मुस्लिम कयादत का संकट, नौजवानों में बढ़ती बेचैनी और पारंपरिक नेतृत्व से मायूसी; अब अपने हुकूक की लड़ाई खुद लड़ने को तैयार है नई नस्ल
लेखक: सरफराज अहमद कासमी, हैदराबाद
मुस्लिम समाज की मौजूदा सूरतेहाल का जायजा लिया जाए तो एक बुनियादी सवाल बार-बार सामने आता है कि आखिर ऐसी कौन-सी वजहें हैं, जिनके कारण इतनी बड़ी आबादी, जिसके पास शानदार तारीख, तहजीब, दीनी व अखलाकी तालीम और काबिल लोगों की कमी नहीं है, इसके बावजूद कई मोर्चों पर असुरक्षा, मआशी पिछड़ेपन, तालीमी महरूमी, सियासी बेअसरता और सामाजिक बिखराव का सामना कर रही है?
इस सवाल का जवाब तलाश करने के लिए जिन बुनियादी मसलों पर गौर करना जरूरी है, उनमें कयादत का फुकदान, आपसी इख्तिलाफात, इत्तेहादी रणनीति की कमी और संस्थागत कमजोरी अहम हैं।
यह हकीकत है कि किसी भी कौम की तरक्की, तहफ्फुज और इस्तेहकाम के लिए सिर्फ आबादी की तादाद काफी नहीं होती। इसके लिए दूरअंदेश कयादत, मजबूत इदारे, मुश्तरका मकासिद और बदलते हालात के मुताबिक सही फैसले लेने की सलाहियत भी जरूरी है।
जब कयादत कमजोर हो, सामूहिक प्राथमिकताएं साफ न हों और कौम अपने वसाइल को मुनज्जम करने में नाकाम रहे, तो उसके नतीजे मुख्तलिफ शक्लों में सामने आते हैं। मुस्लिम समाज के लिए भी यह वक्त संजीदा मुहासबे का है कि वह अपने मसाइल का जायजा महज जज्बाती रद्देअमल के बजाय गंभीर तजजीये और अमली रणनीति के साथ ले।
कयादत सिर्फ किसी ओहदे या सियासी चेहरे का नाम नहीं
किसी कौम की कयादत का मतलब सिर्फ एक शख्स, एक ओहदा या एक सियासी चेहरा नहीं होता, बल्कि यह एक मुकम्मल फिक्री, अखलाकी और तंजीमी निजाम का नाम है। असल कयादत वही है, जो कौम को दरपेश मसाइल की सही निशानदेही करे, लोगों के जज्बात को तामीरी रुख दे, मुश्किल हालात में हौसला बढ़ाए और मुस्तकबिल के लिए काबिले-अमल मंसूबाबंदी करे।
बदकिस्मती से मुस्लिम समाज के मुख्तलिफ हलकों में कयादत को लेकर कई सवाल मौजूद हैं। कहीं शख्सी मफादात, इज्तिमाई मफाद पर हावी नजर आते हैं, कहीं गुटबंदी और तंजीमी इख्तिलाफात की वजह से बड़े मसाइल पीछे छूट जाते हैं, तो कहीं अवामी मसाइल के हल के लिए ऐलान तो बहुत होते हैं, लेकिन मुसलसल जद्दोजहद, असरदार पैरवी और जवाबदेही का निजाम कमजोर रहता है।
हालांकि, मुख्तलिफ इलाकों में ऐसे अफराद, इदारे और तंजीमें भी मौजूद हैं, जो तालीम, समाजी खिदमत, कानूनी मदद, फलाही सरगर्मियों और अवामी हुकूक के लिए काम कर रहे हैं। असल जरूरत इन कोशिशों को एक-दूसरे से जोड़ने, उनकी कारकर्दगी बेहतर बनाने और उन्हें एक बड़ी इज्तिमाई रणनीति का हिस्सा बनाने की है।
हुकूक की हिफाजत के लिए सिर्फ बयानबाजी काफी नहीं
किसी भी जम्हूरी मुआशरे में नागरिकों की जान, माल, इज्जत और बुनियादी हुकूक की हिफाजत करना रियासत की अहम जिम्मेदारियों में शामिल है। जब किसी शख्स या तबके को तशद्दुद, धमकी, इम्तियाजी सुलूक या जायदाद के नुकसान का सामना करना पड़ता है, तो यह सिर्फ किसी एक खानदान का मसला नहीं रहता, बल्कि कानून की बालादस्ती और समाजी इंसाफ का सवाल बन जाता है।
