शरजील इमाम के हालिया इंटरव्यू में काफी पढ़ाई-लिखाई दिखाई देती है. इतिहास के संदर्भ हैं, राजनीतिक चिंतकों के उल्लेख हैं और एक व्यवस्थित राजनीतिक परियोजना भी है. पर इससे उपजा सवाल यह है कि इस परियोजना के केंद्र में स्वतंत्र मनुष्य है या अपने अधिकार और सत्ता चाहने वाला धार्मिक समुदाय? और यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों हमेशा एक चीज़ नहीं होते.

 

किसी व्यक्ति के साथ अन्याय का विरोध करने के लिए उसके विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है. और किसी व्यक्ति के विचारों की कठोर आलोचना करने का अर्थ उसके साथ अन्याय का समर्थन करना भी नहीं है.

शरजील इमाम का इंटरव्यू पढ़ते हुए यह फर्क बनाए रखना जरूरी लगता है. उनके कानूनी अधिकारों, निष्पक्ष सुनवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल अपनी जगह है. इतिहास, धर्म, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र के बारे में उनकी स्थापनाओं की जांच अपनी जगह. उत्पीड़न किसी विचार को अपने आप सही नहीं बना देता. उसी तरह किसी विचार से असहमति किसी व्यक्ति के उत्पीड़न को उचित नहीं बनाती.

इतिहास प्रेरणा का स्रोत होगा तो उसकी समस्याएं पर भी बात होगी

द क्विंट में प्रकाशित उनके इंटरव्यू में काफी पढ़ाई-लिखाई दिखाई देती है. इतिहास के संदर्भ हैं, राजनीतिक चिंतकों के उल्लेख हैं और एक व्यवस्थित राजनीतिक परियोजना भी है. सवाल यह है कि इस परियोजना के केंद्र में स्वतंत्र मनुष्य है या अपने अधिकार और सत्ता चाहने वाला धार्मिक समुदाय.

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों हमेशा एक चीज नहीं होते.

शरजील कांग्रेस, भारतीय राष्ट्रवाद और संविधान पर व्यापक आरोप लगाते हैं. गांधी को कांग्रेस को मूलतः हिंदू पार्टी बनाने से जोड़ते हैं; नेहरू की भारतीय राष्ट्र की व्याख्या को मिथक मानते हैं और विभाजन के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हैं. इसके समानांतर जिन्ना और इकबाल उनके लिए महत्वपूर्ण सकारात्मक संदर्भ हैं.

इनमें से कोई विषय आलोचना से ऊपर नहीं है. गांधी, नेहरू, जिन्ना, इकबाल, आंबेडकर और संविधान- सबकी आलोचना होनी चाहिए. लोकतांत्रिक विमर्श का अर्थ महापुरुषों के आगे सिर झुकाकर बैठ जाना नहीं है.

लेकिन आलोचना की विश्वसनीयता उसकी समान कसौटी से बनती है.

यदि गांधी और नेहरू के विचारों को उनके राजनीतिक परिणामों की कसौटी पर जांचा जाएगा, तो जिन्ना और इकबाल की विरासत को भी उसी कसौटी से गुजरना होगा. अपने पसंदीदा विचारक के आदर्श गिनाना और दूसरे विचारक की विफलताएं गिनाना न्यायपूर्ण तुलना नहीं है.

अकादमिकता का अर्थ बहुत से नाम और उद्धरण इकट्ठा कर लेना नहीं है. उसका अर्थ अपनी स्थापना के विरुद्ध खड़े सबसे कठिन प्रश्न को भी गंभीरता से लेना है. जहां अपने पक्ष के लिए सहानुभूतिपूर्ण व्याख्या और विरोधी पक्ष के लिए केवल अभियोग बचता है, वहां विद्वत्ता राजनीतिक पक्षधरता का आवरण बन सकती है.

