जयंती विशेष: काकोरी ट्रेन एक्शन को लेकर अशफ़ाक़उल्लाह खां की गिरफ़्तारी के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने उनको वायदामाफ़ सरकारी गवाह बनाने के लिए, सज़ा से बच जाने के लिए बड़े प्रलोभन दिए, हालांकि अशफ़ाक़ ने उनको बुरी तरह झिड़क दिया. अपनी शहादत से पहले उन्होंने बस इतनी-सी आरज़ू की थी कि ‘रख दे कोई जरा-सी ख़ाक-ए-वतन कफ़न में.’
देश के शहीदों के विस्मरण की हमारी पुरानी बीमारी के बावजूद शहीद अशफाकउल्लाह खां की बाबत यह जानकारी लगभग आम है कि वे आजादी के लिए सशस्त्र संघर्ष चला रहे क्रांतिकारियों द्वारा नौ अगस्त, 1925 को लखनऊ में काकोरी रेलवे स्टेशन के पास अंजाम दिए गए ऐतिहासिक एक्शन के चार शहीदों में से एक थे.
इस एक्शन को लेकर गिरफ्तारी और मुकदमे के नाटक के बाद तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने 19 दिसंबर, 1927 को फैजाबाद (अब अयोध्या) जेल में फांसी पर लटकाकर उन्हें उनकी देशभक्ति का ‘पुरस्कार’ दिया तो उनके अभिन्न मित्र रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ को इसी दिन गोरखपुर और रौशन सिंह को मलाका (इलाहाबाद) जेल में शहीद कर डाला था.
राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को तो उन्होंने इस डर के मारे कि कहीं क्रांतिकारी कोई और एक्शन करके उनको छुड़ा न ले जाएं, गोंडा जेल में दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही शहीद कर दिया था.
इस चारों शहीदों का साझा परिचय यह था कि वे बिस्मिल के नेतृत्व में गठित हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (इन चारों की शहादत के बाद जिसका नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रख दिया गया और चंद्रशेखर आजाद उसकी आर्मी के कमांडर-इन-चीफ बने) का हिस्सा थे.
सुविदित है कि उन्होंने अपने संगठन के विभिन्न एक्शनों के लिए धन की कमी दूर करने की खातिर नौ अगस्त, 1925 को एक पैसेंजर ट्रेन से ले जाया जा रहा सरकारी खजाना लखनऊ के काकोरी स्टेशन पर एक सुविचारित योजना के तहत लूट लिया था. उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार ने वह सारा खजाना देशवासियों को तरह-तरह से सताकर जमा कर रखा है और उसका सबसे अच्छा सदुपयोग उसे लूटकर गुलामी की बेड़ियों में जकड़े देश की स्वतंत्रता के उपक्रमों में लगाना ही है.
उनके इस एक्शन से हिलकर रह गई ब्रिटिश सरकार ने व्यापक धर-पकड़ के बाद इन चारों के अलावा भी अनेक क्रांतिकारियों को पकड़कर उन पर मुकदमा चलाया और उनको लंबी-लंबी सजाएं दिलवाई थीं.
जब अंग्रेजों ने ‘तोड़ना’ चाहा
जहां तक अशफाक की बात है, वे समर्पित क्रांतिकारी तो थे ही, अच्छे कलमकार भी थे. रामप्रसाद बिस्मिल की तरह उनके व्यक्तित्व में भी क्रांतिकारिता और कलम का अद्भुत संगम था. तिस पर उनका देशप्रेम इतना लासानी था कि गिरफ्तारी के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने उनको वायदामाफ सरकारी गवाह बनाने के लिए उन पर डोरे डालने शुरू किए तो सजा से बच जाने का बड़ा प्रलोभन दिए जाने के बावजूद उन्होंने उनको बुरी तरह झिड़क दिया.
