भाषाएं कभी इतिहास से अलग नहीं होतीं. वे समाज की जटिलता, राजनीति की चाल और सत्ता के असंतुलन से गढ़ी जाती हैं. उर्दू को अक्सर मुस्लिमों की, विदेशी और अभिजात्य भाषा के रूप में देखा गया. हिंदी को राष्ट्रवाद और ‘प्रामाणिक भारतीय’ पहचान से जोड़ा गया.
भारतीय भाषा और साहित्य की कहानी में एक विरोधाभास है, जिसे अनदेखा करना मुश्किल है. उर्दू, जिसे अक्सर किसी समुदाय की भाषा के रूप में देखा गया है, अपने भीतर एक ऐसा घर रखती है, जिसके द्वार खुले हैं, जिसमें अनेक संसार प्रवेश कर सकते हैं. इसने हर उस आवाज़ को अपनाया, पोषित किया और उत्सव मनाया, जो उसकी निर्धारित सीमाओं से बाहर से आई. इसकी कल्पना हमेशा लचीली रही, इसकी व्याकरणिक संरचना सहज रही, और इसकी सौंदर्यबोध हर समय बहुलता के लिए संवेदनशील रहा.
इसके विपरीत, हिंदी, अपनी भौगोलिक और लिपि-संबंधी निकटता के बावजूद, एक अलग कहानी कहती है. इसकी साहित्यिक परंपरा भले ही समृद्ध और विविध है, किन्तु इसकी स्वीकार्यता का दायरा सीमित रहा. हिंदी साहित्य के मुख्यधारा के द्वार अक्सर एक गढ़ की तरह खड़े दिखते हैं — ऊंचे, कठोर, और कभी-कभी जानबूझकर उन आवाज़ों को बाहर रखते हैं जो इसके स्वरूप को नया आकार दे सकती थीं. यदि उर्दू ने अपने भीतर दुनिया को समेटा, तो हिंदी ने लंबे समय तक स्वयं को सुरक्षित रखने को प्राथमिकता दी.
यह केवल भाषाओं की संघर्ष नहीं है. यह पहचान, राजनीति, और अधिकार की लड़ाई है, यह तय करना कि कौन बोले और कौन मौन रहे. भाषाएँ केवल शब्द नहीं हैं; वे समाज के प्रतिबिम्ब भी हैं.
उर्दू का बहुमंजिला घर
उर्दू के घर में कदम रखते ही ऐसे नाम मिलते हैं जो रूढ़ियों को तोड़ते हैं. पंडित बृज नारायण चकबस्त, जिनकी कविताओं में देशभक्ति और आध्यात्मिक संवेदनाएं साथ चलती हैं; कृष्ण चंदर, जिनकी कहानियों में गीतात्मकता गूंजती है; गोपीचंद नारंग, जिनकी आलोचना ने उर्दू की समझ को गहराई दी. ये नाम केवल सजावट नहीं, बल्कि उर्दू की नींव हैं.
जेएनयू से पढ़े लेखक और पत्रकार फैयाज़ अहमद वजीह कहते हैं ‘उर्दू ने मुल्की ग़ैर-मुल्की या यूं कह लीजिए कि हर भाषा-बोली से अपना श्रृंगार किया. हर तरह की परंपराओं को आत्मसात किया और विविधता के दरवाज़े कभी बंद नहीं किए.’ उनकी यह बात इस ज़बान के मूल सत्य को दिखाती है: उर्दू किसी एक समुदाय की कभी नहीं थी. इसकी ग़ज़लों में सूफ़ी और संत दोनों की आध्यात्मिकता, मर्सियों में वेदना, नज़्मों में राष्ट्रीय क्रांति और कहानियों में विभाजन का आघात दिखाई देता है, और यह सब केवल मुस्लिम पाठकों के लिए नहीं, बल्कि हर उस इंसान के लिए प्रासंगिक है जो भाषा को उसके धर्मनिरपेक्ष और मानवीय स्वरूप में समझता है.