कोई व्यक्ति बहुत पढ़ा-लिखा हुआ, अनेक डिग्रियों से आभूषित हो सकता है लेकिन फिर भी हो सकता है कि अपनी मूल धारणाओं पर पुनर्विचार के लिए बिल्कुल तैयार न हो. पढ़ाई लिखाई विचार की क्षमता बढ़ाती है; लेकिन उससे उदारता की गारंटी नहीं मिलती.

शरजील के विचारों का ऐतिहासिक भूगोल आज के भारत से बड़ा है. अविभाजित भारत के मुस्लिम राजनीतिक चिंतन से वे अपने तर्क लेते हैं. इसलिए उनके विचारों की परीक्षा को केवल आज के भारतीय मुसलमानों की स्थिति तक सीमित रखना उचित नहीं होगा.

दक्षिण एशिया को ऐतिहासिक इकाई मानने का अर्थ उसके विभिन्न समाजों के अनुभवों को भी सामने रखना है. ऐसा करते ही प्रश्न उठता है कि मुस्लिम राष्ट्रीयता के आधार पर राजनीति किस तरह की सत्ता पैदा कर सकती है? मुस्लिम बहुसंख्यक समाज में गैर-मुस्लिम की बराबरी कैसे सुनिश्चित होगी? धर्म के भीतर असहमत व्यक्ति के अधिकार कौन बचाएगा? स्त्री के अधिकार की अंतिम सीमा नागरिक समानता होगी या धार्मिक व्याख्या? किसी व्यक्ति को अपना धर्म बदलने, छोड़ने या उसकी आलोचना करने की कैसी और कितनी स्वतंत्रता मिलेगी?

ये प्रश्न भारतीय मुसलमानों से किसी दूसरे देश की जिम्मेदारी मांगना नहीं हैं. कोई भारतीय मुसलमान पाकिस्तान, बांग्लादेश या किसी अरब सरकार के लिए जवाबदेह नहीं है.

लेकिन कोई विचारक जब धार्मिक राष्ट्रीयता के दक्षिण एशियाई इतिहास से अपने राजनीतिक सिद्धांत का औचित्य निकालता है, तो उस इतिहास से निकली कठिनाइयों पर भी उसे विचार करना ही होगा. वह इतिहास प्रेरणा का स्रोत होगा तो उसकी समस्याएं भी बहस का हिस्सा बनेंगी.

उत्पीड़न और उत्पीड़ित में अंतर

मुस्लिम समाजों के भीतर वर्ग, लिंग, संप्रदाय और धार्मिक असहमति के प्रश्नों को किनारे रखकर केवल मुसलमान बनाम बाहरी सत्ता का ढांचा बनाना मनुष्य के अनुभव को बहुत छोटा कर देता है.

किसी समुदाय के साथ भेदभाव का सवाल उठाना आवश्यक है. उसके अनुभव को ‘विक्टिमहुड’ कहकर खारिज कर देना स्वयं अन्याय हो सकता है लेकिन वास्तविक उत्पीड़न और उत्पीड़ित होने की पहचान के राजनीतिक इस्तेमाल में फर्क है.

पहले मामले में हम पूछते हैं कि किसके अधिकार का उल्लंघन हुआ, उसे न्याय कैसे मिलेगा और ऐसी व्यवस्था कैसे बनेगी जिसमें किसी के साथ यह न हो. दूसरे मामले में हम अपने समुदाय की पीड़ा से उसके नेतृत्व, इतिहास और राजनीतिक परियोजना के लिए स्थायी नैतिक छूट हासिल करने लगते हैं. तब आलोचक को आसानी से असंवेदनशील, शत्रु का सहयोगी या समुदाय की पीड़ा से अनजान घोषित किया जा सकता है.

यहीं सावधानी चाहिए. किसी मुस्लिम स्त्री का उत्पीड़क उसके अपने परिवार का पुरुष हो सकता है. किसी मुस्लिम मजदूर का शोषक उसी धर्म का मालिक हो सकता है. किसी असहमत मुसलमान पर दबाव डालने वाला उसके अपने समुदाय का धार्मिक नेतृत्व हो सकता है. धार्मिक पहचान की समानता इन टकरावों को खत्म नहीं करती.

