मस्जिद के खामोश कोनों में इल्म के चिराग रोशन हों

इबादत के साथ मुतालआ और तर्बियत की रिवायत को जिंदा करने की जरूरत

 

इक्कीसवीं सदी के पहले पच्चीस साल पूरे हो चुके हैं और दूसरे पच्चीस साल का आगाज हो चुका है। मुकाबले का दौर लगातार बढ़ रहा है और तलबा का रुझान कॉम्पिटिटिव एग्जाम और विभिन्न टेस्टों की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। इसके साथ ही वक्त के साथ इंसान की जरूरतें भी तेजी से बदल रही हैं।

आज के तालिब-ए-इल्म को किताब और उस्ताद के साथ ऐसे माहौल की भी जरूरत है, जहां वह कुछ घंटे सुकून के साथ बैठकर एकाग्रता से पढ़ सके, अपना वक्त बर्बाद होने से बचा सके और अपनी इल्मी सलाहियत को बेहतर बना सके।

यही वजह है कि शहरों में लाइब्रेरी, रीडिंग रूम और स्टडी सेंटर का चलन तेजी से बढ़ रहा है। तलबा ऐसी जगहों की तलाश में रहते हैं जहां शोर-शराबे से दूर, मोबाइल और दूसरी मशगूलियतों से बचकर वे कई घंटे अपनी पढ़ाई और इम्तिहान की तैयारी पर तवज्जो दे सकें।

ऐसे में मस्जिदों की तरफ ध्यान क्यों न जाए?

इस नई सूरत-ए-हाल में हमारी तवज्जो अपनी मस्जिदों की तरफ जाती है। बहुत-सी बड़ी मस्जिदें जुमे और दूसरे बड़े इज्तिमाओं को सामने रखते हुए विशाल और वसीअ बनाई जाती हैं। जुमे के दिन तो ये मस्जिदें नमाजियों से भर जाती हैं, लेकिन बाकी दिनों में उनका एक बड़ा हिस्सा अक्सर खाली रहता है।

ऐसे में यह सवाल सामने आता है कि क्या इन वसीअ जगहों का इस्तेमाल, मस्जिद की तकद्दुस और अदब को बरकरार रखते हुए, तालीम और मुतालआ के लिए नहीं किया जा सकता?

यह सवाल सिर्फ जगह के बेहतर इस्तेमाल का नहीं है, बल्कि मस्जिद के उस वसीअ किरदार को समझने का भी है जो हमें मस्जिद-ए-नबवी की तारीख और उसकी सरगर्मियों से नजर आता है।

इस्लाम में मस्जिद सिर्फ नमाज पढ़ने की जगह नहीं है। यह वह मुकाम है जहां इंसान अपने रब के सामने झुकता है और अपनी जिंदगी को संवारता है। जहां दिलों की इस्लाह और दिमागों की तर्बियत होती है, जहां ईमान को मजबूती मिलती है और इल्म की रोशनी पूरे माहौल को मुनव्वर करती है।

मस्जिद-ए-नबवी हमारे सामने एक बेहतरीन मिसाल है। वह नमाज और इबादत के साथ तालीम व तर्बियत, दावत व इस्लाह और मुसलमानों की इज्तिमाई जिंदगी का भी अहम मरकज थी। वहां कुरआन सीखा और सिखाया जाता था, मसाइल बयान होते थे, लोग रहनुमाई हासिल करते थे और जिंदगी के मुख्तलिफ मामलों में एक-दूसरे से जुड़ते थे।

मस्जिद में स्टडी सेंटर क्यों नहीं?

अगर मस्जिद के इसी जामे तसव्वुर को हमारे जेहन में फिर से जिंदा किया जाए तो आज की एक अहम जरूरत के लिए मस्जिद के दरवाजे खोलने की सूरत पैदा हो सकती है।

हमारी बड़ी मस्जिदों में ऐसे हिस्से क्यों मुकर्रर नहीं किए जा सकते जहां तयशुदा औकात में तलबा खामोशी के साथ बैठकर मुतालआ कर सकें? जहां वे कॉम्पिटिटिव एग्जाम, उच्च शिक्षा और दूसरे शैक्षणिक इम्तिहानों की तैयारी कर सकें?