वजीह आगे जोड़ते हैं ‘उर्दू की समावेशिता आकस्मिक नहीं थी, इसे संजोया गया. मुगल दरबारों से लेकर दिल्ली-लखनऊ के बाज़ारों तक, रामपुर और हैदराबाद के शायरी-सलूनों से लेकर उत्तर भारतीय मैदानों तक—यह सब जानबूझकर अपनाई गई बहुलता का नतीजा था. इसी खुलेपन ने उर्दू को फ़ारसी की लय, हिंदी की मृदुता, तुर्की की सूक्ष्मता और संस्कृत की लयात्मकता को साथ लेने की क्षमता दी. इसकी अभिव्यक्ति लचीली रही और इसका स्वागत लोकतांत्रिक.’
हिंदी के किले के दीवारें
इसके विपरीत, हिंदी, उतनी ही प्राचीन और विशाल भाषा होते हुए भी, अपने चयन में अधिक सीमित रही. इसका आधुनिक साहित्यिक कैनन, 19वीं और 20वीं सदी में निर्मित, एक सांस्कृतिक समरूपता की ओर झुका. मुस्लिम, दलित, और आदिवासी आवाज़ें अक्सर किनारे पर दिखाई देती हैं, शायद ही कभी केंद्र में.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू पढ़ाने वाले मोइद रशीदी इसे एक स्पष्ट रूपक में कहते हैं: ‘हिंदी, अपने लोकतांत्रिक दावों के बावजूद, अक्सर एक बंद कॉलोनी की तरह व्यवहार करती रही, जहां केवल कुछ विशेष प्रकार की आवाज़ों को ही प्रवेश मिला. अन्य लोगों को प्रतीक्षा करानी पड़ी या पूरी तरह बाहर रखा गया.’ उनकी यह बात तर्कसंगत है.
हिंदी साहित्य की मुख्यधारा के लेखक अधिकांश उच्च जाति के हिंदू पृष्ठभूमि से आए. कैनन ने एक विशेष सामाजिक समूह की चिंताओं और सौंदर्यबोध को प्रतिबिंबित किया, और जो बाहर था, उसे टोकनाइज किया गया या नजरअंदाज कर दिया गया. यदि उर्दू की समावेशिता बहुलता से उत्पन्न हुई, तो हिंदी की विशिष्टता ने जानबूझकर इसे सीमित किया — संस्कृत, बहुमत की सांस्कृतिक धारा और राष्ट्रीय राजनीति के साथ. हिंदी का संस्कृतिकरण इसे गौरवपूर्ण बनाता था, लेकिन साथ ही यह असहमति की लय को सुनने में असफल रहा.
परिणामस्वरूप साहित्यिक कैनन असंतुलित हो गया और एक सीमित दृष्टिकोण की पुनरावृत्ति मात्र बनकर रह गया.
प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट का अवसर
1930 के दशक में प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट (पीडब्लूएम) ने इस दुर्ग में कुछ दरारें डाली. इसका जन्म उर्दू में हुआ, पर हिंदी ने भी इसमें स्थान पाया. लेखक विभिन्न धर्मों और विचारधाराओं से आए, सामंतवाद, उपनिवेशवाद, गरीबी और सांप्रदायिकता के खिलाफ चुनौती देने. यहां साज्जाद ज़हीर का लेखन प्रेमचंद के साथ, मुल्क राज आनंद का लेखन फैज़ के साथ मिला.
क्षणभर के लिए ऐसा लगा कि साहित्य सामाजिक न्याय का हथियार बन सकता है, समावेशिता का कैनवास. पर वादा आंशिक रहा. पीडब्लूएम ने क्षितिज खोले, लेकिन हिंदी में संरचनात्मक बहिष्कारों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया. दलित साहित्य बाद में आया, अक्सर प्रतिरोध के रूप में. आदिवासी आवाज़ें अब भी केंद्र में संघर्ष करती हैं. महिलाएं, कुछ अपवादों के बावजूद, बड़ी तस्वीर में कम सुनाई दीं.