यदि राजनीतिक भाषा इन संबंधों को पीछे धकेल देती है, तो वह समुदाय को संगठित करते हुए उसके भीतर के कमजोर व्यक्ति को अकेला छोड़ सकती है.

इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि मुसलमानों को सत्ता में कितनी हिस्सेदारी मिली. यह भी होना चाहिए कि उस हिस्सेदारी से किस मुसलमान की शक्ति बढ़ेगी- साधारण नागरिक की या उसके प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले नेता की?

समुदाय को अधिकार मिले, लेकिन उसके भीतर व्यक्ति का क्या होगा?

अल्पसंख्यक अधिकार लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा हैं. भाषा, संस्कृति, संगठन और धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा के बिना बराबरी अधूरी रह सकती है लेकिन समुदाय कोई ऐसा जीव नहीं है जिसकी अपनी एक इच्छा हो. उसके भीतर गरीब और अमीर हैं, स्त्रियां और पुरुष हैं, आस्तिक और संशयवादी हैं, परंपरावादी और सुधारक हैं. उनके हित हमेशा एक जैसे नहीं होते.

इसलिए ‘समुदाय चाहता है’ कहने वाले से पूछना पड़ता है: समुदाय के किस हिस्से ने कहा? किस प्रक्रिया से कहा? असहमति कहां दर्ज होगी? प्रतिनिधि को बदला कैसे जाएगा?

विकेंद्रीकरण का विकल्प बदलाव की गांरंटी नहीं

शरजील सत्ता के विकेंद्रीकरण, आनुपातिक प्रतिनिधित्व और सामुदायिक सुरक्षा की बात करते हैं. साथ ही वे संविधान को धार्मिक अल्पसंख्यकों के सम्मानजनक अस्तित्व में बाधा बताते हैं. इन मांगों और आरोपों का उत्तर केवल संविधान की प्रशंसा से नहीं दिया जा सकता. चुनाव प्रणाली और सत्ता के बंटवारे पर बहस होनी चाहिए. पर हर विकल्प के सामने एक प्रश्न खड़ा रहेगा: क्या उससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता बढ़ेगी?

केंद्र से अधिकार राज्य को देना एक स्तर का विकेंद्रीकरण है. राज्य से समुदाय को अधिकार देना दूसरा. लेकिन समुदाय से व्यक्ति तक स्वतंत्रता पहुंचती है या नहीं- यह सबसे जरूरी स्तर है.

सत्ता दिल्ली से निकलकर धार्मिक नेतृत्व के हाथ में पहुंच जाए और साधारण व्यक्ति फिर भी उससे सवाल न कर सके, तो उसकी मुक्ति कहां हुई?

शरजील बार-बार ईश्वर में विश्वास को भय से मुक्ति और प्रतिरोध की शक्ति से जोड़ते हैं. पारंपरिक धार्मिक नेतृत्व की आलोचना करते हुए भी वे अपने चिंतन को इस्लामी आस्था में स्थापित करते हैं.

आस्था में सहारा खोजना किसी व्यक्ति का अधिकार है. किसी बंदी को प्रार्थना, कविता, परिवार, विचार या साथियों से शक्ति मिले- इस पर आपत्ति का कोई कारण नहीं है.दार्शनिक प्रश्न तब शुरू होता है जब व्यक्तिगत सहारे को मुक्ति का अनिवार्य आधार बनाया जाता है.

क्या ईश्वर में विश्वास न करने वाला व्यक्ति भी न्याय के लिए उतनी ही ईमानदारी से लड़ सकता है? क्या नास्तिक का साहस, नैतिकता और त्याग अपने आप में अपूर्ण हैं? क्या बराबरी का अधिकार किसी धार्मिक आस्था की स्वीकृति से स्वतंत्र है?

यदि उत्तर हां है, तो आस्था अनेक प्रेरणास्रोतों में से एक है. यदि उत्तर टाल दिया जाता है, तो सार्वभौमिक मुक्ति की भाषा के भीतर धार्मिक श्रेष्ठता का प्रश्न बचा रहता है.