मुसलमानों को जहां भी नाइंसाफी या तशद्दुद का सामना हो, वहां मुतास्सिरीन की मदद, कानूनी कार्रवाई, सबूतों की हिफाजत, मुस्तनद मालूमात की फराहमी और मुताल्लिका इदारों से जवाबदेही का मुतालबा करना जरूरी है।
महज मजम्मती बयान जारी कर देना काफी नहीं है। मुतास्सिरा खानदानों को कानूनी और माली मदद देना, उनके पुनर्वास का इंतजाम करना और मुकदमों की मुसलसल पैरवी करना भी जरूरी है।
इसी तरह, हर वाकये की हकीकत मुस्तनद सबूतों की बुनियाद पर सामने आनी चाहिए। अफवाहों, गैर-मुसद्दका खबरों और भड़काऊ पैगामात से बचना जरूरी है, क्योंकि गलत मालूमात हालात को और पेचीदा बना सकती हैं और बेगुनाह लोगों के लिए नए खतरे पैदा कर सकती हैं।
कयादत की जिम्मेदारी है कि वह मुतास्सिरीन के दर्द को सिर्फ तकरीरों का मौजू न बनाए, बल्कि उनके लिए अमली मदद का जरिया बने। जिस कयादत के पास अवामी मसाइल का रिकॉर्ड, कानूनी माहिरीन की टीम, इमदादी वसाइल और मुसलसल पैरवी का निजाम हो, वह मुश्किल हालात में ज्यादा असरदार किरदार अदा कर सकती है।
नई नस्ल की बदलती सोच और पारंपरिक कयादत से बढ़ती दूरी
पूरी दुनिया में नई नस्ल, खास तौर पर जेनरेशन-जी यानी जेन-जी, की सोच और तरजीहात में बड़ी तब्दीली देखने को मिल रही है। यह नस्ल अपने से पहले की पीढ़ियों के मुकाबले ज्यादा खुलकर सवाल करती है और अपनी जिंदगी से जुड़े फैसलों में अपनी राय को अहमियत देती है।
पहले नौजवान कई अहम मामलों में बड़ों की राय को तरजीह देते थे और अपनी मुखालफत खुलकर जाहिर करने से गुरेज करते थे। लेकिन आज के नौजवान अपनी जिंदगी पर दूसरों की मर्जी थोपे जाने को आसानी से कबूल नहीं करते। वे आजादाना सोच रखते हैं और नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाने का हौसला भी रखते हैं।
हुकूमत की नीतियों, निजाम की खामियों और ज्यादतियों पर सवाल उठाना, अपने हुकूक का मुतालबा करना और इज्तिमाई ताकत के जरिए फैसलों पर दोबारा गौर करने के लिए दबाव बनाना इस नई नस्ल की अहम विशेषताएं हैं।
पिछले कुछ वर्षों में मुल्क में ऐसा माहौल बनने की आलोचना होती रही है, जिसमें हुकूमत की नाकामियों पर सवाल उठाने वालों को देशविरोधी करार देने की कोशिश की जाती है। कुछ तबकों के खिलाफ होने वाली ज्यादतियों को राष्ट्रवाद के नाम पर सही ठहराने और इख्तिलाफ करने वालों को दबाव में रखने के इल्जाम भी सामने आते रहे हैं।
इंसानी हुकूक की पामाली और अकल्लियतों की मजहबी आजादी से जुड़े सवालों पर असरदार मुजाहमत की कमी से सत्ता के गलियारों में यह तास्सुर मजबूत हो सकता है कि नाइंसाफी के खिलाफ जवाबदेही का मुतालबा कमजोर है। लेकिन मुख्तलिफ जगहों पर नौजवानों के एहतिजाज ने यह पैगाम दिया है कि नई नस्ल को हमेशा खौफ और खामोशी में नहीं रखा जा सकता।
ऐसे हालात में मुस्लिम नौजवानों की भूमिका एक अहम सवाल बनकर सामने आती है। मुख्तलिफ तबकों की नई नस्ल में सियासी और समाजी बेदारी के आसार दिखाई दे रहे हैं, लेकिन मुस्लिम नौजवानों का एक बड़ा हिस्सा अब भी मिल्लत और समाज के इज्तिमाई मसाइल से अपेक्षाकृत दूर नजर आता है।
हालांकि, इसकी पूरी जिम्मेदारी नौजवानों पर डालना इंसाफ नहीं होगा। उन्हें जिस मुआशरे और कयादत की विरासत मिली है, उसमें हुकूक की पामाली पर खामोशी, इज्तिमाई जिम्मेदारी से गुरेज और मसलहत को हिकमत का नाम देने का रुझान लंबे अरसे से मौजूद रहा है।