इससे वे उन ब्रिटिश अधिकारियों की निगाह में भी सम्मान के पात्र बन गए, इससे पहले जिनका मानना था कि एक संपन्न मुस्लिम परिवार से होने के कारण मजहब के नाम पर भड़काकर, सरकारी नौकरी और जां बख्शी वगैरह के लालच देकर उन्हें अपनी ओर मिलाया व सरकारी गवाह बनने के लिए राजी किया जा सकता है. नको गलत सिद्ध करते हुए अशफाक ने न सिर्फ अपने उसूल पर दृढ़ता से अडिग रहकर किसी भी प्रलोभन में आने या टूटकर पक्ष बदलने से इन्कार कर दिया बल्कि जेल से ही देशवासियों के नाम एक विस्तृत पैगाम भेजकर देश के सुनहरे भविष्य, सांप्रदायिक एकता और किसानों-मजदूरों के हकों की वकालत भी की.
अपनी शहादत से पहले उन्होंने बस इतनी-सी आरज़ू की थी कि ‘रख दे कोई जरा-सी ख़ाक-ए-वतन कफ़न में.’ और इतना भर ही कहा था: तंग आकर हम भी उनके जुल्म से बेदाद से, चल दिए सू-ए-अदम ज़िंदान-ए-फ़ैज़ाबाद से.
यहां यह भी काबिल-ए-गौर है कि हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक के तौर पर बिस्मिल ने उसकी केंद्रीय समिति में काकोरी एक्शन को अंजाम देने संबंधी प्रस्ताव पेश किया तो उस पर हुई बहस में सह-संस्थापक के रूप में अशफाक ने उसका कड़ा विरोध किया था.
विरोध के पक्ष में तर्क देते हुए उन्होंने कहा था, ‘हमारा दल अभी मज़बूत नहीं हुआ है. उसमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह ब्रिटिश सरकार से सीधा युद्ध कर सके. इसलिए ऐसे किसी भी एक्शन से पहले दल का आधार मज़बूत किया जाना चाहिए. सरकार को इस तरह सीधी चुनौती देने से हमारा दल बिखर जाएगा और यह हमारे व देश के हित में नहीं होगा.’
लेकिन केंद्रीय समिति ने यह विरोध स्वीकार नहीं किया और एक्शन को अंजाम देने का फैसला किया तो उन्होंने किंचित बुरा नहीं माना, न ही अन्यथा लिया. बहुमत के फैसले को विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर लिया और निर्धारित योजना के अनुसार एक्शन को सफल बनाने के लिए खुद को पूरी निष्ठा से समर्पित कर दिया. निस्संदेह, यह एसोसिएशन के आंतरिक लोकतंत्र के साथ उसके उद्देश्यों के प्रति उनके असंदिग्ध जुड़ाव की भी मिसाल था.
आज की तारीख में हम कह सकते हैं कि उस वक्त हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की केंद्रीय समिति में अशफाक की बात मान ली जाती तो उसके सशस्त्र संघर्ष का इतिहास कुछ और होता. लेकिन जो भी होता, अशफाक ने उसका कभी कोई गिला-शिकवा नहीं किया, बल्कि लिखा, ‘ऐ वतनी मुहब्बत! तेरी अदाएं भी निराली और अनोखी हैं. वरना यह आसान काम नहीं कि कोई इंसान मौत का मुकाबला करने के लिए अपने को इतनी खुशी से पेश करे.’
एक्शन के बाद ब्रिटिश पुलिस द्वारा उससे जुड़े क्रांतिकारियों की धरपकड़ के लिए कुछ भी उठा न रखने के बावजूद वे कोई सवा साल तक उसे चकमा देते रहे थे. उनके अलावा एकमात्र चंद्रशेखर आजाद ही ऐसा कर सके थे, जबकि अन्य क्रांतिकारियों को पहले ही पकड़ लिया गया था.