मुल्लाओं की आलोचना करने से भी इसका उत्तर नहीं मिलता. धार्मिक नेतृत्व की जड़ता का विरोध करते हुए कोई व्यक्ति अधिक उदार व्यवस्था चाह सकता है. वह धर्म की अधिक संगठित और प्रभावशाली राजनीतिक भूमिका भी चाह सकता है.

धार्मिक सुधार और स्वतंत्र नागरिकता के बीच संबंध की जांच करनी होगी; उसे मानकर नहीं चला जा सकता.

आलोचना की स्वतंत्रता है या नहीं

शरजील ने उदारवादियों की कड़ी आलोचना की है, इसमें शामिल व्यक्तियों और संगठनों की आलोचना बिल्कुल होनी चाहिए. वे अवसरवादी, चयनात्मक, अभिजनवादी या राजनीतिक रूप से अदूरदर्शी हो सकते हैं. कोई व्यक्ति स्वतंत्रता की बात करते हुए दूसरों की स्वतंत्र आवाज से असहज भी हो सकता है लेकिन इन विफलताओं से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निष्पक्ष न्याय, संवाद और व्यक्तिगत बराबरी के सिद्धांत गलत नहीं हो जाते. उदारवादियों और उदारवाद के फ़र्क को अलग अलग रखना ही होगा.

उदार अधिकारों का मूल्य इसी में है कि वे उस व्यक्ति की भी रक्षा करते हैं जिससे वे सहमत नहीं हैं.

यही सिद्धांत धार्मिक अल्पसंख्यक को बहुसंख्यक सत्ता से बचाता है. यही सिद्धांत धार्मिक समुदाय के भीतर असहमत व्यक्ति को उसके सामुदायिक दबाव से बचा सकता है.

यदि हमें पहला संरक्षण चाहिए, लेकिन दूसरे से परेशानी है, तो हमारी मांग समान स्वतंत्रता की नहीं रह जाती.

स्त्री अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के संघर्ष में केवल उदारवादी नहीं रहे हैं. समाजवादी, आंबेडकरवादी, नारीवादी और धार्मिक सुधारक भी रहे हैं. लेकिन इन संघर्षों की उपलब्धि को टिकाऊ बनाने के लिए यह स्वीकार करना पड़ता है कि व्यक्ति की गरिमा किसी समुदाय की प्रतिष्ठा के अधीन नहीं है.

उदारवादियों की खिल्ली उड़ाना आसान है. कठिन काम उस व्यवस्था का स्पष्ट खाका देना है जिसमें उसका अपना कट्टर से कट्टर आलोचक सुरक्षित रहेगा.

मार्क्सवाद के प्रति शरजील का रुख भी एक तनाव दिखाता है. वे धर्म को समझने की उसकी सीमाएं बताते हैं, लेकिन कम्युनिस्ट शक्तियों को राजनीतिक सहयोगी मानते हैं. इसमें अपने आप कोई असंगति नहीं है. राजनीतिक गठबंधन के लिए दार्शनिक सहमति आवश्यक नहीं होती.

प्रश्न यह है कि सहयोग दोनों पक्षों को एक-दूसरे की आलोचना की स्वतंत्रता देता है या नहीं.

धर्म को केवल भ्रम या छल मानकर खारिज करना समाज की अधूरी समझ हो सकती है. लेकिन धर्म के महत्व को स्वीकार करने का मतलब उसके भीतर के शक्ति-संबंधों की आलोचना छोड़ देना भी नहीं है.

मुस्लिम मजदूर के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाला मार्क्सवादी मुस्लिम मालिक के शोषण पर सवाल उठाएगा. स्त्री की बराबरी का समर्थक मुस्लिम समाज की पितृसत्ता की आलोचना करेगा. धार्मिक अल्पसंख्यक की स्वतंत्रता का समर्थक मुस्लिम सत्ता के बहुसंख्यकवाद का भी विरोध करेगा.

क्या इस आलोचना को संवाद माना जाएगा या मुसलमानों की धार्मिक पहचान को न समझने का प्रमाण?