जब पिछली नस्ल नौजवानों को सियासी शऊर, दस्तूरी हुकूक और इज्तिमाई जिम्मेदारियों का अमली सबक ही नहीं देती, तो नई नस्ल से अचानक असाधारण बसीरत और कयादत की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
मुस्लिम नौजवानों को फैसले लेने में हिस्सेदार बनाना जरूरी
मुस्लिम समाज का एक अहम मसला यह भी रहा है कि नौजवानों को मिल्ली फैसलों में शामिल करने, उन्हें सवाल पूछने की आजादी देने और इख्तिलाफे-राय को बर्दाश्त करने की रिवायत मजबूत नहीं हो सकी।
नतीजतन, नई नस्ल और पारंपरिक कयादत के दरमियान फासला बढ़ता गया। यह फासला सिर्फ उम्र का नहीं, बल्कि सोच, तरजीहात और मसाइल को देखने के नजरिये का भी है।
सवाल यह है कि जब रोजगार, करियर और मुस्तकबिल खतरे में नजर आते हैं, तो नौजवान सड़कों पर उतरकर एहतिजाज कर सकते हैं, लेकिन जब पूरी बिरादरी के बराबर शहरी दर्जे, दस्तूरी हुकूक, मजहबी आजादी और इज्जते-नफ्स का सवाल पैदा होता है, तो मुस्लिम नौजवानों में वैसी बेचैनी क्यों नजर नहीं आती?
तालीम, नौकरी, सियासी नुमाइंदगी और बराबर के मौके भी तो उन्हीं के मुस्तकबिल से जुड़े मसाइल हैं। इसलिए मिल्ली मसाइल को सिर्फ बुजुर्गों, मजहबी तंजीमों या सियासी रहनुमाओं का मामला समझकर उनसे दूरी बनाना आखिरकार नौजवानों के अपने मुस्तकबिल को भी मुतास्सिर करेगा।
इस खामोशी की एक वजह पिछले दो दशकों के वे तजुर्बात भी हो सकते हैं, जिनमें जुल्म और जब्र के खिलाफ आवाज उठाने वालों को जेल और मुकदमों का सामना करना पड़ा। वहीं, मुस्लिम समाज की कुछ सियासी और मिल्ली कयादतों पर इल्जाम लगते रहे हैं कि उन्होंने ऐसे लोगों का मजबूती से साथ देने के बजाय सत्ता की नाराजगी से बचने और मसलहत के रास्ते तलाशने को तरजीह दी।
इस रवैये से नौजवानों में यह तास्सुर पैदा हो सकता है कि आवाज उठाने की कीमत तो चुकानी पड़ती है, लेकिन मुश्किल वक्त में कयादत की हिमायत मिलने की कोई गारंटी नहीं होती।
जब कयादत खुद खतरा उठाने से गुरेज करे, तो नौजवानों से कुर्बानी और जुर्रत की उम्मीद करने का अखलाकी आधार कमजोर पड़ जाता है।
सवाल करने वाली नस्ल को दबाएं नहीं, सही राह दिखाएं
इसके बावजूद तस्वीर पूरी तरह मायूसकुन नहीं है। नई नस्ल अब नाइंसाफी, हक-तलफी और मिल्ली मफाद पर शख्सी मफाद को तरजीह देने के खिलाफ अपने बड़ों से भी सवाल करने लगी है।
नौजवान गलतियों की निशानदेही को बेअदबी नहीं समझते और सवाल पूछने को अपना हक मानते हैं। सोशल मीडिया और मालूमात तक सीधी पहुंच ने उन्हें यह मौका दिया है कि वे पारंपरिक कयादत के नजरिये को बिना जांचे-परखे कबूल करने के बजाय खुद हालात का जायजा लें और अपने नतीजे निकालें।
यही वजह है कि मिल्ली तंजीमों की बेअमली, वरिष्ठ रहनुमाओं की जवाबदेही से गुरेज और मसलहत पसंद सियासत पर पहले जैसी खामोशी बाकी नहीं रही। कयादत से जवाब मांगने का रुझान धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है।
इस उभरते हुए रुझान को दबाने या इसे बड़ों की बेअदबी करार देने के बजाय सही दिशा देना जरूरी है, क्योंकि सवाल करने वाली नस्ल ही जिंदा मुआशरों को जमूद से बाहर निकालती है।
