्जे वाले वेस्ट बैंक और कब्जे वाले पूर्वी यरुशलम में रहने वाले करीब 30 लाख वयस्क फिलिस्तीनियों को उस सरकार के चुनाव में मतदान का अधिकार नहीं है, जो उनकी सीमाओं, आवाजाही और कानूनी स्थिति को प्रभावित करती है।

यहूदी इज़राइली नागरिकों के साथ-साथ करीब 12 लाख फिलिस्तीनी मूल के इज़राइली नागरिक भी वोट डाल सकते हैं। इसके अलावा, कब्जे वाले वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में रहने वाले 75,000 से अधिक वयस्क इज़राइली बस्तियों के निवासी भी मतदान कर सकते हैं।

इस स्थिति के कारण वेस्ट बैंक में एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। वहां इज़राइली बस्तियों में रहने वाले नागरिक संसद के चुनाव में वोट डाल सकते हैं, जबकि उसी इलाके में इज़राइली सैन्य नियंत्रण के तहत रहने वाले पड़ोसी फिलिस्तीनी परिवारों को यह अधिकार नहीं है।

पूर्वी यरुशलम में रहने वाले अधिकांश फिलिस्तीनियों के पास इज़राइली नागरिकता नहीं है। उन्हें स्थायी निवासी का दर्जा प्राप्त है। वे यरुशलम नगर निगम के चुनाव में वोट डाल सकते हैं, लेकिन नेसेट यानी इज़राइली संसद के चुनाव में मतदान नहीं कर सकते।

इज़राइल में आम नागरिकों के लिए सामान्य डाक मतपत्र यानी एब्सेंटी बैलेट की व्यवस्था नहीं है। चुनाव के दिन देश में मौजूद रहना जरूरी होने के कारण विदेशों में रहने वाले अधिकतर इज़राइली नागरिक वोट नहीं डाल सकते। हालांकि, राजनयिकों और सरकारी प्रतिनिधियों को छूट दी गई है। उन्होंने 20 अक्टूबर को इज़राइली मिशनों में अपना मतदान किया।

चुनाव में कौन-कौन से मुद्दे अहम हैं?

इस चुनाव में इज़राइली नागरिक कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर फैसला करेंगे। इनमें प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं:

1. 7 अक्टूबर के हमले और सुरक्षा में चूक

2023 में 7 अक्टूबर को हमास के नेतृत्व में हुए हमले में करीब 1,200 लोगों की मौत हुई थी और लगभग 250 लोगों को बंधक बनाया गया था। इस घटना के बाद इज़राइल ने गाज़ा में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया।

तीन साल बीतने के बावजूद, सरकार ने इन सुरक्षा चूकों की जांच के लिए अब तक कोई आधिकारिक जांच आयोग गठित नहीं किया है।

गाज़ा में इज़राइली सैन्य कार्रवाई के दौरान कम से कम 74,000 लोगों की मौत होने का दावा किया गया है। लगातार हमलों और नाकेबंदी के कारण इस क्षेत्र का बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका है।

2. अति-रूढ़िवादी यहूदियों को सैन्य सेवा से छूट

अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय यानी अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स लोगों को सैन्य सेवा से छूट देने का मुद्दा भी चुनाव में अहम है।

इस छूट के समर्थकों का कहना है कि इससे धार्मिक छात्रों को तोराह (Torah) के अध्ययन के लिए पूरा समय मिलता है। वहीं, आलोचकों का तर्क है कि इससे बाकी नागरिकों पर सैन्य सेवा का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

3. न्यायपालिका में सुधार का विवाद

गाज़ा युद्ध से पहले भी नेतन्याहू सरकार की न्यायिक सुधार योजनाओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे।

इन योजनाओं के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां सीमित करने की कोशिश को लेकर देश में गहरा मतभेद है। आलोचक इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हैं, जबकि सरकार के समर्थकों का कहना है कि न्यायपालिका ने अपने अधिकारों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया है।

4. युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा

गाज़ा, कब्जे वाले वेस्ट बैंक और लेबनान में जारी संघर्ष भी चुनाव के प्रमुख मुद्दे हैं।

जनता का एक वर्ग शांति और स्थिरता चाहता है, लेकिन सुरक्षा के मुद्दे पर किसी भी रियायत को लेकर राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं। नेतन्याहू ने हमास और हिजबुल्लाह के खिलाफ पूर्ण विजय हासिल करने का वादा किया था, लेकिन दोनों संगठन अब भी सक्रिय हैं।

5. महंगाई और जीवन-यापन का खर्च

बढ़ते रक्षा खर्च, महंगाई और वेतन के दबाव ने आम लोगों की आर्थिक मुश्किलें बढ़ाई हैं।

2023 के बाद इज़राइल का रक्षा बजट लगभग दोगुना हो गया है। इससे सरकारी वित्त पर दबाव बढ़ा है और जीवन-यापन की लागत चुनाव का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है।

इज़राइल की निवर्तमान सरकार की स्थिति

जुलाई में संसद भंग होने के समय नेतन्याहू के गठबंधन के पास नेसेट की 120 सीटों में से 60 सीटें थीं।

इस गठबंधन में शामिल प्रमुख पार्टियां थीं:

  • लिकुड: 32 सीटें
  • शास (Shas): 11 सीटें
  • रिलिजियस ज़ायोनिज्म: 7 सीटें
  • ओत्ज़मा येहुदित (Otzma Yehudit): 6 सीटें
  • न्यू होप (New Hope): 4 सीटें

शास पार्टी जुलाई 2025 में सरकार से बाहर हो गई थी, लेकिन गठबंधन में बनी रही। न्यू होप पार्टी के इस चुनाव में लिकुड के साथ विलय करने की संभावना बताई गई है।

विपक्षी पार्टियों के पास कुल 59 सीटें थीं। इनमें येश अतीद के पास 24, ब्लू एंड व्हाइट के पास 8, यूनाइटेड तोराह यहूदी धर्म पार्टी के पास 7, यिस्राएल बेतेनु के पास 6, हदाश-ताल और राम के पास 5-5 तथा लेबर पार्टी के पास 4 सीटें थीं। नोआम पार्टी की एक सीट किसी गठबंधन के साथ स्पष्ट रूप से जुड़ी नहीं थी।

प्रमुख उम्मीदवार कौन हैं?

बेंजामिन नेतन्याहू

लिकुड पार्टी के नेता बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने की कोशिश कर रहे हैं। वह भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़े मुकदमों का सामना कर रहे हैं, लेकिन आरोपों को स्वीकार नहीं करते।

उनका दक्षिणपंथी गठबंधन चार प्रमुख विपक्षी दलों के समूह से मुकाबला कर रहा है। विपक्षी नेताओं ने चुनाव से पहले एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी से बचने और चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए साथ काम करने का वादा किया है।

गादी आइज़ेनकोट

इज़राइल के पूर्व सेना प्रमुख गादी आइज़ेनकोट को विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में गिना जा रहा है।

उनकी नई पार्टी ‘याशर’ (Yashar) जनमत सर्वेक्षणों में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को कड़ी चुनौती दे रही है।

विपक्षी गठबंधन

विपक्षी गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्रियों नफ्ताली बेनेट और याइर लापिड के नेतृत्व वाली ‘टुगेदर लिस्ट’, अविग्दोर लिबरमैन की यिस्राएल बेतेनु और याइर गोलान की ‘डेमोक्रेट्स’ पार्टी शामिल हैं।

अन्य प्रमुख राजनीतिक चेहरों में दक्षिणपंथी मंत्री इतामार बेन-ग्विर और बेज़लेल स्मोट्रिच, अति-रूढ़िवादी यहूदी दल तथा अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली राम और जॉइंट लिस्ट शामिल हैं।