यदि सहयोगी की स्वीकार्यता इतनी ही है कि वह हमारे समुदाय के बाहरी विरोधियों से लड़े और हमारे भीतर के प्रभुत्व पर चुप रहे, तो वह बराबरी की साझेदारी नहीं है एकतरफा प्रलाप है.

मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों और दूसरे वंचित समूहों की राजनीतिक एकता अपने आप संदिग्ध नहीं है. समान अधिकारों के लिए ऐसे गठबंधन जरूरी हो सकते हैं.

लेकिन साझा पीड़ा अपने आप साझा लोकतांत्रिक दृष्टि पैदा नहीं करती.

एक व्यक्ति किसी संबंध में उत्पीड़ित और दूसरे संबंध में उत्पीड़क हो सकता है. जातिगत अपमान झेलने वाला पुरुष स्त्री पर अधिकार जमा सकता है. धार्मिक भेदभाव झेलने वाला व्यक्ति किसी दूसरे धर्म या संप्रदाय के प्रति असहिष्णु हो सकता है. गरीबी का अनुभव किसी को पितृसत्ता से मुक्त नहीं कर देता.

इसलिए वंचितों की एकता का आधार केवल अपने-अपने विरोधी के विरुद्ध संख्या जोड़ना नहीं हो सकता. उसे एक-दूसरे के भीतर के अन्याय पर बोलने का अधिकार भी देना होगा.

मुस्लिम राजनीति दलितों से सहयोग चाहती है तो उसे मुस्लिम समाज के भीतर जातिगत भेदभाव का सामना करना होगा. स्त्रियों का सहयोग चाहती है तो उनके स्वतंत्र निर्णय को स्वीकार करना होगा. धार्मिक स्वतंत्रता चाहती है तो दूसरे की धार्मिक असहमति और अविश्वास की स्वतंत्रता बचानी होगी.

वरना गठबंधन सत्ता हासिल कर सकता है; उससे मुक्ति का वादा पूरा नहीं होता.

प्रश्न का अधिकार

इस पूरी बहस की सबसे स्पष्ट परीक्षा एक प्रश्न में सामने आती है:

क्या इस्लाम और पैगंबर मुहम्मद की कठोर आलोचना, व्यंग्य या कार्टून बनाने वाले व्यक्ति को बिना भय के जीने और बोलने का अधिकार है?

प्रश्न यह नहीं है कि उसका व्यंग्य अच्छा है या बुरा. न यह कि वह संवेदनशील है या भड़काऊ. न यह कि उससे आस्थावान व्यक्ति को दुख पहुंच सकता है या नहीं.

प्रश्न उसके अधिकार का है.

चार्ली हेब्दो जैसा प्रकाशन हो या कोई अकेला लेखक अथवा कार्टूनिस्ट- क्या उसकी अभिव्यक्ति से गहरी असहमति रखते हुए भी उसके जीवन और सुरक्षा की रक्षा की जाएगी? क्या उसके विरुद्ध हत्या, धमकी और धार्मिक आलोचना के लिए दंड का स्पष्ट विरोध होगा?

धर्म के अनुयायी प्रतिवाद कर सकते हैं. आलोचना का जवाब आलोचना से दे सकते हैं. शांतिपूर्ण प्रदर्शन और बहिष्कार कर सकते हैं. लेकिन आहत आस्था किसी की जान या स्वतंत्रता पर अधिकार नहीं देती.

यही कसौटी हर धर्म पर समान रूप से लागू होगी. हिंदू धर्म की आलोचना करने वाले की स्वतंत्रता और इस्लाम की आलोचना करने वाले की स्वतंत्रता का सिद्धांत अलग नहीं हो सकता.

प्रत्यक्ष हिंसा के उकसावे और किसी विश्वास की आलोचना को भी एक नहीं माना जा सकता. मनुष्यों की सुरक्षा और विचारों को आलोचना से सुरक्षा देने में बुनियादी अंतर है.