अगर वरिष्ठ रहनुमा और मिल्ली इदारे नौजवानों की बेचैनी को समझने, उनकी सलाहियतों से फायदा उठाने और उनके सवालों के ईमानदार जवाब देने में नाकाम रहे, तो कयादत का खालीपन ज्यादा देर तक कायम नहीं रहेगा।
तारीख का सबक यही है कि जब स्थापित कयादतें बदलते दौर की आवाज सुनने से इनकार करती हैं, तो नई ताकतें अपनी राह खुद बना लेती हैं। मुस्लिम जेन-जी भी हमेशा खामोश रहने वाली नहीं है। वह या तो मौजूदा कयादत को अपनी सोच और तरीका-ए-कार बदलने पर मजबूर करेगी या फिर ऐसी नई कयादत को जन्म देगी, जो उसकी उम्मीदों, मसाइल और वक्त के तकाजों से ज्यादा हमआहंग होगी।
दिल्ली के एहतिजाज में मुस्लिम नौजवानों की शिरकत और कयादत पर सवाल
लेख में दावा किया गया है कि दिल्ली समेत मुल्क के मुख्तलिफ हिस्सों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए एहतिजाज में मुस्लिम नौजवानों और छात्रों की काबिले-लिहाज शिरकत रही है। ये नौजवान जम्हूरियत और संविधान की हिफाजत से जुड़े मुद्दों पर अपनी आवाज उठा रहे हैं।
लेखक के मुताबिक, इसके बरक्स पारंपरिक मिल्ली, मजहबी और मुस्लिम सियासी कयादत का एक हिस्सा नौजवानों के जज्बात और एहसासात के मुताबिक उनकी रहनुमाई करने में नाकाम रहा है।
लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर भी इल्जाम लगाए गए हैं कि उन्होंने मुस्लिम नौजवानों को इन एहतिजाजी गतिविधियों से दूर रखने के लिए अपने समर्थकों और कुछ कथित प्रतिनिधियों का इस्तेमाल किया। लेखक का दावा है कि कुछ लोगों को इन प्रदर्शनों से दूरी बनाए रखने की सलाह भी दी गई।
इन इल्जामात की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। हालांकि, लेख का बुनियादी मौकिफ यह है कि पारंपरिक कयादत की दूरी के बावजूद मुस्लिम नौजवानों का एहतिजाज में शामिल होना उनकी बदलती सियासी सोच और आजादाना फैसले लेने की प्रवृत्ति को जाहिर करता है।
लेख के मुताबिक, दिल्ली में एहतिजाज में शामिल होने और वहां पहुंचने की कोशिश करने वाले कुछ नौजवानों को मुख्तलिफ जगहों पर हिरासत में लिए जाने की घटनाओं ने भी इस बहस को तेज किया है। लेखक का मानना है कि तालीमयाफ्ता मुस्लिम नौजवानों का एक हिस्सा अब पारंपरिक कयादत की रहनुमाई का इंतजार करने के बजाय अपने विवेक से फैसले लेने लगा है।
अगर पारंपरिक मिल्ली, मजहबी और सियासी कयादत संगीन मसाइल पर खामोशी इख्तियार करती है और सिर्फ बयानबाजी तक महदूद रहती है, तो नई नस्ल के साथ उसका फिक्री टकराव बढ़ सकता है।
लेख में यह भी कहा गया है कि सोशल मीडिया पर मुस्लिम नौजवान उन रहनुमाओं से सवाल कर रहे हैं, जो मिल्ली मसाइल पर मुखर रहने का दावा करते हैं, लेकिन अहम मौकों पर उनकी भूमिका स्पष्ट नहीं होती।
इसी सिलसिले में मतदाता सूची से कथित तौर पर 13 करोड़ वोटरों के नाम हटाए जाने के मुद्दे पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। नौजवान जानना चाहते हैं कि क्या इन नामों में मुस्लिम वोटर भी शामिल हैं और अगर ऐसा है, तो इतने अहम मुद्दे पर मिल्ली कयादत ने अपना साफ मौकिफ क्यों नहीं रखा?