मस्जिद के आदाब, नमाज के औकात, सफाई और सुकून का पूरा ख्याल रखते हुए अगर ऐसा निजाम कायम किया जाए तो मस्जिद एक तरफ इबादतगाह रहेगी और दूसरी तरफ नौजवानों के लिए एक पुरसुकून इल्मी मरकज भी बन जाएगी।

इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारे नौजवान मस्जिद के करीब आएंगे। आज बहुत-से नौजवानों का मस्जिद से ताल्लुक सिर्फ नमाज के चंद मिनटों तक महदूद होकर रह गया है। बड़ी तादाद में ऐसे नौजवान भी हैं जो मस्जिद की तरफ रुख ही नहीं करते।

अगर कोई तालिब-ए-इल्म अपनी किताबें लेकर रोजाना मस्जिद के किसी खामोश हिस्से में कुछ घंटे पढ़े, अजान की आवाज सुने, नमाज के लिए उठे, जमात में शामिल हो और फिर वापस अपने मुतालआ में लग जाए, तो मस्जिद उसकी जिंदगी में सिर्फ इबादत की जगह नहीं रहेगी, बल्कि उसकी इल्मी और अखलाकी तर्बियत का भी हिस्सा बन जाएगी।

कितना खूबसूरत मंज़र होगा कि नमाजें जमात के साथ अदा हों, कुरआन की तिलावत हो, मस्जिद के माहौल से इस्लामी मिजाज को मजबूती मिले, अजान होते ही मुस्लिम तलबा किताबें बंद करके नमाज की सफ में शामिल हो जाएं और नमाज के बाद फिर अपनी इल्मी जद्दोजहद में लग जाएं।

इस तरह इल्म और इबादत एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक मुस्लिम तालिब-ए-इल्म की जिंदगी के दो खूबसूरत पहलू बन जाएंगे।

गैर-मुस्लिम तलबा के लिए भी एक नया दरवाजा

इस तसव्वुर का एक अहम पहलू दावती और समाजी भी है। अगर मुनासिब इंतजाम और वाजेह उसूलों के साथ गैर-मुस्लिम तलबा को भी मुतालआ की सहूलियत दी जाए तो मस्जिद उनके लिए इस्लाम को करीब से समझने का एक नया दरवाजा बन सकती है।

हमारे समाज में मुख्तलिफ मजाहिब के लोग एक-दूसरे के साथ रहते हैं, लेकिन हर व्यक्ति को दूसरे मजहब के धार्मिक मराकिज और इबादत के तरीकों को करीब से देखने और समझने का मौका नहीं मिलता। नतीजतन कई बार दूरियां, सुनी-सुनाई बातें, शक और गलतफहमियां अपनी जगह बना लेती हैं।

एक गैर-मुस्लिम तालिब-ए-इल्म अगर किसी मस्जिद के पुरसुकून माहौल में बैठकर अपने इम्तिहान की तैयारी करे, मुसलमानों को नमाज पढ़ते देखे, उनके साथ बैठे, उनके अखलाक और मामलात का मुशाहिदा करे और मस्जिद को एक पुरअमन, मुनज्जम और इल्मी माहौल के तौर पर महसूस करे, तो इस्लाम के बारे में उसके जेहन में मौजूद कई सवाल और गलतफहमियां खुद-ब-खुद कम हो सकती हैं।

यह दावत किसी बहस या लंबी तकरीर के जरिए नहीं, बल्कि मस्जिद के माहौल, मुसलमानों के अखलाक और उनके अमली रवैये के जरिए होगी।

एक मुस्लिम तालिब-ए-इल्म अपने गैर-मुस्लिम साथी के साथ हुस्न-ए-सुलूक करे, मस्जिद का इंतजामिया इज्जत और अपनाइयत के साथ पेश आए, किसी जरूरतमंद तालिब-ए-इल्म की किताब या नोट्स में मदद कर दी जाए और मस्जिद में इल्म हासिल करने वालों के लिए महफूज, पुरसुकून और बा-वकार माहौल फराहम किया जाए—तो ये तमाम चीजें मिलकर इस्लाम की ऐसी तस्वीर पेश कर सकती हैं जो अल्फाज से कहीं ज्यादा असरदार होगी।

निजाम और अनुशासन बुनियादी शर्त

अलबत्ता इसके लिए निजाम और अनुशासन बुनियादी शर्त है। मस्जिद की तकद्दुस और इबादत के माहौल पर कोई حرف नहीं आना चाहिए।

मुतालआ के लिए मुनासिब जगह हो, औकात मुकर्रर हों, खामोशी और सफाई का इंतजाम हो। मुस्लिम तलबा के लिए नमाज के वक्त स्टडी रूम का निजाम नमाज के ताबे हो और मस्जिद के तमाम आदाब की पूरी पाबंदी की जाए।

हर मस्जिद अपने स्थानीय हालात और स्थानीय उलेमा की रहनुमाई के मुताबिक मुनासिब तरीका अपना सकती है।

यह काम सिर्फ इमारत के किसी हिस्से को लाइब्रेरी में बदलने का नहीं, बल्कि मस्जिद को नई नस्ल की जिंदगी से दोबारा जोड़ने की एक कोशिश है।

कितने नौजवानों को ऐसी जगह की जरूरत है?