पीडब्लूएम ने खिड़की खोली, लेकिन महल की दीवारें मुख्यतः बरकरार रहीं. सके बावजूद, इस आंदोलन ने साहित्यिक आलोचना और संवाद के नए मंच खोले. विभिन्न पत्रिकाओं और साहित्यिक मैगज़ीनों ने अलग-अलग समुदायों के लेखकों को प्रकाशित किया. मंचों पर बहसें और मंचन ऐसे विचारों के लिए जगह बनीं, जो तब तक हाशिए पर थे. ऐसे प्रयासों ने बाद की पीढ़ियों के लिए यह संदेश दिया कि साहित्य केवल अभिजात वर्ग की नहीं, बल्कि समाज के हर हिस्से का प्रतिनिधि हो सकता है.
भाषा और पहचान
भाषाएं कभी इतिहास से अलग नहीं होतीं. वे समाज की जटिलता, राजनीति की चाल और सत्ता के असंतुलन से गढ़ी जाती हैं. उर्दू को अक्सर मुस्लिमों की, विदेशी और अभिजात्य भाषा के रूप में देखा गया. हिंदी को राष्ट्रवाद और ‘प्रामाणिक भारतीय’ पहचान से जोड़ा गया. यही वह विचार है, जो मैथिली के संदर्भ में भी दोहराया जाता है, कि यह केवल मैथिल ब्राह्मणों की भाषा है.
पर सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल और बहुआयामी है. उर्दू कभी उत्तर भारत की साझा भाषा थी, जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों ही लिखते, पढ़ते और बोलते थे. हिंदी के प्राचीन रूप—ब्रज और अवधी—भी समावेशी थे, पर समय और सामाजिक बदलावों ने उन्हें संकुचित कर दिया. विभाजन, भाषाई राजनीति और सांस्कृतिक दबावों ने इन सीमाओं को और कठोर बना दिया.
विरोधाभास स्पष्ट है. उर्दू, जिसे अक्सर मुस्लिमों की भाषा कहा गया, वहीं हिंदू कवियों और आलोचकों को भी अपनाने में उदार रही. हिंदी, जिसे लोकतांत्रिक कहा जाता है, वहां अल्पसंख्यक और हाशिए पर रहने वाली आवाज़ें अक्सर दब गईं.
इसके प्रमाण अनेक हैं. कई हिंदू धर्मग्रंथों का उर्दू में अनुवाद इस बात की मिसाल हैं कि उर्दू कभी किसी धर्म विशेष की भाषा नहीं रही. नवल किशोर प्रेस, लखनऊ का योगदान इस भाषा के संवर्धन और प्रसार में अत्यंत महत्वपूर्ण है. यह स्पष्ट करता है कि उर्दू की यात्रा किसी समुदाय तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सभी के साझा अनुभवों की भाषा रही.
मिथिला में उर्दू की शुरुआत और विकास के विषय में अधिकतर किताबें मौन हैं. फिर भी महाकवि विद्यापति की कीर्तिलता इस इतिहास में महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है. यह न केवल उर्दू की यात्रा का प्रमाण है, बल्कि उस सांस्कृतिक परंपरा का भी साक्ष्य है, जिसने भाषाओं और समुदायों की सीमाओं को पार किया.
उर्दू की यह समावेशिता, उसकी बहुलता, और उसकी खुलेपन की परंपरा हमें याद दिलाती है कि भाषा विचारों और संवेदनाओं का भी घर है, जहां हर आवाज़ को सुनने और सम्मान देने का स्थान होना चाहिए.
आज की छाया
आज स्थिति कैसी है? उर्दू संस्थागत रूप से संघर्ष कर रही है — इसके स्कूल घट रहे हैं, पाठक घट रहे हैं, और राज्य का समर्थन कम हो रहा है. फिर भी इसकी कविताएँ गाई जाती हैं, इसके शेर फिल्मों में उद्धृत होते हैं, और इसके रूपक जनता के मानस में अंकित हैं. हिंदी ने शासन, व्यापार और लोकप्रिय संस्कृति में विस्तार किया, लेकिन साहित्यिक क्षेत्र में यह अभी भी बहिष्कार के निशान लिए हुए है.