यहां यह वाजेह करना जरूरी है कि मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा लेख में किया गया दावा है। इसकी तस्दीक के लिए निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों और संबंधित दस्तावेजों की जांच जरूरी है।
जम्हूरियत, अकल्लियतों के हुकूक और कयादत की जवाबदेही
लेखक का इल्जाम है कि मुल्क में जम्हूरी संस्थाओं की कार्यप्रणाली और अकल्लियतों के हुकूक को लेकर गंभीर चिंताएं बढ़ी हैं। उनके मुताबिक, मुसलमानों और दलितों के खिलाफ हिंसा, इम्तियाज और कानूनी मामलों में कथित उत्पीड़न से जुड़े मुद्दों पर लगातार और असरदार आवाज उठाने की जरूरत है।
लेख में यह दावा भी किया गया है कि अकल्लियतों और दलितों पर हमलों तथा ज्यादतियों के मामलों में 80 फीसदी से ज्यादा इजाफा हुआ है। हालांकि, इस आंकड़े के समर्थन में कोई स्पष्ट स्रोत या तुलनात्मक अवधि नहीं दी गई है। इसलिए इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए बिना प्रमाणित हकीकत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता।
लेखक का कहना है कि यूट्यूब, फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मुसलमानों और अन्य महरूम तबकों को निशाना बनाने वाला कंटेंट भी चिंता का विषय है। उनके मुताबिक, दलित समाज सदियों से सामाजिक भेदभाव और ज्यादतियों का सामना करता आया है, जबकि आज मुसलमानों और उनकी इबादतगाहों से जुड़े विवाद भी लगातार चर्चा में रहते हैं।
ऐसे हालात में कयादत का किरदार सिर्फ घटनाओं की मजम्मत करने तक महदूद नहीं रह सकता। उसे कानूनी मदद, तथ्यपरक मालूमात, अवामी बेदारी और दस्तूरी हुकूक की हिफाजत के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
लेखक का मानना है कि किसी न किसी को आगे बढ़कर कयादत की जिम्मेदारी संभालनी होगी। मुस्लिम समाज को अपने हुकूक के लिए मुनज्जम और जम्हूरी तरीके से जद्दोजहद करने की जरूरत है।
उनके मुताबिक, मुस्लिम समाज कई बार बदलते हालात का अंदाजा वक्त रहते नहीं लगा पाता और जब हालात संगीन हो जाते हैं, तब रद्देअमल देने की कोशिश करता है। अगर समस्याओं के संकेतों को पहले ही समझ लिया जाए और समय पर असरदार कदम उठाए जाएं, तो मुश्किल हालात का बेहतर मुकाबला किया जा सकता है।
तालीम, कानून, टेक्नोलॉजी और सहाफत में नौजवानों का किरदार
आज के हालात मुस्लिम नौजवानों से तकाजा करते हैं कि वे जेहनी, तालीमी और पेशेवर तौर पर हर चुनौती का मुकाबला करने के लिए तैयार रहें। मीडिया और सोशल मीडिया पर मुस्लिम समाज के खिलाफ फैलाए जाने वाले भ्रामक प्रचार का जवाब देने के लिए नौजवानों में तथ्य-जांच, बेहतर संवाद और डिजिटल साक्षरता की सलाहियत पैदा करना जरूरी है।