हमें सोचना चाहिए कि हमारे शहरों में कितने नौजवान ऐसी जगहों की तलाश में रहते हैं जहां वे सुकून से पढ़ सकें। इनमें कितने ऐसे हैं जो लाइब्रेरी की फीस या वहां तक आने-जाने का खर्च आसानी से बर्दाश्त नहीं कर सकते।

कितने नौजवान घंटों ऐसी जगहों पर बैठते हैं जहां उनका दिल और जेहन दोनों बिखरे रहते हैं।

अगर हमारी बड़ी मस्जिदें अपने वसीअ और गैर-इस्तेमालशुदा हिस्सों में से कुछ जगह इन तलबा के लिए मुकर्रर कर दें तो यह देखने में एक छोटी-सी पहल होगी, लेकिन इसके असर बहुत दूर तक जा सकते हैं।

इससे मस्जिद में बिना शोर-शराबे के इल्म के चिराग रोशन होंगे। नौजवान इल्म और नमाज दोनों के लिए आएंगे। वे कॉम्पिटिटिव एग्जाम और अपनी तालीम की तैयारी भी करेंगे और कुरआन से अपना रिश्ता भी मजबूत करेंगे।

और शायद सबसे बढ़कर यह कि मस्जिद फिर से समाज की तामीर में अपना वह किरदार अदा करने लगेगी जिसकी उसे शुरुआत से ही पहचान हासिल रही है।

मस्जिद को वक्त की जायज जरूरतों से जोड़ने की जरूरत

आज हमें अपनी मस्जिदों के दरवाजे वक्त की जायज और मुफीद जरूरतों के लिए खोलने की जरूरत है। मस्जिद को सिर्फ ऐसी जगह समझना काफी नहीं जहां इंसान आता है, नमाज पढ़ता है और वापस चला जाता है।

मस्जिद वह जगह भी होनी चाहिए जहां नौजवान अपने मुस्तकबिल की तैयारी करे, इल्म की तलाश में बैठे, जेहनी सुकून हासिल करे, कुरआन सीखे, तर्बियत पाए और कोई गैर-मुस्लिम इस्लाम को करीब से देखने और समझने का मौका हासिल करे।

मस्जिद को बाजार बनाना मकसद नहीं है और न ही उसकी इबादतगाह की हैसियत को कम करना। मकसद तो उसके अंदर छिपी इल्म, तर्बियत, दावत और इस्लाह की सलाहियत को फिर से जिंदा करना है।

हमारे पास इमारतें हैं, वसीअ हॉल हैं, खामोश गोशे हैं, किताबें हैं, अहल-ए-इल्म हैं और सबसे बढ़कर मस्जिद की वह अजीम रिवायत है जिसने कभी इबादत के साथ इल्म और तर्बियत का चिराग भी रोशन किया था।

जरूरत सिर्फ इस बात की है कि हम इन तमाम वसाइल को नए अंदाज में आपस में जोड़ें और वक्त की जरूरत को समझते हुए मस्जिद के किरदार को वसीअ करें।

क्या खबर, किसी मस्जिद के एक खामोश गोशे में खुली हुई किताब किसी नौजवान की जिंदगी बदल दे। क्या खबर, बहुत-से तलबा की कामयाबी का रास्ता वहीं से निकले। क्या खबर, किसी नौजवान का मस्जिद से टूटा हुआ रिश्ता दोबारा जुड़ जाए और किसी गैर-मुस्लिम तालिब-ए-इल्म के जेहन में इस्लाम के बारे में मौजूद शक और गलत तसव्वुर हमेशा के लिए खत्म हो जाए।

इस तरह मस्जिद में दीन और रूहानियत का माहौल भी रहेगा और तालीम के मैदान में अच्छे नतीजों की उम्मीद भी पैदा होगी।

सबसे बढ़कर मुस्लिम बच्चों की मिल्ली, समाजी और तहजीबी तरक्की के साथ उनकी नमाज और मस्जिद से वाबस्तगी मजबूत होगी। वहां मुतालआ, इबादत और तालीम साथ-साथ आगे बढ़ेंगे।

जिस मस्जिद ने कभी इंसान के दिल को अल्लाह से और उसके जेहन को इल्म से जोड़ने का काम किया था, वह आज फिर समाज की तामीर व तरक्की और उम्मत की सरबुलंदी में यह जामे किरदार क्यों नहीं अदा कर सकती?

लेखक : जकी नूर अज़ीम नदवी, लखनऊ

Source: Haqeeqat Times