दलित साहित्य आंदोलन ने पुनः स्थान पाने की कोशिश की, प्रतिरोध और गवाही का एक वैकल्पिक कैनन बनाया. फिर भी, वज़ीह याद दिलाते हैं, ‘एक कैनन जो अपने समाज का पूरा प्रतिनिधित्व नहीं करता, वह कोई कैनन नहीं, केवल सत्ता का प्रतिबिम्ब है.’ इस दृष्टि से, हिंदी अभी अधूरी है. उर्दू, अपनी गिरावट के बावजूद, समावेशिता की नैतिक पूंजी रखती है.
समावेशी परंपरा की ओर
ज़रूरत है कि हम न उर्दू के अतीत की नॉस्टैल्जिया में खोएं, न हिंदी की वर्तमान स्थिति का अंध उत्सव करें. हमें एक ऐसी साहित्यिक परंपरा गढ़नी है, जो जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्रीय विविधताओं की हर आवाज़ को सुने और सम्मान दे.
यह परंपरा हिंदी के गढ़बंदी को मिटाए बिना उसमें खिड़कियां और दरवाज़े खोलेगी, ताकि हर अनुभव और विचार की रोशनी भीतर पहुंच सके. उर्दू को केवल भावुकता या अभिजात्य तक सीमित न रखते हुए इसकी बहुलता और विविधता को मॉडल के रूप में पेश करेगी. साहित्यिक कैनन कोई स्थायी वस्तु नहीं है; यह प्रवहमान है, जिसे हर पीढ़ी अपने अनुभव और नई सोच के साथ पुनर्लेखन करती है.
इस परंपरा में लेखक और पाठक के संवाद के साथ-साथ समाज की अनकही कहानियों, दबे आवाज़ों को भी मंच मिलेगा, जो लंबे समय तक हाशिए पर रही हैं. हर भाषा, बोली और सांस्कृतिक अनुभव इस साझा घर का हिस्सा होंगे. जब साहित्य इन बहुलताओं को अपनाएगा, तभी स्पष्ट होगा कि असली समावेशिता केवल शब्दों की नहीं, बल्कि संवेदनाओं और सोच की है.
साहित्य की इस खुली दुनिया में कोई भी आवाज़ दबाई नहीं जाएगी, कोई अनुभव नगण्य नहीं माना जाएगा. हर कहानी और हर अनसुनी कथा एक-दूसरे से गुंथी जाएगी, और एक ऐसा घर बनेगा जो हमारे समय की जटिलताओं और संवेदनाओं को समेट सके. यही वह दिशा है जो भारतीय साहित्य को समावेशी और प्रासंगिक बनाएगी—एक ऐसा साहित्य जो हृदय को स्पर्श कर सके, विचारों को झकझोरे, और हर पाठक में अपना प्रतिबिंब खोज सके.
अधूरी पटकथा
उर्दू और हिंदी की कहानी भारत की कहानी है, कभी बहुलता को अपनाने की, कभी बहुलता को अस्वीकार करने की. भाषाएं राष्ट्रों के रूपक हैं; उनकी नियति एक-दूसरे से जुड़ी है.
यदि उर्दू एक खुले घर की तरह है, तो हिंदी एक सुरक्षित कवच की तरह रही. पर अब समय है कि ये दीवारें गिराई जाएँ और आवाज़ें स्वतंत्र हों. साहित्य किसी का निजी अधिकार नहीं.
फैज़ अहमद फैज़ ने कहा था ‘बोल, कि लब आज़ाद हैं तेरे.’ यह पुकार किसी एक धर्म या जाति के लिए नहीं थी, यह सबके लिए थी.
जैसा कि मोइद रशीदी कहते हैं ‘एक भाषा सचमुच तभी जीवित होती है जब वह सबके बोझ और गीत उठाने का साहस रखे. हिंदी और उर्दू का भविष्य प्रतिद्वंद्विता में नहीं, बल्कि एक-दूसरे की आवाज़ें पकड़ने की क्षमता में है.’
उनके शब्द आशा की किरण हैं—यह दिखाते हैं कि इस विभाजित समय में भी हम ऐसी परंपरा बना सकते हैं जहां कोई आवाज़ दबाई न जाए और हर दरवाज़ा खुला हो.
Source: The Wire