किसी भी कौम का मुस्तकबिल उसकी नौजवान नस्ल से जुड़ा होता है। मुस्लिम समाज में भी ऐसे अनेक नौजवान मौजूद हैं, जो तालीम, सहाफत, तहकीक, कानून, चिकित्सा, कारोबार, टेक्नोलॉजी और समाजी खिदमत के मैदान में अपनी काबिलियत साबित कर रहे हैं।
जरूरत इस बात की है कि उनकी सलाहियतों को पहचाना जाए, उन्हें आगे बढ़ने के मौके दिए जाएं और फैसला-साजी के अमल में मुनासिब नुमाइंदगी दी जाए।
कयादत की तैयारी सिर्फ तकरीरों, सियासी वाबस्तगी या तंजीमी ओहदों से नहीं होती। इसके लिए मुताला, तहकीक, अखलाकी तरबियत, इंतजामी तजुर्बा, अवामी खिदमत और मुख्तलिफ तबकों के साथ बातचीत करने की सलाहियत जरूरी है।
नौजवानों को यह भी सिखाना होगा कि इख्तिलाफे-राय को किस तरह बर्दाश्त किया जाए, मालूमात की तस्दीक कैसे की जाए, कानूनी और दस्तूरी इदारों से कैसे रुजू किया जाए और किसी मसले के हल के लिए सबूतों की बुनियाद पर असरदार मुहिम कैसे चलाई जाए।
इसी तरह, वरिष्ठ कयादत की जिम्मेदारी है कि वह नई नस्ल को सिर्फ कार्यकर्ता के तौर पर इस्तेमाल न करे, बल्कि उसे फैसला-साजी, तंजीमी जिम्मेदारियों और इदारा चलाने के मौके भी दे।
जो कयादत अपने बाद आने वालों को तैयार नहीं करती, वह अपने ही मुस्तकबिल को गैरयकीनी बना देती है।
मुस्लिम समाज को कैसी कयादत की जरूरत है?
आज मुस्लिम समाज को ऐसी कयादत की जरूरत है, जो सिर्फ जज्बाती तकरीरों तक महदूद न रहे, बल्कि अमली मंसूबाबंदी करे, मुश्किल हालात में अवाम के साथ खड़ी रहे और कानूनी, सियासी, तालीमी तथा मआशी मैदानों में मुसलसल जद्दोजहद करे।
ऐसी कयादत, जो इख्तिलाफात के बावजूद साझा मसाइल पर इत्तेफाक और तआवुन का रास्ता निकाले, अपने इख्तियारात और वसाइल का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करे और अवाम के प्रति जवाबदेह रहे।
मुस्लिम नौजवानों में बढ़ती बेदारी को कौम के लिए चुनौती के बजाय एक मौके के तौर पर देखा जाना चाहिए। उनके सवालों को दबाने के बजाय उनका जवाब देना, उनकी सलाहियतों को पहचानना और उन्हें कयादत में हिस्सेदारी देना वक्त की अहम जरूरत है।
आने वाले वक्त में यह साफ होगा कि पारंपरिक कयादत नई नस्ल की उम्मीदों के मुताबिक खुद को बदलती है या नौजवान अपनी आजाद कयादत खड़ी करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं।
लेख का बुनियादी पैगाम यही है कि मुस्लिम समाज की तरक्की, तहफ्फुज और मुस्तकबिल के लिए सिर्फ कयादत का मौजूद होना काफी नहीं है, बल्कि उसका जवाबदेह, सक्रिय, दूरअंदेश और नौजवानों की उम्मीदों के प्रति संवेदनशील होना भी जरूरी है।
लेखक : सरफराज अहमद कासमी
(नोट: यह लेख लेखक के विचारों पर आधारित है। इसमें शामिल इल्जामात, आंकड़ों और सियासी दावों की स्वतंत्र तस्दीक जरूरी है। लेख में व्यक्त विचारों से प्रकाशन संस्थान का सहमत होना जरूरी नहीं है।)
Source: Haqeeqat Times