आजाद तो खैर जीते जी कभी पुलिस के हाथ नहीं लगे, लेकिन एक विश्वासघाती द्वारा की गई मुखबिरी के बाद अशफाक को सात दिसंबर, 1926 को दिल्ली में पकड़ लिया गया, जिसके बाद वे अपनी शहादत के दिन (19 दिसंबर, 1927) तक यानी एक साल से कुछ ज्यादा समय तक उस फैजाबाद की जेल में बंद रहे, जिसका अब नाम ही मिटा दिया गया है.
जेल में लगाए चमेली के चार पौधे
उनके जेल जीवन के बारे में बहुत जानकारी नहीं मिलती, लेकिन जो भी मिलती है, उसी से पूरी तरह साफ हो जाता है कि जेल में रहते हुए वे जीते जी ही मिथ बन गए थे.
जानकारों के अनुसार, जेल में जब भी उनको समय मिलता, वे कुरान की आयतें पढ़ते और देश की आजादी की दुआ मांगा करते थे. 19 दिसंबर,1927 को, जो उनकी जिंदगी का अंतिम दिन था, शहादत के लिए ले जाए जाते वक्त भी उन्होंने कुरान को सीने से लगाए रखा और उसे चूमा था.
इससे पहले मुकदमे के दौरान उनको फांसी की सजा सुनाई गई तो वे जेल की जिस कोठरी में रखे गए थे, भावातिरेक में उन्होंने उसके पीछे की खाली जमीन पर चमेली के चार पौधे लगा दिए थे. उनमें से एक पौधे को उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल की यादों को समर्पित किया था, दूसरा राजेंद्र नाथ लाहिड़ी की यादों को और तीसरा रोशन सिंह की. इसी तरह चौथा पौधा उन्होंने खुद अपने लिए लगाया था. ये चारों पौधे आजादी के बाद भी कई वर्षों तक न सिर्फ सही सलामत थे और सबसे अलग दिखते थे, बल्कि कई अन्य पौधों के जन्मदाता भी बन गए थे. लेकिन बाद में सार-संभाल के अभाव और बेकद्री के शिकार होकर वे नष्ट हो गए और अब उनकी जगहों की शिनाख्त तक संभव नहीं है.
यों, इस बाबत एक तथ्य यह भी बताया जाता है कि चमेली के पौधों का जीवनकाल आम तौर पर 15 से 20 या अधिकतम 30 वर्ष ही होता है. ऐसे में अशफाक द्वारा 1927 में लगाए गए पौधों का आज 100 वर्ष बाद तक वानस्पतिक रूप से जीवित रहना संभव ही नहीं था. हां, किसी स्तर पर उनसे जुड़ी यादों को संजोये रखने की हसरत होती तो उनकी जगह वैसे ही दूसरे पौधे लगाए जा सकते थे.
इस सिलसिले में दिलचस्प यह कि बिस्मिल, अशफाक, लाहिड़ी और रौशन की शहादतों से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूदे प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिवकुमार मिश्र ने अपनी आत्मकथा ‘काकोरी से नक्सलबाड़ी तक’ में अशफाक के लगाए चमेली के उक्त पौधों का बहुत भावुक होकर जिक्र किया है.
जमादार की श्रद्धा
दरअसल, आजादी के बाद शिवकुमार मिश्र को एक क्रांतिकर्म के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया तो जेल की उसी कोठरी में रखा गया था, जिसमें शहादत से पहले तक अशफाक रहे थे. वहां जेल के एक जमादार ने मिश्र को अशफाक द्बारा उक्त पौधे लगाने की बात बताई और उनकी जगह ले जाकर उन्हें दिखाया भी था.
मिश्र ने लिखा है कि जब भी वह जमादार अशफाकउल्लाह के बारे में बातें करता, भावविह्वल हो जाता था और उसकी आंखों से आंसू बहने लग जाते थे. फिर तो वह कुछ ऐसी बातें भी कहने लगता था, जो कतई विश्वास के काबिल नहीं होतीं थीं.