पिछले महीने इज़राइल के केंद्रीय चुनाव आयोग ने राम और जॉइंट लिस्ट को चुनाव लड़ने से रोकने के पक्ष में मतदान किया था। हालांकि, 2 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से इस प्रतिबंध को रद्द कर दिया। अदालत के मुताबिक, पार्टियों को चुनाव से बाहर रखने के लिए पेश किए गए सबूत कानूनी मानकों को पूरा नहीं करते थे।

जॉइंट लिस्ट में शामिल बालाद पार्टी के नेता और फिलिस्तीनी मूल के इज़राइली नागरिक समी अबू शेहादे ने चुनावी दौड़ से हटने का फैसला किया। इसकी वजह उनकी उम्मीदवारी को अयोग्य ठहराए जाने की संभावना से जुड़े न्यायिक संकेत बताए गए।

अरब नेतृत्व वाली पार्टियां चुनाव के बाद सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि, यहूदी नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के अधिकांश नेताओं ने उनके साथ मिलकर सरकार बनाने की संभावना को खारिज किया है।

सात साल में छठा चुनाव

27 अक्टूबर को होने वाला यह चुनाव 2019 के बाद इज़राइल का छठा राष्ट्रीय चुनाव बताया जा रहा है। हालांकि, पिछले 38 वर्षों में यह पहला मौका है, जब नेसेट ने अपना पूरा चार साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद चुनाव की ओर कदम बढ़ाया है।

इज़राइल में राजनीतिक अस्थिरता अप्रैल 2019 में शुरू हुई थी। उस समय नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और बेनी गैंट्ज की ब्लू एंड व्हाइट पार्टी ने 35-35 सीटें जीती थीं। सितंबर 2019 में दोबारा चुनाव हुआ, लेकिन गतिरोध बरकरार रहा। ब्लू एंड व्हाइट को 33 और लिकुड को 32 सीटें मिलीं, फिर भी कोई भी पक्ष बहुमत का गठबंधन नहीं बना सका।

मार्च 2020 के तीसरे चुनाव में लिकुड को 36 और ब्लू एंड व्हाइट को 33 सीटें मिलीं। इसके बाद नेतन्याहू और गैंट्ज के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी, लेकिन एक साल से भी कम समय में सरकार गिर गई।

मार्च 2021 के चुनाव में लिकुड ने 30 और येश अतीद ने 17 सीटें हासिल कीं। इसके बाद नफ्ताली बेनेट और याइर लापिड के नेतृत्व में आठ पार्टियों का गठबंधन सत्ता में आया। इसमें अरब पार्टी राम भी शामिल थी। इस सरकार ने नेतन्याहू के 12 साल के लगातार शासन को समाप्त कर दिया, लेकिन यह सरकार भी लगभग एक साल ही चल सकी।

नवंबर 2022 के चुनाव में लिकुड ने 32 और येश अतीद ने 24 सीटें जीतीं। इसके बाद नेतन्याहू दोबारा प्रधानमंत्री बने और उन्होंने इज़राइल के इतिहास की सबसे दक्षिणपंथी सरकारों में से एक का नेतृत्व किया।

मौजूदा सर्वेक्षणों के अनुसार, इस बार भी किसी एक गठबंधन के 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत हासिल करने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

इज़राइल के प्रधानमंत्री: किसने कितने समय तक शासन किया?

1948 में इज़राइल की स्थापना के बाद से देश में कुल 14 प्रधानमंत्री रह चुके हैं।

बेंजामिन नेतन्याहू ने तीन अलग-अलग अवधियों में प्रधानमंत्री पद संभाला है:

  • 1996 से 1999
  • 2009 से 2021
  • 2022 से वर्तमान तक

कुल मिलाकर लगभग 19 वर्षों के शासन के साथ नेतन्याहू इज़राइल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं।

उनके बाद डेविड बेन-गुरियन का नाम आता है, जिन्होंने 1948 से 1954 और फिर 1955 से 1963 तक देश का नेतृत्व किया।

27 अक्टूबर के चुनाव में चाहे किसी भी पार्टी या गठबंधन को जीत मिले, नई सरकार के शपथ ग्रहण तक बेंजामिन नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने रहेंगे।

Source: Al Jazeera