शरजील के इस इंटरव्यू में इस प्रश्न का उत्तर न मिलना उनके संभावित उत्तर का प्रमाण नहीं है. उन्हें ऐसा उत्तर मानकर दोषी ठहराना अनुचित होगा जो उन्होंने दिया ही नहीं. लेकिन यह प्रश्न पूछे बिना उनके विचारों को मुक्तिकामी मान लेना भी उतना ही अधूरा होगा.

उनसे साफ उत्तर मांगा जाना चाहिए.

कई जवाब बाक़ी

संविधान कोई पवित्र ग्रंथ नहीं है. उसकी आलोचना, समीक्षा और संशोधन लोकतांत्रिक अधिकार हैं. उसे बेहतर बनाने के लिए उसकी कमियां बतानी होंगी.

लेकिन संविधान की आलोचना करने वाले से अपने विकल्प की जवाबदेही भी मांगी जाएगी.

प्रस्तावित व्यवस्था में अंतिम अधिकार किसका होगा? चुने हुए प्रतिनिधियों का, धार्मिक समुदायों का, धर्मगुरुओं का या स्वतंत्र न्याय और समान नागरिक अधिकारों का? किसी धार्मिक व्याख्या और स्त्री की बराबरी में टकराव हो तो किसे प्राथमिकता मिलेगी? समुदाय की प्रतिष्ठा और व्यक्ति की अभिव्यक्ति टकराएं तो किसकी रक्षा होगी?

‘न्याय’, ‘मुक्ति’ और ‘बराबरी’ जैसे शब्द इन प्रश्नों के उत्तर नहीं हैं. इन शब्दों का अर्थ इन्हीं टकरावों में खुलता है.

किसी व्यवस्था को गलत बताना आलोचना का पहला कदम है. उससे बेहतर व्यवस्था दिखाना अगला. और उस बेहतर व्यवस्था में अपने विरोधी की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना सबसे कठिन कदम.

शरजील के विचारों को केवल इसलिए खारिज करना कि वे धार्मिक आस्था से प्रेरित हैं, गलत होगा. धार्मिक व्यक्ति लोकतांत्रिक और उदार हो सकता है और नास्तिक व्यक्ति भी अधिनायकवादी हो सकता है, बहुत से हुए हैं.

उसी तरह उन्हें केवल इसलिए आधुनिक मान लेना कि वे इतिहास, दर्शन और राजनीतिक सिद्धांत की बेहद पढ़ी लिखी भाषा बोलते हैं, गलत होगा.

उनकी परीक्षा उनके अधिकारों की पारस्परिकता में है.

जिस स्वतंत्रता की मांग वे मुसलमानों के लिए करते हैं, क्या वही स्वतंत्रता वे मुस्लिम समाज के भीतर असहमत व्यक्ति को देने पर सहमत हैं?

जिस बहुसंख्यकवाद का विरोध भारत में करते हैं, क्या उसी स्पष्टता से दक्षिण एशिया की मुस्लिम बहुसंख्यक सत्ताओं के अन्याय का कभी कहीं विरोध किया? कहीं करेंगे?

जिस सम्मान की अपेक्षा अपने समुदाय के लिए रखते हैं, क्या उसके सबसे अप्रिय आलोचक की सुरक्षा को भी बिना शर्त स्वीकार करेंगे?

और जिस मुक्ति का वादा करते हैं, उसमें स्त्री, मजदूर, नास्तिक, धर्म छोड़ने वाला और दूसरे धर्म का नागरिक स्वतंत्र व्यक्ति होगा या किसी सामुदायिक व्यवस्था का अधीन सदस्य?

इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर मिले तो संवाद आगे बढ़ेगा. उत्तर की जगह ऐतिहासिक पीड़ा, धार्मिक विश्वास या आलोचकों की नीयत पर हमला आए तो संदेह गहरा होगा.

समुदाय को शक्तिशाली बनाने और मनुष्य को स्वतंत्र बनाने के बीच का फर्क ही इस बहस का केंद्र है. शरजील की राजनीतिक आलोचना को इसी फर्क पर परखा जाना चाहिए.