मिश्र के लिखे मुताबिक, वह कहता था: क्या तुम समझते हो कि अगर अशफाक फांसी न चढ़ना चाहते तो उन्हें कोई फांसी दे पाता? उन्हें जेल में रखने की सामर्थ्य भी हम (फैजाबाद जेल के अहलकारों) में नहीं थी. एक बार रात को उन्होंने (अशफाक ने) मुझसे (जमादार से) कहा था कि अगर मैं चाहूं तो अभी जेल से निकल सकता हूं. कैसे? पूछने पर उन्होंने बैरक के अड़गड़े से हाथ बढ़ाया और ताला खट से तोड़ दिया. वह ताला कोठरी से कम से कम एक गज दूर दीवार में बने एक खोखल में लगा करता था.
शिवकुमार मिश्र इस कारनामे को कतई संभव न मानते तो वह कहता: अरे, तुम नहीं जानते. अशफाकउल्लाह कोई हमारे तुम्हारे जैसे सामान्य आदमी नहीं थे. वे बहुत पहुंचे हुए फकीर थे और जो चाहें, अपनी इच्छा मात्र से कर सकते थे.
मिश्र ने यह भी लिखा है कि वे अशफाक पर उस जमादार की श्रद्धा देखकर दंग रह जाते थे. इससे आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अशफाक अपने साल भर के जेल जीवन में ही इस जेल के हिंदुस्तानी कारकुनों व कामगारों में किस तरह घुल-मिलकर उनके चहेते हो गए थे और किस तरह उनके बारे में अनेक मिथ प्रचलित हो गए थे.
शहादतस्थल पर लगता था मेला!
लेकिन अफसोस की बात है कि अनेक स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों के प्रयासों से 1967 से हर साल 19 दिसंबर को इस जेल में उनके शहादत स्थल पर होता आ रहा श्रद्धांजलि समारोह, जिसने धीरे-धीरे मेले का रूप धारण कर लिया था, अब बीते दिनों की बात हो गया है.
दरअसल, 2019 में, जब देश में संशोधित नागरिकता कानून के विरुद्ध आंदोलन और प्रदर्शन हो रहे थे, अयोध्या के जिला व जेल प्रशासनों ने एक अप्रत्याशित व अभूतपूर्व कदम उठाकर इस समारोह पर रोक लगा दी थी. इस रोक में आम लोगों के लिए शहादत स्थल पहुंचकर अशफाक की प्रतिमा पर माल्यार्पण या श्रद्धासुमन अर्पित करने पर रोक भी शामिल थी.
हालत यह थी कि प्रदेश भर में लागू निषेधाज्ञा को बहाना बनाकर प्रशासन ने उस दिन शहादत स्थल का फाटक खोला ही नहीं. 1967 के बाद यह पहला अवसर था, जब वहां लगी अशफाक की प्रतिमा उनके शहादत दिवस पर भी सन्नाटे में डूबी रही और उसे कुछ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा अर्पित फूल-मालाओं से ही सब्र करना पड़ा.
उसके बाद के वर्षों में स्थानीय शहीद अशफाकउल्लाह खां मेमोरियल शहीद शोध संस्थान ने एक-दो बार इस समारोह के टूटे सिलसिले को जोड़ने की कोशिश की तो वह जेल प्रशासन की बेवजह की टोका-टाकियों और ऐतराजों के कारण सफल नहीं हो पाई.
ट्रस्ट के निदेशक सूर्यकांत पांडेय के अनुसार, प्रशासन को इस समारोह में ऐसे अतिथियों को बुलाया जाना तक बर्दाश्त नहीं होता था, जिनको लेकर प्रदेश सरकार सहज महसूस न कर पाती हो. इसलिए अब वे अपने ट्रस्ट की ओर से स्थानीय प्रेस क्लब के परिसर में श्रद्धांजलि समारोह आयोजित करते हैं.
वे कहते हैं, ‘इस बार 19 दिसंबर को अशफाक की शहादत का शताब्दी वर्ष शुरू हो रहा है. लेकिन अभी तक कुछ मालूम नहीं कि उसे लेकर प्रशासन कैसा रवैया अपनाएगा.’
Source: The Wire

